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Film। इरफान खान : तुमको न भूल पाएँगे…

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Irfan Khan : Tumko na bhul payenge
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Kunal Baikunth Singh
Director and Actor, The first Angika Film, Khagaria wali Bhaujee

In 1994 Himesh reshamiya was making a TV serial directed by arun frank for zee TV. We were looking for a good looking smart negative actor. After trying lots of new actors I suggested Irfan Khan. But point was how to contact him. Because he dsn’t had mobile no. that time. But he was working in TV serial named ‘Banegi Apni Baat’.

I called the office of Diya Toni (producer of Banegi Apni Baat.) 

Any how got in tuch with great irfan khan. He was shooting some where in seven bunglow.. I went to meet him for budget and all. But was not allowed to inter at the shooting location. Any how after a long irfan khan came out. He asked only one thing, “Who is the opposite actor with him for frist scene to be shoot.” I said, “Shekhar Suman, Kamljeet and Sudesh Berry.’ He became happy. He didn’t ask for payment. “De dena yar jo v samjh me aaye.”

Next day he came at palm Grove parking Juhu. Sudesh was not happy to meet this new actor sudesh was a star. I was blames for miss cast him this actor called irfan khan. But himeah reahamiya my boss had full faith in me.. As well as this brilliant actor.

Year after that he used to play cricket at the parking place of great director tigmanshu dhuliya .

I never like cricket but was playing for a friend like great irfan khan.. 

That time he was shooting for film maqbul.. He said kunal tumko na bhul paunga.. Kiyo bhai i asked.. U give me frist negative roll.. Which is my identity today. Rest is history.
“Yar hum v tumko na bhul payenge.”

BNMU। दर्शनशास्त्र विभाग, बीएनएमयू, मधेपुरा में ऑनलाइन कक्षाएँ जारी

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दर्शनशास्त्र विभाग, बीएनएमयू, मधेपुरा में ऑनलाइन कक्षाएँ जारी
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दर्शनशास्त्र विभाग, बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा में स्नातकोत्तर प्रथम सेमेस्टर, स्नातकोत्तर चतुर्थ सेमेस्टर और पी-एच. डी. कोर्स वर्क की ऑनलाइन कक्षाएँ चल रही हैं। इसके लिए बीएनएमयू (फिलाॅस्फी) नामक वाट्सप ग्रुप और  गूगल क्लास शुरू किया गया है। इसमें विभागाध्यक्ष सह मानविकी संकायाध्यक्ष डाॅ. ज्ञानंजय द्विवेदी और असिस्टेंट प्रोफेसर सह जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर विद्यार्थियों को स्टडी मटेरियल उपलब्ध करा रहे हैं। साथ ही फोन पर भी विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है।

 

डाॅ. द्विवेदी ने कहा है कि  कोराना महामारी से शिक्षा जगत को काफी नुकसान हुआ है। हम ऑनलाइन टीचिंग के माध्यम से उस नुकसान को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।

 

डॉ. शेखर ने बताया कि ऑनलाइन कक्षा संचालन को लेकर दर्शनशास्त्र के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों में काफी उत्साह है। इसमें विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग के अलावा विभिन्न काॅलेजों के शिक्षक भी सहयोग दे रहे हैं। विशेष रूप से बीपीएससी के माध्यम से चयनित होकर आए नवनियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसर इसमें अपनी महती भागीदारी निभा रहे हैं। इनमें एच.पी. एस. काॅलेज, निर्मली के डाॅ. रणधीर कुमार सिंह एवं डाॅ. पंकज कुमार और रमेश झा महिला काॅलेज, सहरसा की  डाॅ. प्रत्यक्षा राज एवं   डाॅ. पूजा कुमारी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

 

विद्यार्थी भी धीरे-धीरे ऑनलाइन  क्लास में रुचि दिखा रहे है। सक्रिय विद्यार्थियों में श्याम प्रिया, सौरभ कुमार चौहान, शशिकान्त कुमार आदि के नाम शामिल हैं।

 

 

Covid-19। कोरोना से जंग-भारतीय संस्कृति के संग।

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कोरोना से जंग-भारतीय संस्कृति के संग।
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कोरोना के कहर से पूरी दुनिया त्रस्त है।  बिहार सहित देश के कई राज्यों में लाॅकडाउन है और विश्वविद्यालय में भी कामकाज प्रभावित हुआ है।

 

मधेपुरा के वरिष्ठ नागरिक सह कुलपति के निजी सहायक और शंभू नारायण यादव का कहना है कि उन्होंने आज तक ऐसी आपदा के बारे में नहीं सुना था। यह एक बड़ी त्रासदी है। इसमें हम सबों को सावधानी बरतने की जरूरत है। खासकर बिहार में विशेष सतर्कता की जरूरत है; क्योंकि यहाँ कोरोना जांच की भी सुविधा नहीं है। यह हमारे लिए शर्म की बात है कि हमने कोरोना पीड़ित का सैम्पल राँची भेजा और जबतक रिपोर्ट आई, मरीज की मौत हो गई। अतः माननीय मुख्यमंत्री एवं माननीय  स्वास्थ्य मंत्री को सभी कामों को छोड़कर स्वास्थ्य सेवाओं को दुरूस्त करने पर ध्यान देने की जरूरत है। यहां  सभी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में कोरोना जांच की मुकम्मल व्यवस्था हो और हर प्रखंड में आसोलेशन वार्ड बने। साथ ही डाक्टर, नर्स एवं अन्य चिकित्सा कर्मियों को विशेष सुविधा देना जरूरी है।

 

बीएनएमयू के  सिंडीकेट सदस्य सह राजनीति विज्ञान विभाग, टी. पी. काॅलेज, मधेपुरा के अध्यक्ष डाॅ. जवाहर पासवान ने कहा है कि हमें  कोराना को लेकर राजनीति एवं ढकोसले से दूर रहना चाहिए। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी नागरिकों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करे। कोरोना को लेकर  देश में अफरा-तफरी का माहौल है। बड़ी संख्या में बिहारी मजदूर और विद्यार्थी अन्य राज्यों में फंसे हैं। उन्हें सभी सुविधाएं मिलें। सभी राज्यों की सरकारों को चाहिए कि वे राज्य में रहने वाले सभी लोगों और विशेषकर मजदूरों एवं विद्यार्थियों की सुविधाओं पर ध्यान दें।

 

जनसंपर्क पदाधिकारी सह दर्शनशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ. सुधांशु शेखर ने कहा है कि इलाज से परहेज अच्छा होता है। अतः हमें संयम, सुचिता एवं सादगी का जीवन जीना चाहिए, ताकि कोरोना या कोई अन्य महामारी हो ही नहीं। हमें प्रकृति- पर्यावरण की ओर लौटना होगा। हम संयम, सुचिता एवं सादगी पर आधारित पारंपरिक  जीवनशैली को अपनाकर ऐसी महामारियों से बच सकते हैं और स्वस्थ एवं दीघार्यू जीवन का आनंद ले सकते हैं।
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https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3504875219582532&id=100001802664337

Covid 19। ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय में कोरोना से बचाव के लिए मास्क, सेनेटाइजर और साबुन वितरित

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टी. पी. काॅलेज में मास्क, सेनेटाइजर एवं साबुन वितरित
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कोरोना संक्रमण के प्रति सावधान रहें। सभी कोरोना से बचने हेतु दिए गए निर्देशों का पालन करें और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। यह बात ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा के प्रधानाचार्य डाॅ. के. पी. यादव ने कही। वे 25 अप्रैल, 2020 (शनिवार) को महाविद्यालय में राष्ट्रीय सेवा योजना के तत्वावधान में आयोजित  कोरोना उन्मूलन जागरूकता अभियान में बोल रहे थे। इस अवसर उपस्थित शिक्षकों एवं कर्मचारियों को कोरोना वायरस से बचाव के विभिन्न उपायों की जानकारी दी गई और सबों के बीच मास्क, सेनेटाइजर एवं साबुन का वितरण किया गया।

प्रधानाचार्य ने सबों के स्वस्थ एवं सुरक्षित जीवन की कामना की है। उन्होंने सभी शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों से अपील की है कि वे सरकार द्वारा किए गए ‘लाॅकडाउन’ का उल्लंघन नहीं करें।अनावश्यक अपने घरों से बाहर नहीं निकलें। एक-दूसरे से भौतिक दूरी बनाए रखें। लेकिन किसी को भी भावनात्मक रूप से अकेला महसूस नहीं होने दें। बुजुर्गों, बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं का विशेष ख्याल रखें। यदि किसी भी व्यक्ति में  कोरोना का कोई लक्षण नजर आए, तो उसकी सूचना स्वास्थकर्मियों एवं पुलिसकर्मियों को दें।

प्रधानाचार्य ने महाविद्यालय के शिक्षक से विशेष रूप से अपील की है कि वे लाॅकडाउन के समय को अध्ययन- अध्यापन में लगाएँ। ऑनलाइन एडूकेशन में बढ़चढ़ कर भागीदारी निभाएँ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), नई दिल्ली ने इन्फार्मेशन एंड कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी (आईसीटी) का प्रयोग कर ऑडियो- वीडियो और टेक्स्ट कंटेंट हासिल करने के लिए कई लिंक बताए हैं। सभी शिक्षक उसका उपयोग करें और विद्यार्थियों को भी उसकी जानकारी दें। अपने विषय से संबंधित अद्यतन पाठ्यक्रम को केन्द्र में रखकर विद्यार्थियों के लिए उपयोगी नोट्स बनाएँ और उसे विश्वविद्यालय वेबसाइट पर अपलोड कराएँ। विद्यार्थियों के लिए उपयोगी  वीडियो को फेसबुक, गूगल क्लास रूम एवं यूट्यूब पर भी अपलोड करें।

राष्ट्रीय सेवा योजना के विश्वविद्यालय समन्वय डाॅ. अभय कुमार ने सबों  से अपील की कि खुद  वायरस से बचें और इसे फैलने से रोकने में भी मदद करें। नियमित रूप से साबुन या सैनिटाइजर से 20 सेकंड तक हाथ धोएं। मोबाइल, कम्प्यूटर, लेपटाॅप आदि को भी समय-समय पर साफ करते रहें। खांसने एवं छींकने के दौरान अपनी नाक एवं मुंह को ढकें। जो लोग बीमार हैं उनसे (एक मीटर या तीन फ़ीट की) दूरी बनाए रखें। गंदे हाथों  से अपनी आंख, नाक या मुंह को न छुएं।

उन्होंने बताया कि सभी व्यक्ति अपने-अपने मोबाइल में आरोग्य सेतु एप डाउनलोड करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। हमेशा गर्म पानी पीएं। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले पेय का सेवन करें।

सिंडीकेट सदस्य डाॅ. जवाहर पासवान ने कहा कि बड़ी संख्या में मधेपुरा एवं बिहार के अन्य जिलों के विद्यार्थी एवं मजदूर दूसरे राज्यों में फंसे हैं। वे लोग वहाँ अपने आपको  असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, उनमें निराशा एवं तनाव बढ़ रहा है और उन्हें जीवनयापन में भी काफी कठिनाईयाँ हो रही हैं। ऐसे में बिहार सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह दूसरे राज्यों में फंसे सभी बिहारी विद्यार्थियों एवं मजदूरों को सुरक्षित वापस लाए।

जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर ने कहा कि हम सबों को मिलकर कोरोना महामारी से लड़ना है। इस महामारी को मात देने के लिए हमें सरकार के निदेशों का पालन करना चाहिए। यदि हम संयम, सादगी एवं सुचिता को जीवन में  अपनाएं, तो हम इस महामारी से बच सकते हैं।

इस अवसर पर विवेकानंद कुमार, मणिष कुमार, नारायण ठाकुर, ज्योतिष कुमार, सुनील कुमार, धीरेन्द्र ठाकुर, पाँचू राम, बबलू महतो, भरत प्रसाद यादव, रवि मुखिया, अशोक आदि उपस्थित थे।

Covid-19। कोरोना से जंग, नानी के संग

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कोरोना से जंग-नानी के संग

कोरोना के कहर से पूरी दुनिया त्रस्त है। बिहार सहित देश के कई राज्यों में लाॅकडाउन है और विश्वविद्यालय में भी कामकाज प्रभावित हुआ है। ऐसे में हम अपने-अपने तरह से इस लाॅकडाउन के समय का सदुपयोग कर रहे हैं और कोरोना से लड़ने की तरकिबें ढूंढने में लगे हैं।इस समय अपनी दिवंगत नानी सिया देवी, माधवपुर (खगड़िया) की बातें मेरे लिए काफी उपयोगी साबित हो रही हैं। इनमें से कुछ प्रमुख बातें निम्नवत हैं-

1. एक स्वतंत्रता सेनानी की सहधर्मिणी के रूप में नानी के लिए देश-प्रेम सर्वोपरि था। उन्होंने अपने हाथों पर ‘जय हिंद’ गुदबा रखा था और यही उनके दिलों पर भी अंकित था। आज कोरोना से जंग में देश-प्रेम की सबसे अधिक जरूरत है।

2. नानी हमेशा कहती थीं कि इलाज से परहेज अच्छा होता है। अतः हमें संयम, सूचिता एवं सादगी का जीवन जीना चाहिए, ताकि कोरोना या कोई अन्य महामारी हो ही नहीं। हमें प्रकृति-पर्यावरण की ओर लौटना होगा। हम संयम, सुचिता एवं सादगी पर आधारित पारंपरिक  जीवनशैली को अपनाकर ऐसी महामारियों से बच सकते हैं और स्वस्थ एवं दीघार्यू जीवन का आनंद ले सकते हैं।
3. कोरोना से लड़ने के लिए हमें आपस में भौतिक दूरी रखनी है- सामाजिक एवं भावनात्मक दूरी नहीं रखनी है। पहले घर में जब किसी को चेचक (माता) होता था, तो उन्हें घर के एक कमरे में ‘आइसोलेट’ कर दिया जाता था। उसके पास नीम की पत्तियां एवं हल्दी के टुकड़े रखे जाते थे और धूमना-गूगल आदि जलाकर वायरस को मारने का प्रयास किया जाता  था। नानी किसी को भी रोगी से मिलने नहीं देती थीं, लेकिन रोगी के प्रति भावनात्मक लगाव में कोई कमी नहीं करती थीं। हम कोरोना से दूर रहें, लेकिन कोरोना पीड़ितों से घृणा नहीं करें।
4. नानी का यह दृढ़ विश्वास था कि स्वच्छता ही देवत्व है। हम हमेशा आंतरिक एवं बाह्य स्वच्छता का ध्यान रखें। अपने घर, आस-पड़ोस, शरीर, कपड़े आदि को स्वच्छ रखें। जूता-चप्पल घर के बाहर खोलें और पैर-हाथ धोकर कमरे में प्रवेश करें। रसोई घर मे किसी भी कीमत पर जूता-चप्पल पहनकर नहीं घुसें। खाने के पहले और बाद हाथों को राख से साफ करें। शौचालय और स्नानघर की साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें।
5. नानी का मानना था कि हम दिखावटी व्यायाम नहीं करें, बल्कि उत्पादक शारीरिक श्रम करें। जाँता-चक्की में दाल पिसें, ऊंखल में चावल-चूड़ा कूंटें एवं मथानी से घी निकालें। घर में  साग-सब्जियाँ एवं आवश्यक फलों का उत्पादन करें। सूत काटें और पेंटिंग या चित्र आदि बनाएँ। आज जिनको ऐसी आदतें होंगी, उनका लाॅकडाउन का समय आसानी से कट रहा होगा।

6. नानी हमेशा कहती थीं कि आपात दिनों के लिए खाद्य पदार्थ तैयार कर रखें। बड़ी, झूड़ी एवं सुखौता आदि बनाएँ, जो सब्जियों का विकल्प हो सकते हैं। साथ ही अचार, अमौठ आदि हमारा स्वाद बढ़ा सकते हैं। साथ ही घर में पकवान, पेड़ा, तिलबा आदि बनाएँ बाजार की चीजें कम खाएँ।

आज लाॅकडाउन में नानी की बातें मुझे काफी सकुन दे रही हैं। आपको भी आपकी नानी-दादी ने ऐसी कई बातें बताई होंगी। संभव है कि तब उस समय हमें उनकी बातें पुरातनपंथी लगी हों। लेकिन आज फिर से उन्हें याद कीजिए। वे बातें आपके दिलों को सकुन देंगी और परिवार एवं समाज को राहत भी। कुछ याद आया क्या ?
-डाॅ. सुधांशु शेखर,असिस्टेंट प्रोफेसर (दर्शनशास्त्र) एवं जनसंपर्क पदाधिकारी, बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा (बिहार)

Gandhi। गाँधी-विमर्श क्यों ?

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                         गाँधी-विमर्श क्यों ?

आधुनिक सभ्यता के रथ पर आरूढ़ ‘मानव’ तथाकथित विकास की बुलंदियों पर है। आज आकाश को मुँह चिढ़ाते गगनचुंबी मकान, हवा से तेज दौड़ते वायुयान, धरती की दूरियों को खत्म कर देने वाले संचार सामान आदि उसकी पहचान हैं। उसने महामारियों से लड़ने वाले अचूक टीके बनाए हैं, शल्य-चिकित्सा के अत्याधुनिक उपकरण विकसित कर लिए हैं और बना लिया है, यौन-क्षमता से लेकर बौद्धिकता तक को बढ़ाने वाली दवाइयाँ। उसके पास हैं- कृत्रिम गर्भाधान, परखनली शिशु, अंग- प्रत्यारोपण एवं मानव-क्लोनिंग की तकनीक और झाड़ू लगाने एवं खाना बनाने से लेकर प्रेम एवं सेक्स करने तक में दक्ष मशीनें (रोबोट)। आज वह समुद्र की अतल गहराइयों में खेल रहा है, अंतरिक्ष की सैर कर रहा है, ढूँढ रहा है- चाँद एवं मंगल पर बस्तियाँ बसाने की संभावनाएँ और देख रहा है- अमरता के सपने भी। लेकिन, तस्वीर का दूसरा पहलू बड़ा ही भयानक है। पूरी दुनिया बम एवं बारूद की ढेर पर खड़ी है और रिमोट का एक बटन दबाने मात्रा से पूरी सभ्यता के मिट्टी में मिलने की आशंका पैदा हो गई है। साथ ही बाढ़-सुखाड़, भूकंप, सुनामी, एसीड-रेन, ग्लोबल-वार्मिंग, ग्लोबल-कूलिंग और ओजोन परत के क्षरण का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। प्राकृतिक सम्पदाएँ नष्ट हो रही हैं और कोयले एवं पेट्रोलियम के भंडारों के जल्द ही खत्म होने की संभावनाओं के मद्देनजर विकराल ऊर्जा-संकट दरवाजे पर खड़ा है। इतना ही नहीं मिट्टी अपनी उर्वरता खो रही है, शुद्ध पेयजल स्रोत खत्म हो रहे हैं और आने वाले दिनों में साँस लेने के लिए स्वच्छ हवा मिलनी भी मुश्किल होने वाली है। इनसे भी अधिक दुखद यह है कि एक कोराना वायरस ने दुनिया को दहशत में ला खड़ा किया है। आधुनिक सभ्यता विभिन्न अंतर्विरोधों एवं अवरोधों में फँस गई है। इसका तथाकथित विकास-अभियान, वास्तव में मानव एवं मानवता के लिए महाविनाश का आख्यान बनने वाला है। इसके पास बढ़ती बेरोजगारी, गैरबराबरी एवं महामारी को रोकने और आतंकवाद, आणविक हथियार एवं पर्यावरण-असंतुलन से बचने का कोई उपाय नहीं है। ऐसे में, देश-दुनिया में आधुनिक सभ्यता की विकल्प की तलाश हो रही है। इस तलाश का हर रास्ता जहाँ आकर अर्थवान होता है, वह है- ‘गाँधी’। साफ-साफ कहें, तो ‘गाँधी’ में ही आधुनिक सभ्यता के सभी संकटों का सबसे बेहतर एवं कारगर समाधान मौजूद है। अतः, ‘गाँधी’ को जानना, समझना एवं अपनाना आज हमारी मजबूरी हो गई है। जाहिर है कि ‘गाँधी-विमर्श’ की आवश्यकता एवं उपयोगिता स्वयंसिद्ध है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम अगले तेरह दिनों में कुल तेरह प्रमुख समकालीन विमर्शों को ‘गाँधी-दृष्टि’ से देखने-समझने की कोशिश करेंगे। हम देखेंगे कि सवाल चाहे धर्म, राजनीति एवं शिक्षा का हो अथवा प्रौद्योगिकी, पर्यावरण एवं विकास का, सभी का जवाब गाँधी-दर्शन में ढूँढा जा सकता है। मुझे आशा है कि आप हमारे इस प्रयास को ‘नोटिस’ करेंगे। ‘संवाद’ एवं ‘प्रतिक्रिया’ की प्रतीक्षा में …।

 

Ambedkar। शिक्षा और सामाजिक न्याय : संदर्भ डाॅ. अंबेडकर

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शिक्षा और सामाजिक न्याय : संदर्भ डाॅ. अंबेडकर                              डाॅ. सुधांशु शेखर
अस्सिटेंट प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र विभाग,
बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा (बिहार)

डाॅ. भीमराव अंबेडकर एक दर्शनशास्त्री, अर्थशास्त्री, विधिवेक्ता, राजनीतिशास्त्री, संविधान विशेषज्ञ, समाज सुधारक, जननेता, धार्मिक उपदेशक एवं शिक्षाशास्त्री के रूप में देश-दुनिया में सुप्रसिद्व हैं। देश के पहले कानून मंत्री को भारत सरकार ने 1991 में भारत रत्न की उपाधि प्रदान कर अपनी मूल सुधार की और कुछ वर्षों पूर्व कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘सिम्बल आॕफ नाॅलेज’ अर्थात् ‘ज्ञान के प्रतीक’ के तौर पर मान्यता प्रदान कर अपने आपको गौरवान्वित किया है। कहना न होगा कि एक अछूत परिवार में जन्म लेने के बाद शिक्षा के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचना आसान नहीं रहा होगा। यह डाॅ. अंबेडकर की दृढ़ इच्छा शक्ति, अदम्य साहस एवं अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि वे सर्वकालीक महान विद्वानों में सुमार किए जाते है। ‘शिक्षित बनो संगठित रहो और संघर्ष करो’ उनके इस मंत्र ने करोड़ो लोगों की जिंदगी बदल दी। ऐसे योद्वा-विचारक के शिक्षा-दर्शन पर विचार करना अत्यंत प्रांसगिक है।

डाॅ. अंबेडकर के अनुसार सामाजिक न्याय की स्थापना में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनका विश्वास था कि शिक्षित बनना मनुष्य के चहुमुँखी विकास के लिए आवश्यक है। शिक्षा के अभाव में कोई भी व्यक्ति अपने कर्तव्यों एवं अधिकारों का निर्वहन एवं संरक्षण नहीं कर सकता है। सामाजिक न्याय एवं सार्वभौम मानवाधिकार की बातें भी शिक्षा के बिना ‘मिथक’ मात्र बनकर रह जाती हैं। स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुता जैसे उदात्त मूल्य भी तभी साकार रूप ले सकते हैं, जब समाज में शिक्षा का समुचित प्रचार-प्रसार हो। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि जब तक मन को स्वतंत्रता का उपयोग करने की शिक्षा न दी जाए, तब तक स्वतंत्रता का कोई मूल्य ही नहीं रहता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा प्राप्ति का अधिकार स्वतंत्रता की दृष्टि से परमावश्यक हो जाता है। किसी मनुष्य को ज्ञान से वंचित रखना, उसे अनिवार्य रूप से उन लोगों का गुलाम बना देना है, जो उससे अधिक सौभाग्यशाली हैं। ज्ञान से वंचित रखने का मतलब है, उस शक्ति को नकारना, जिससे व्यक्ति अपनी प्रगति के प्रति आवश्वस्त हो सके।

डाॅ. अंबेडकर शिक्षा को समाज-परिवर्तन का एक जरूरी औजार मानते थे।2 इसके जरिए वर्णाश्रम आदि सभी शोषणकारी व्यवस्थाओं को नष्ट किया जा सकता है, सभी प्रकार की कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर किया जा सकता है और सभी कृत्रिम बंधनों को तोड़कर मनुष्य को मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित करने का सपना साकार किया जा सकता है। इस तरह केवल शिक्षा ही समाज को रूढ़ियों एवं जड़ताओं से मुक्त कर सकती है और भारत के दलित-शोषित वर्गों में नई चेतना पैदा कर सकती है।3

अंबेडकर मानते थे कि आदमी केवल रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता, उसे मस्तिष्क भी मिला हुआ है, जिसे विचारों की खुराक की जरूरत है। यह खुराक शिक्षा के जरिए ही मिल सकती है, प्रत्येक व्यक्ति का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि उसे शिक्षा की पर्याप्त खुराक मिले। इसलिए शिक्षा का मार्ग सभी के लिए खुला होना चाहिए। सभी के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य रूप से शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षा रूपी रौशनी मात्र कुछ ही लोगों तक सीमित नहीं रहे और साक्षरता प्रचार हेतु प्रौढ़ शिक्षा की योजना लागू की जाए। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक सबों की पहुँच रहे इसके लिए जगह-जगह सरकारी एवं विद्यालय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। शिक्षा पर कम-से-कम उतनी राशि अवश्य खर्च की जाए, जितना लोगों से उत्पाद शुल्क के रूप में सरकार वसूलती है।4 दलित एव पिछड़ी जातियों के प्रतिभा संपन्न और बुद्धिमान छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा हेतु प्रोत्साहन राशि देने के लिए सरकारी कोष की व्यवस्था हो।

डाॅ. अंबेडकर मानवीय शिक्षा के समर्थक थे। उनके अनुसार, मानव हित एवं सामाजिक उत्थान ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। मानव विकास एवं उन्नति के लिए मन की शिक्षा-दीक्षा अनिवार्य है, जैसा कि बौद्ध शिक्षा का विश्वास है। यदि मन नियंत्रित हो जाए, तो मानव एवं समाज के बीच सौहार्द एवं समन्वय हो सकता है। शिक्षा ही एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा मानव स्वयं को प्रबुद्ध बनाकर सामाजिक शक्तियों को संगठित कर सकता है और जो अन्याय, शोषण तथा बुराईयों का अंत करने में सहायक है। संक्षेप में, शिक्षा एवं संगठन के अभाव में कोई आंदोलन और किसी प्रकार का उत्थान संभव नहीं हो सकता।5

इसलिए, डाॅ. अंबेडकर ने अनेक मुश्किलों का सामना करते हुए स्वयं उच्चतम शिक्षा प्राप्त किया और जीवनभर ‘शिक्षित बनो, संगठित होओ एवं संघर्ष करो’ का आचरण एवं उपदेश करते रहे। उन्होंने 1924 ई. में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ का गठन कर शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस सभा के माध्यम से वंचित वर्गों के लिए महाविद्यालय, छात्रावास, पुस्तकालय, अध्ययन केन्द्र आदि खोले गए। साथ ही ‘सरस्वती बेलास’ नामक एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया गया। सभा ने 1925 में सोलहपुर और बेलगाँव में छात्रावास और मुम्बई में दो छात्रावास के साथ-साथ एक मुफ्त अध्ययन केन्द्र की शुरूआत की। आगे डाॅ. अंबेडकर ने 1928 ई. में ‘डिप्रेस्ट क्लास एजूकेशनल सोसाइटी’ और 1945 में ‘लोक शिक्षित समाज’ की स्थापना की। इन दोनों संगठनों ने भी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डाॅ. अंबेडकर ने शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा का समर्थन किया। उन्होंने कहा है कि हमारी प्रगति में तीव्र गति से वृद्वि हा सकती है, यदि हम लड़को के साथ-साथ लड़कियों को भी शिक्षा दंे।6 डाॅ. अंबेडकर ने भारतीय स्त्रियों को धार्मिक एवं सामाजिक आडंबरों एवं जकड़नों से मुक्त करने के लिए सर्वप्रथम स्त्री-शिक्षा पर जोर दिया। उनका मानना था कि अगर स्त्रियों की शिक्षा को पुरूषों की शिक्षा के साथ-साथ आगे बढ़ाया जाए, तो हम जल्दी ही अच्छे दिन देखेंगे और हमारी प्रगति अत्यंत तीव्र होगी। उन्होंने स्त्रियों से कहा, ”बहिनो! हर समाज में स्त्री का अपना अलग ही महत्व होता है। जिस घर की स्त्री शिक्षित एवं सुसंस्कृत होती हैं, उसके बच्चे भी सदैव उन्नति के पथ पर अग्रसर रहते हैं। स्त्रियों से ही घर बनता और बिगड़ता है। … आप अपने बच्चों को खूब पढ़ाइए और इस देश का शासक बनाइए।“7 उन्होंने स्त्रियों को शिक्षित बनने के साथ-साथ चरित्रवान, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर भी बनने की सलाह दी। इस दिशा में डाॅ. अंबेडकर ने स्वयं भी भरपूर प्रयास किया। खासकर स्त्री-अधिकारिता से जुड़े ‘हिन्दू कोड बिल’ का निर्माण स्त्री-मुक्ति आंदोलन को उनकी अमूल्य देन है।8

‘शिक्षा’ एक दुधारी तलवार की तरह है। इसका अनुचित एवं उचित दोनों तरह से प्रयोग हो सकता है। मसलन, यथास्थितिवादी एवं रूढ़िगामी ताकतें शोषण-दमन एवं लूट-खसोट को जारी रखने के लिए शिक्षा का दुरुपयोग करती हैं। यदि शिक्षित व्यक्ति शीलवान नहीं हो, तो वह अपनी शिक्षा का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति और आम जनता को ढ़गने के लिए करता है। यही कारण है कि डाॅ. अंबेडकर ने शिक्षा के सकारात्मक उपयोग पर जोर दिया और इसके लिए नैतिकता या ‘शील’ का होना आवश्यक माना। उनके शब्दों में, “कोई पढ़ा-लिखा आदमी यदि शीलसंपन्न होगा, तो वह अपने ज्ञान का उपयोग लोगों के कल्याण के लिए करेगा, लेकिन यदि उसमें शील नहीं होगा, तो वह आदमी अपने ज्ञान का दुरुपयोग लोगों को नुकसान पहुँचाने के लिए करेगा।”9 शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मानव व्यवहार में साकारात्मक परिवर्तन कर उनका चारित्रिक विकास होना चाहिए। जो व्यक्ति चरित्रहीन एवं विनयरहित है, उनका जीवन पशु से भी गया गुजरा है। शिक्षा से विवेक पैदा होता है, जिससे अच्छे-बुरे का ज्ञान एवं निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है। यह मनुष्य को स्वयं के अधिकार एवं कर्तव्य समझाने में सहायक होती है।
डाॅ. अंबेडकर आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा के पक्षधर थे और औद्योगिक शिक्षा पर विशेष बल देते थे। उनके अनुसार गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, साहित्य एवं नीतिशास्त्र को शिक्षा का मुख्य पाठ्यक्रम होना चाहिए। साथ ही खेल-कूद, व्यायाम, स्वच्छता एवं स्वरोजगार को शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग बनाया जाना चाहिए। उनका मानना था कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की शिक्षा पाकर वंचित वर्ग अपनी भौतिक उन्नति कर सकता है, लेकिन वे नैतिक या चारित्रिक उन्नति की अवहेलना नहीं करना चाहते थे। यही कारण है कि उन्होंने हमेशा लोगों को धर्म या नैतिकता से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि डाॅ. अंबेडकर धर्म को मानव जीवन के लिए आवश्यक मानते थे, लेकिन धर्म के नाम पर कर्मकाण्ड एवं पाखंड के विरोधी थे। डाॅ. अंबेडकर चाहते थे कि शिक्षा पारलौकिक मूल्यों का खंडन करे और समाजोपयोगी लौकिक मूल्यों की सृजन में सहयेागी बने। यह वास्तविक मानव जीवन पर अवलंबित हो और सबों के लिए हितकारी बने। शिक्षा के द्वारा शिक्षार्थियों में सदगुण धारण करने की शक्ति का विकास होना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों का चरित्रवान होना आवश्यक है।

डाॅ. अंबेडकर के अनुसार शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत एवं सामाजिक मुक्ति का मार्ग भी है। वे शिक्षा के माध्यम से समाज में स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुता जैसे उदात्त मूल्यों का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे।

उनके अनुसार आदर्श शिक्षक केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि चरित्रावान भी होना चाहिए। शिक्षक व्यक्तिवादी विचारों से युक्त नहीं होना चाहिए। शिक्षक का दृष्टिकोण व्यापक हो और वह रूढ़ियों को तोड़ना एवं समाज को सम्यक् दिशा देने वाला यथार्थवादी होना चाहिए।

उन्होंने शिक्षकों के निम्न गुण बताए हैं10-
1. शिक्षक का शीलवान होना आवश्यक है- शिक्षक को हिंसा एवं जीव-हत्या नहीं करनी चाहिए। यह हत्या कर्म से ही नहीं, बल्कि मन और वचन से भी नहीं करनी चाहिए।

2. शिक्षक को चोरी, उठाईगीरी और किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं करना चाहिए।

3. शिक्षक को व्यभिचार और बलात्कार जैसे दुष्कर्मों से हमेशा दूर रहना चाहिए।

4. शिक्षक को सर्वदा सत्य का अनुशीलन करना चाहिए। उसे चुगलखोरी, कटु वचन, मिथ्या बकवास नहींे करनी चाहिए एवं सोच-समझकर संयम से बोलना चाहिए।

5. शिक्षक को शराब, भांग, गांजा, बीड़ी-सिगरेट, तम्बाकू एवं तम्बाकू से बने पदार्थो के सेवन से बचना चाहिए।

6. शिक्षक का प्रज्ञावान होना आवश्यक है। उसमें सत्य को सत्य और असत्य को असत्य को असत्य कहने अर्थात् दूध का दूध और पानी का पानी करने का गुण होना चाहिए।

7. शिक्षक में करूणा और दया की भावना का होना आवश्यक है, जिससे वह विद्यालय में निर्धन और कमजोर वर्ग के छात्रों की सभी प्रकार की सहायता कर सकें ।

8. शिक्षक में समानता का व्यवहार करने की भावना होनी चाहिए। उसमें जाति, अमीरी-गरीबी और समाज के किसी भी स्तर के आधार पर समान व्यवहार करने की भावना होनी चाहिए, अर्थात् उसमें पितृ एवं मातृतुल्य भावना होनी चाहिए।

9. शिक्षक का परिश्रमी होना अत्यंत आवश्यक है, जिसमें वह परिश्रम के साथ स्वयं अध्ययन कर सके और छात्रों को भी परिश्रम के साथ पढ़ा सकें।

10. शिक्षक के चरित्र में लोकतांत्रिक गुणों का समावेश होना चाहिए, जिससे छात्रों में लोकतांत्रिक एवं मानवतावादी गुणों का पैदा करके उन्हें स्थायी बना सके।

11. शिक्षक छात्र का पथ-प्रदर्शक होता है। उसे इस प्रकार की परिस्थियां एवं वातावरण का निर्माण करना चाहिए, जिससे बालक क्रियाशील रहे और जो शिक्षा प्राप्त कर रहा है, वह उसके भविष्य के जीवन में उपयोगी रहे।

डाॅ. अंबेडकर शिक्षकों के साथ-साथ विद्यार्थियों में भी ईमानदारी, परिश्रम एवं अन्य नैतिक गुणों का समावेश चाहते थे। वे यह मानते थे कि किसी समाज की प्रगति उस समाज के बुद्धिमान, कर्मठ एवं उत्साही विद्यार्थी पर निर्भर करता है। जब समाज जागृत, सुशिक्षित एवं स्वाभिमानी होगा, तभी उसका विकास होगा। अपने गरीब और अज्ञानी भाईयों की सेवा प्रत्येक शिक्षित नागरीक का प्रथम कर्तव्य है। अधिकांश लोक बड़े पद पाते ही अपने असंख्य अशिक्षित भाईयों को भूल जाते हैं। यह समाज के प्रति घोर अपराध है।

उन्होंने शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं आमजनों के लिए बौद्व धर्म का समर्थन किया है जो नैतिकता एवं सुशिक्षा का पर्याय है। बौद्व धर्मग्रंथ ‘महामंगलसूत्र’ में 35 नैतिक कर्म बताए गए हैं। ये हैं11 –
1. मूर्खों की संगति न करना, 2. बुद्विमानों की संगति करना, 3. पूज्यों की पूजा करना, 4. अनुकूल स्थानों पर निवास करना, 5. पूर्व जन्म के संचित पुण्य कका होना, 6. अपने को सन्मार्ग का लगाना, 7. बहुश्रुत होना, 8. शिल्प सीखना, 9. शिष्ट होना, 10. सुशिक्षित होना, 11. मीठा बोलना, 12. माता-पिता की सेवा करना, 13. पुत्र-स्त्री का पालन-पोषण करना, 14. व्यर्थ (गड़बड़) के काम न करना, 15. दान देना, 16. धर्माचरण करना, 17. बन्धु-बांधवों का आदर-सत्कार करना, 18. निर्दोष कार्य करना 19. मन-वचन और शरीर से पापों का त्यागना, 20. मद्यपान न करना, 21. धार्मिक कार्यो में तत्पर रहना, 22. गौरव करना, 23. नम्र होना, 24. संतुष्ट रहना, 25. कृतज्ञ होना, 26. उचित समय पर धर्म का श्रवण करना, 27. क्षमाशील होना, 28. आज्ञाकारी होना, 29. श्रमणों का दर्शन करना, 30. उचित समय पर धार्मिक चर्चा करना, 31. ब्रह्मचर्य का पालन करना, 32. चित्त को लोक धर्म से विचलित न करना, 33. निःशोक रहना, 34. निर्मल रहना और 35. निर्भय रहना।

डाॅ. अंबेडकर के अथक संघर्ष एवं दूरगामी सोच की ही यह फलश्रुति है कि आज दलितों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं शैक्षणिक स्थिति कुछ बेहतर हुई है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे नव विकसित दलितों में भी प्रायः सभी ब्राह्मणवादी बुराइयाँ घर कर गई हैं। ये नवब्राह्मणवादी दलित भी यह चाहते हैं कि दलितों के लिए निर्धारित सभी हक-अधिकार एवं सुविधाएँ उनके ही हिस्से आएँ, इसमें सामान्य दलितों की हिस्सेदार एवं भागीदारी नहीं हो। ऐसे स्वार्थी दलितों के बारे में डाॅ. अंबेडकर ने स्वयं कहा था, “मैं जो कुछ भी प्राप्त कर सका, उनसे कुछ पढ़े-लिखे लोग ही मजे ले रहे हैं। वे अपने कपटपूर्ण क्रियाकलापों के कारण बिल्कुल व्यर्थ हैं। उनके मन में अपने दलित भाइयों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। … वे केवल अपने लिए और अपने हित लाभ के लिए जी रहे हैं।”12

डाॅ. अंबेडकर की यह पीड़ा मौजूदा शिक्षा-व्यवस्था के लिए भी एक सबक है। आखिर क्यों हम शिक्षित तबकों में मानवीय मूल्यों, नैतिक संस्कारों एवं सामाजिक सरोकारों को भर पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं या इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं!

डाॅ. अंबेडकर एक महान राष्ट्रभक्त और भारतीयता के प्रबल समर्थक थे। इसलिए वे पश्चिमी-शिक्षा की बजाय भारतीय परंपरा से निकली बौद्ध-शिक्षा की हिमायत करते थे, लेकिन दुर्भाग्य से अंबेडकर की बातों को ठीक ढंग से नहीं समझा गया।13 उनके द्वारा हिंदू धर्म के विरोध को भारतीयता का विरोध एवं पश्चिमीकरण का समर्थन मान लिया गया, लेकिन यह अंबेडकर-दर्शन की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है।

ऐसे में हमें पुनः बौद्ध-दर्शन में निहित भारत की सच्ची शिक्षा-नीति के आलोक में अपनी नई वैज्ञानिक एवं लोकतांत्रिक शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्निर्माण की जरूरत है। लेकिन, स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भी अक्षर-ज्ञान एवं पश्चिमी विज्ञान को ही अपना आदर्श माना और तथाकथित प्रगतिशिलता के नाम पर नीति एवं धर्म से शिक्षा का संबंध-विच्छेद कर दिया। यह स्थिति आज भी कायम है। हमारी सरकारें दर्शनशास्त्र एवं साहित्य आदि के अध्ययन-अध्यापन की उपेक्षा कर एमबीए, मैनेजमेंट आदि पाठ्îक्रमों को बढ़ावा दे रही है।14 अपने आपको डाॅ. अंबेडकर का अनुयायी कहने वाले कुछ तथाकथित दलित विचारक भी ‘अंग्रेजी माता’ एवं ‘मैनेजमेंट पिता’ के सहारे दलितोत्थान का ख्वाब देख रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ‘अंग्रेजी-मैनेजमेंट’ के सहारे एक दो प्रभुवर्गीय ब्राह्मण या दलित का विकास भले हो जाए, सर्वोदय या सामाजिक न्याय कभी नहीं आ सकता।

संदर्भ
1. चन्द्र, सुभाष; डाॅ. अंबेडकर से दोस्ती: समता एवं मुक्ति, साहित्य उपक्रम, नई दिल्ली, पृ. 25-27.

2. अंबेडकर, डाॅ. बी. आर.; डाॅ. अंबेडकर ने कहा, संपादक: अनीता कुमारी, गौतम बुक सेंटर, दिल्ली, संस्करण-2010, पृ. 13.

3. प्रज्ञाचक्षु, डाॅ. सुकन पासवान; केवल दलितों के मसीहा नहीं हैं अंबेडकर, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, 2011, पृ. 134.

4. अंबेडकर, डाॅ. बी. आर.; बाबा साहेब अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड: 3, प्रधान संपादक: डाॅ. श्याम सिंह शशि, संपादक: कैलाश चंद्र सेठ एवं भारतीय नरसिंहमन, डाॅ. अंबेडकर प्रतिष्ठान, कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-मार्च 1994, पृ. 56.

5. जाटव, डाॅ. डी. आर.; डाॅ. अंबेडकर का मानववादी चिंतन, समता साहित्य सदन, जयपुर (राजस्थान), प्रथम संस्करण-1993, पृ. 10.

6. हिलसायन, सुधीर; ‘ज्ञान के प्रतीक बाबा साहेब डाॅ. अंबेडकर’, सामाजिक न्याय संदेश, डाॅ. अंबेडकर फाउंडेशन, नई दिल्ली, जुलाई 2016, पृ. 2.

7. अंबेडकर, डाॅ. बी. आर; बाबा साहेब अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड: 3, पूर्वोक्त, पृ. 186.

8. भारती, कँवल; समाजवादी आंबेडकर, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, 2009, पृ. 150-151.

9. अंबेडकर, डाॅ. बी. आर.; और बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा …, खंड: 5, संपादक: डाॅ. एल. जी. मेश्राम ‘विमलकीत्र्ति’, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2008, पृ. 148.

10. सुत्तनिपात, 2/4 महामंगलसुत्त.

11. डाॅ. धर्मकीर्ति; ‘डाॅ. अंबेडकर और उनका शिक्षा-सिद्वांत’, सामाजिक न्याय संदेश, डाॅ. अंबेडकर फाउंडेशन, नई दिल्ली, जुलाई 2014, पृ. 14-15.

12. रत्तु, नानक चंद; डाॅ. अंबेडकर: जीवन के अंतिम कुछ वर्ष, अनुवादक: डाॅ. आर. बी. लाल, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008.

13. शेखर, सुधांशु; ‘शिक्षा और सामाजिक न्याय: संदर्भ डाॅ. अंबेडकर’, अनुप्रयुक्त दर्शन तथा नीतिशास्त्र के आयाम, संपादक:अम्बिकादत्त शर्मा, कंचन सक्सेना, शैलेश कुमार सिंह एवं दिलीप चारण, अखिल भारतीय दर्शन परिषद्, भारत एवं न्यू भारतीय बुक काॅरपोरेशन, नई दिल्ली, 2013, पृ. 276.

14. शेखर, सुधांशु; सामाजिक न्याय : अंबेडकर-विचारऔर आधुनिक संदर्भ, दर्शना पब्लिकेशन, भागलपुर (बिहार), 2014, पृ. 46.
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SUDHANSHU SHEKHAR

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