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BNMU। यूजीसी केयर लिस्टेड जर्नल के समीक्षक मनोनीत हुए डॉ• आनन्द मोहन झा

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*यूजीसी केयर लिस्टेड जर्नल के समीक्षक मनोनीत हुए डॉ• आनन्द मोहन झा*

भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा की अंगीभूत इकाई मनोहरलाल टेकरीवाल महाविद्यालय, सहरसा (पूर्व नाम सहरसा कॉलेज, सहरसा), के रसायन विज्ञान के अतिथि सहायक प्राध्यापक डॉ• आनन्द मोहन झा को यूजीसी केयर लिस्टेड जर्नल “इंटरनेशनल जर्नल आफ लाइफसाइंस एंड फार्मा रिसर्च” का समीक्षक मनोनीत किया गया है। समीक्षक मनोनयन के बाद उन्होंने कुछ अंतरराष्ट्रीय देशों के शोधकर्ताओं द्वारा भेजे गए शोध पत्रों की समीक्षा भी की है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ लाइफसाइंस एंड फार्मा रिसर्च एक बहुत ही महत्वपूर्ण शोध पत्रिका है। इस शोध पत्रिका का उद्देश्य एशिया एवं अन्य देशों में लाइफसाइंस और फार्मा के सभी क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाले शोध प्रकाशित करना है। चयन समिति ने उनकी प्रोफाइल, शिक्षण कार्य, शोध कार्य के आधार पर डॉ• आनन्द मोहन झा को समीक्षक मनोनीत किया तथा एडिटोरियल बोर्ड का सदस्य भी बनाया है। इनको समीक्षक मनोनीत करने से भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा तथा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा दोनों विश्वविद्यालय की गरिमा बढीं है। उनके अभी तक 17 से अधिक शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। इनमें प्रमुख टेलर एंड फ्रांसिस के सुप्रामोलीक्यूलर केमेस्ट्री जर्नल, हेटेरोसाइक्लिक लेटर्स, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ लाइफसाइंस एंड फार्मा रिसर्च, जर्नल आफ बायोलॉजिकल एंड केमिकल क्रानिकल्स, एशियन जर्नल ऑफ केमेस्ट्री, इंडियन जर्नल ऑफ हेटरोसाइक्लिक केमेस्ट्री आदि प्रमुख है। वे अब तक 15 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय सेमिनार में भाग लिए तथा अपना ओरल प्रेजेंटेशन भी दिए। कुछ जगह इनवाइटेड गेस्ट के रुप में भी अपना व्याख्यान दिए है। इन्होंने अभी तक 200 से अधिक अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय वेबीनार में भाग लिया है। तथा एक अंतरराष्ट्रीय वेबीनार का आयोजन सफलतापूर्वक आयोजक सचिव के रूप में भी किए है। इससे पहले भी इन्हे पढ़ाई तथा शोध के क्षेत्र मे उत्कृष्ट योगदान के लिए 12 सितंबर 2020 को बेंगलुरू में ‘एम•टी•सी• ग्लोबल इंस्पायरिंग टीचर अवार्ड, रसायनशास्त्र, से सम्मानित किया गया था। भारत सरकार के द्वारा नीति आयोग से पंजीकृत संस्था एम•टी•सी• ग्लोबल के द्वारा यह अवार्ड मिला था। इन्हे आई• एम• आर• एफ• बेस्ट रिसर्चर अवॉर्ड, रसायनशास्त्र – 2020 से भी सम्मानित किया जा चुका है। इन्हें एकेडमिक एक्सीलेंस अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। डॉ• झा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से स्नातक उत्तीर्ण हुए जिसमें उन्होंने पूरे विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र में प्रथम स्थान प्राप्त किया, तथा स्नातकोत्तर में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के वर्ष 2014 के पीजी के ओवरऑल टॉपर (बेस्ट पोस्टग्रेजुएट) तथा रसायन शास्त्र के टॉपर होने के कारण बिहार के उस वक्त के महामहिम कुलाधिपति जो वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति है उनके द्वारा दो गोल्ड मेडल देकर उनको सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में पहली बार ही पीएचडी के लिए पीआरटी की परीक्षा 2016 में दी और रसायन शास्त्र में प्रथम स्थान प्राप्त किया तथा यूजीसी विनियम 2009 के अंतर्गत पीएचडी की डिग्री भी 2019 में प्राप्त किया। इसके बाद इन्होंने भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा में अतिथि सहायक प्राध्यापक का साक्षात्कार दिया तथा वहां भी इन्होंने पूरे विश्वविद्यालय में साक्षात्कार के उपरांत रसायन शास्त्र में प्रथम स्थान प्राप्त किया तथा इनकी प्रथम पोस्टिंग मनोहरलाल टेकरीवाल कॉलेज सहरसा में हुआ जो सहरसा का एकमात्र पोस्ट ग्रेजुएट अंगीभूत महाविद्यालय है। इनकी रसायनशास्त्र की 2 बुक चैप्टर जो इंटरनेशनल बुक पब्लिशर के द्वारा 2 अलग-अलग पुस्तकों में पब्लिश्ड हो चुकी है, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। इन्हे आई• एम• आर• एफ• के 119th अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में “यंग साइंटिस्ट अवार्ड” से भी सम्मानित किया जा चुका है तथा इन्हे ‘एम•टी•सी• ग्लोबल डिस्टिंग्विश्ड टीचर अवार्ड, रसायनशास्त्र, से भी सम्मानित किया जा चुका हैं। वह एक यूजीसी का माइनर रिसर्च प्रोजेक्ट भी सफलतापूर्वक पूरा कर चुके है। वह बहुत सारे संस्था के लाइफ टाइम मेंबर भी है। जिनमें एमटीसी ग्लोबल, इंटरनेशनल मल्टीडिसीप्लिनरी रिसर्च फाउंडेशन, इंस्टिट्यूट ऑफ स्कॉलर इत्यादि प्रमुख है। ये सभी कार्य उनके करी मेहनत और गुरुजनों के मार्गदर्शन का ही नतीजा है। इन सभी का श्रेय वे अपने माता पिता एवं गुरुजनों को देते हैं, आज वह जो कुछ भी हैं वह अपने माता पिता एवं गुरुजनों के आशीर्वाद का ही फल है। डाॅ• झा की इस उपलब्धि से संपूर्ण मिथिलांचल ,कोसी एवं सीमांचल में हर्ष का माहौल कायम है।

BNMU। मधेपुरा : कल, आज और कल विषयक वेबिनार का आयोजन

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मधेपुरा : कल, आज और कल विषयक वेबिनार का आयोजन

मधेपुरा का अतीत काफी गौरवशाली रहा है। इस क्षेत्र से कई महान ॠषियों-मुनियों, भिक्षुओं, स्वतंत्रता सेनानियों एवं राष्ट्र निर्माताओं का नाम जुड़ा हुआ है। हमें अपनी प्राचीन गरिमा को याद रखते हुए वर्तमान का मूल्यांकन करना है और उज्जवल भविष्य की रूपरेखा तय करनी है। हम सबों को मिलकर मधेपुरा के समग्र विकास में अपनी-अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी है।यह बात बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के कुलपति प्रोफेसर डॉ. आर. के. पी. रमण ने कही। वे मधेपुरा जिले के 40 वें स्थापना दिवस के अवसर पर मधेपुरा यूथ ऐसोसिएशन (माया) के द्वारा आयोजित ऑनलाइन वेबिनार का उद्घाटन कर रहे थे। वेबिनार का विषय मधेपुरा : कल, आज और कल (शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार) था।

कुलपति ने कहा कि जिले में शिक्षा की बेहतर व्यवस्था है। इसमें संसाधनों की कमी दूर करने और गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में कार्य करना है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सुविधाएँ बढ़ाने की जरूरत है। मधेपुरा में कृषि एवं पशुपालन आधारित रोजगार की अपार सम्भावनाएँ हैं।

कुलपति ने कहा कि सबसे पहले हमें शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करना होगा। यदि शिक्षा सर्वोत्तम हो, तो स्वास्थ्य एवं रोजगार के लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलती है।

कुलपति ने सभी लोगों से अपील की कि कोरोना संक्रमण की इस घड़ी में अपना एवं अपने परिजनों का ख्याल रखें। साथ ही मधेपुरा के आम नागरिकों की रक्षा के लिए सभी प्रयत्न करें।उन्होंने कहा कि उन्हें गर्व है कि उनका जन्म मधेपुरा की पावन धरती पर हुआ है। उन्होंने स्थापना दिवस के अवसर पर सभी जिलेवासियों को बधाई एवं शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि मधेपुरा के लोगों के चेहरे पर हमेशा मुस्कान बनी रहे।

शिक्षा: कल, आज और कल पर विचार व्यक्त करते हुए बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के सिंडिकेट सदस्य डॉ. जवाहर पासवान ने कहा कि हमें सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाना होगा। हमें ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि बच्चे को विद्यालय में सिर्फ भोजन एवं पोशाक नहीं मिले, बल्कि उन्हें मानसिक विकास का खुराक भी मिले।

उपकुलसचिव (अकादमिक) डॉ. सुधांशु शेखर ने कहा कि हमें मधेपुरा में शिक्षा के क्षेत्र में पूँजी निवेश को बढ़ाना होगा और यहाँ से प्रतिभाओं का पलायन भी रोकना होगा। साथ ही इस मिट्टी से निकलकर देश-दुनिया में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे लोगों को एक साथ जोड़ना होगा।सदस्य माया सह सचिव जिला कबड्डी संघ, मधेपुरा अरुण कुमार ने खेल : कल, आज और कल विषय पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मधेपुरा की प्रतिभाओं को समुचित अवसर देने की जरूरत है। उन्होंने मधेपुरा में निर्मित हो रहे रेलवे इंजन पर मधेपुरा का नाम अंकित नहीं होने पर चिंता व्यक्त की।

स्वास्थ्य : कल, आज और कल विषय पर विचार व्यक्त करते हुए सचिव, आईएमए, मधेपुरा के सचिव डा. दिलीप सिंह ने कहा कि आज महामारी के दौर में चिकित्सक समुदाय अपनी जान पर खेलकर लोगों की सेवा में लगे हैं। यहाँ कई जिले के लोगों का इलाज हो रहा है।

मधेपरा की बेटी सह कटिहार में कार्यरत न्यायिक दंडाधिकारी जयश्री कुमारी ने कहा कि हम सभी मधेपुरा के विकास में अपना-अपना योगदान दें।

रोजगार : कल, आज और कल विषय पर फिश फीड उधोग के ज्योति मंडल एवं संवेदक मनोज कुमार ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि मधेपुरा में रोजगार की अपार संभावनाएँ हैं। उन संभावनाओं को आगे लाने की जरूरत है।विषय प्रवेश माया के संरक्षक सह अध्यक्ष प्राइवेट स्कूल एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन, मधेपुरा के अध्यक्ष किशोर कुमार ने किया। उन्होंने कहा कि मधेपुरा जिला का ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से काफी महत्व है। यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं पर्यटन की भी अपार संभावनाएँ हैं।

अध्यक्षता करते हुए माया, मधेपुरा के अध्यक्ष राहुल कुमार यादव ने कहा कि मधेपुरा यूथ ऐसोसिएशन (माया) की स्थापना 12 जनवरी, 2015 को मधेपुरा के कुछ युवाओं ने मिलकर किया था। इसका विधिवत पंजीकरण ट्रष्ट के रूप में 26 नवम्बर, 2018 को किया गया। ‘माया’ युवाओं की उर्जा को सकारात्मक एवं सृजनात्मक दिशा देने के संकल्प के साथ स्वच्छ, सुंदर एवं समृद्ध मधेपुरा के लिए प्रयासरत है। संगठन ने मधेपुरा में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार एवं पर्यावरण आदि को केंद्र में रखकर काफी काम किया है। विश्वविद्यालय और जन नायक कर्पूरी ठाकुर चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल में भी छात्रहित एवं जनहित के मुद्दों को लेकर सक्रिय है। संगठन द्वारा पूर्व में भी सेमिनार, परिचर्चा, गोष्ठी आदि के आयोजन होते रहे हैं, जिनम कुछ दिनों पूर्व नदी संरक्षण विषय पर आयोजित सेमिनार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। संप्रति मधेपुरा : कल, आज और कल विषयक यह वेबिनार भी उसी दिशा में एक कदम है।

कार्यक्रम की शुरूआत अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। स्वागत भाषण माया के सदस्य सह कोसी टाइम्स के संपादक प्रशांत कुमार ने दिया। शिवाली कुमारी ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। संचालन माया के संरक्षक सह न्यूज18 के संवाददाता तुरबसू बंटी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन माया के कोषाध्यक्ष सुधांशु कुमार ने किया।

इस अवसर पर डॉ श्लेषा सचिन्द्र (नई दिल्ली), अमित बिमल (नोएडा), मधेपुरा टाइम्स के संस्थापक राकेश सिंह, भाजपा नगर अध्यक्ष अंकेश गोप, निदेशक गौतम इंफोटेक अमित गौतम, निदेशक आर आर ग्रीन फील्ड राजेश राजू, अमित बलटन, सतीश कुमार, आशीष सोना, अमित कुमार, माया उपाध्यक्ष सौरव यादव, सचिव अविनाश कुमार, बबलू यादव, राजेश कुमार, बबलू पासवान, गुड़िया कुमारी, संजय कुमार, साजन कुमार, सज्जन कुमार,अनुराग,रंजीत, रमण, अरविंद मिश्रा, चंदन प्रताप, आदित्य राज,कुंदन राय, संजीव कुमार, रोहित कुमार, सपना कुमारी, पूजा सिंह, राहुल कुमार, गुलशन कुमार आदि उपस्थित थे। मधेपुरा के बाहर रह रहे कई अन्य गणमान्य भी इस कार्यक्रम में उपस्थित हुए और अपनी शुभकामनाएं दीं।

कार्यक्रम के अंत में कोरोना संक्रमण के कारण दिवंगत हुए सभी लोगों की की आत्मा की शांति की कामना की गई और ईश्वर से प्रार्थना की गई कि वे उनके परिजनों को दुख सहने की क्षमता प्रदान करें।

Education। नागेश्वर शर्मा नहीं रहे

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नागेश्वर शर्मा नहीं रहे
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राज्य के उच्च शिक्षा निदेशक एवं बिहार इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद के अध्यक्ष रह चुके जाने-माने शिक्षाविद डॉ. नागेश्वर प्रसाद शर्मा नहीं रहे।

पटना विश्वविद्यालय के भौतिकी के प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त डॉ. शर्मा 89 साल के थे। उन्होंने एक मई को तड़के पटना में अपने लोहानीपुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। वे अपने पीछे दो पुत्र एवं दो पुत्री सहित भरे-पूरे परिवार तथा अपने चाहने वालों को शोक-संतप्त छोड़ गये हैं। उनका जन्म पटना जिले के मसौढ़ी के तिनेरी गांव में हुआ था। स्कूली शिक्षा के बाद उनकी पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय में हुई। पटना विश्वविद्यालय से एमएससी करने के बाद पटना विश्वविद्यालय में ही उन्होंने शिक्षण कार्य प्रारंभ किया।
उन्होंने इंग्लैंड से पीएचडी की। वे इराक के बगदाद में अस्टिटेंट प्रोफेसर एवं लीबिया के त्रिपोली में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे।
शिक्षा व्यवस्था पर उन्होंने कई किताबें लिखीं। इनमें बिहार के ढहते विश्वविद्यालय, इंटर काउंसिल: एक हकीकत, बिहार का सिसकता शिक्षा- तंत्र, हायर एजुकेशन सुर्खियों में रही। उन्होंने भौतिकी की भी कई किताबें लिखीं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुईं। भौतिकी पर उनकी एक किताब लीबिया से भी प्रकाशित है। सांस तोड़ने के पहले वे शिक्षा व्यवस्था पर एक और किताब पूरी कर चुके थे।

-Lakshmikant Sajal जी का फेसबुक पोस्ट

BNMU। 40वें स्थापना दिवस पर मधेपुरा के समग्र विकास का संकल्प

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मधेपुरा : कल, आज और कल विषयक वेबिनार का आयोजन

मधेपुरा का अतीत काफी गौरवशाली रहा है। इस क्षेत्र से कई महान ॠषियों-मुनियों, भिक्षुओं, स्वतंत्रता सेनानियों एवं राष्ट्र निर्माताओं का नाम जुड़ा हुआ है। हमें अपनी प्राचीन गरिमा को याद रखते हुए वर्तमान का मूल्यांकन करना है और उज्जवल भविष्य की रूपरेखा तय करनी है। हम सबों को मिलकर मधेपुरा के समग्र विकास में अपनी-अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी है।

यह बात बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के कुलपति प्रोफेसर डॉ. आर. के. पी. रमण ने कही। वे मधेपुरा जिले के 40 वें स्थापना दिवस के अवसर पर मधेपुरा यूथ ऐसोसिएशन (माया) के द्वारा आयोजित ऑनलाइन वेबिनार का उद्घाटन कर रहे थे। वेबिनार का विषय मधेपुरा : कल, आज और कल (शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार) था।कुलपति ने कहा कि जिले में शिक्षा की बेहतर व्यवस्था है। इसमें कुछ संसाधनों की कमी दूर करने और गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में कार्य करना है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सुविधाएँ बढ़ाने की जरूरत है। मधेपुरा में कृषि एवं पशुपालन आधारित रोजगार की अपार सम्भावनाएँ हैं।

कुलपति ने कहा कि सबसे पहले हमें शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करना होगा। यदि शिक्षा सर्वोत्तम हो, तो स्वास्थ्य एवं रोजगार के लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलती है।

कुलपति ने सभी लोगों से अपील की कि कोरोना संक्रमण की इस घड़ी में अपना एवं अपने परिजनों का ख्याल रखें। साथ ही मधेपुरा के आम नागरिकों की रक्षा के लिए सभी प्रयत्न करें।

उन्होंने कहा कि उन्हें गर्व है कि उनका जन्म मधेपुरा की पावन धरती पर हुआ है। उन्होंने स्थापना दिवस के अवसर पर सभी जिलेवासियों को बधाई एवं शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि मधेपुरा के लोगों के चेहरे पर हमेशा मुस्कान बनी रहे।

शिक्षा : कल, आज और कल पर विचार व्यक्त करते हुए बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के सिंडिकेट सदस्य डॉ. जवाहर पासवान ने कहा कि हमें सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाना होगा। हमें ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि बच्चे को विद्यालय में सिर्फ भोजन एवं पोशाक नहीं मिले, बल्कि उन्हें मानसिक विकास का खुराक भी मिले।

उपकुलसचिव (अकादमिक) डॉ. सुधांशु शेखर ने कहा कि हमें मधेपुरा में शिक्षा के क्षेत्र में पूँजी निवेश को बढ़ाना होगा और यहाँ से प्रतिभाओं का पलायन भी रोकना होगा। साथ ही इस मिट्टी से निकलकर देश-दुनिया में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे लोगों को एक साथ जोड़ना होगा।

सदस्य माया सह सचिव जिला कबड्डी संघ, मधेपुरा अरुण कुमार ने खेल : कल, आज और कल विषय पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मधेपुरा की प्रतिभाओं को समुचित अवसर देने की जरूरत है। उन्होंने मधेपुरा में निर्मित हो रहे रेलवे इंजन पर मधेपुरा का नाम अंकित नहीं होने पर चिंता व्यक्त की।

स्वास्थ्य : कल, आज और कल विषय पर विचार व्यक्त करते हुए सचिव, आईएमए, मधेपुरा के सचिव डा. दिलीप सिंह ने कहा कि आज महामारी के दौर में चिकित्सक समुदाय अपनी जान पर खेलकर लोगों की सेवा में लगे हैं। यहाँ कई जिले के लोगों का इलाज हो रहा है।

मधेपरा की बेटी सह कटिहार में कार्यरत न्यायिक दंडाधिकारी जयश्री कुमारी ने कहा कि हम सभी मधेपुरा के विकास में अपना-अपना योगदान दें।

रोजगार : कल, आज और कल विषय पर फिश फीड उधोग के ज्योति मंडल एवं संवेदक मनोज कुमार ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि मधेपुरा में रोजगार की अपार संभावनाएँ हैं। उन संभावनाओं को आगे लाने की जरूरत है।

विषय प्रवेश माया के संरक्षक सह अध्यक्ष प्राइवेट स्कूल एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन, मधेपुरा के अध्यक्ष किशोर कुमार ने किया। उन्होंने कहा कि मधेपुरा जिला का ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से काफी महत्व है। यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं पर्यटन की भी अपार संभावनाएँ हैं।

अध्यक्षता करते हुए माया, मधेपुरा के अध्यक्ष राहुल कुमार यादव ने कहा कि मधेपुरा यूथ ऐसोसिएशन (माया) की स्थापना 12 जनवरी, 2015 को मधेपुरा के कुछ युवाओं ने मिलकर किया था। इसका विधिवत पंजीकरण ट्रष्ट के रूप में 26 नवम्बर, 2018 को किया गया। ‘माया’ युवाओं की उर्जा को सकारात्मक एवं सृजनात्मक दिशा देने के संकल्प के साथ स्वच्छ, सुंदर एवं समृद्ध मधेपुरा के लिए प्रयासरत है। संगठन ने मधेपुरा में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार एवं पर्यावरण आदि को केंद्र में रखकर काफी काम किया है। विश्वविद्यालय और जन नायक कर्पूरी ठाकुर चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल में भी छात्रहित एवं जनहित के मुद्दों को लेकर सक्रिय है। संगठन द्वारा पूर्व में भी सेमिनार, परिचर्चा, गोष्ठी आदि के आयोजन होते रहे हैं, जिनम कुछ दिनों पूर्व नदी संरक्षण विषय पर आयोजित सेमिनार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। संप्रति मधेपुरा : कल, आज और कल विषयक यह वेबिनार भी उसी दिशा में एक कदम है।

कार्यक्रम की शुरूआत अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। स्वागत भाषण माया के सदस्य सह कोसी टाइम्स के संपादक प्रशांत कुमार ने दिया। शिवाली कुमारी ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। संचालन माया के संरक्षक सह न्यूज18 के संवाददाता तुरबसू बंटी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन माया के कोषाध्यक्ष सुधांशु कुमार ने किया।

इस अवसर पर डॉ श्लेषा सचिन्द्र (नई दिल्ली), अमित बिमल (नोएडा), मधेपुरा टाइम्स के संपादक राकेश सिंह, भाजपा नगर अध्यक्ष अंकेश गोप, निदेशक गौतम इंफोटेक अमित गौतम, निदेशक आर आर ग्रीन फील्ड राजेश राजू, अमित बलटन, सतीश कुमार, आशीष सोना, अमित कुमार, माया उपाध्यक्ष सौरव यादव, सचिव अविनाश कुमार, बबलू यादव, राजेश कुमार, बबलू पासवान, गुड़िया कुमारी, संजय कुमार, साजन कुमार, सज्जन कुमार,अनुराग,रंजीत, रमण, अरविंद मिश्रा, चंदन प्रताप, आदित्य राज,कुंदन राय, संजीव कुमार, रोहित कुमार, सपना कुमारी, पूजा सिंह, राहुल कुमार, गुलशन कुमार आदि उपस्थित थे। मधेपुरा के बाहर रह रहे कई अन्य गणमान्य भी इस कार्यक्रम में उपस्थित हुए और अपनी शुभकामनाएं दीं।

कार्यक्रम के अंत में कोरोना संक्रमण के कारण दिवंगत हुए सभी लोगों की की आत्मा की शांति की कामना की गई और ईश्वर से प्रार्थना की गई कि वे उनके परिजनों को दुख सहने की क्षमता प्रदान करें।

 

Philosophy। प्रो. सुरेन्द्र सिंह नेगी का निधन

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सादर नमन

दर्शनशास्त्र विभाग, हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र सिंह नेगी का 8 मई, 2021 को निधन हो गया।
💐 श्रद्धा़ंजलि💐
.

BNMU। कोरोना से जंग : वीडियो कांफ्रेंसिंग में भागीदारी

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*वीडियो कांफ्रेंसिंग में भागीदारी*

कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार के निदेशानुसार बिहार राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कार्यक्रम समन्वयकों, जिला नोडल पदाधिकारियों, कार्यक्रम पदाधिकारियों और सक्रिय स्वयंसेवकों की एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मीटिंग 6 मई, 2020 को अपराह्न 12.15 बजे से आयोजित की गई। इसके माध्यम से कोराना के खिलाफ जारी जंग में शामिल योद्धाओं (स्वयंसेवकों) को आवश्यक प्रशिक्षण (ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स) दिया जाएगा।

इस अवसर पर मंत्री, कला संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार प्रमोद कुमार ने कोरोना वायरस से बचाव के संबंध में मार्गदर्शन दिया।

उन्होंने कहा कि संपूर्ण भारत विश्विक कोरोना महामारी से प्रभावित है। बिहार भी इससे अछूता नहीं है। बिहार में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 536 हो गई है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। यहाँ सुरक्षा के प्रति जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसमें राष्ट्रीय सेवा योजना की महती भूमिका है। राष्ट्रीय सेवा योजना की स्थापना महात्मा गाँधी के जन्म शताब्दी वर्ष 1969 ई. में की गई है। इसका सूत्र वाक्य है मैं नहीं आप। यह विद्यार्थियों को संवेदनशील बनाता है और समाज एवं राष्ट्र के लिए जीने की प्रेरणा देता है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के अंदर सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना है।

उन्होंने बताया कि बिहार देश का सबसे युवा राज्य है। यहाँ एनएसएस के लगभग 66 हजार 800 स्वयंसेवक हैं। एनएसएस के माध्यम से जिला प्रशासन के साथ मिलकर राज्य में जनजागरूकता एवं राहत अभियान चलाया जा रहा है। बैंक, हाट, बाजार आदि में सोशलडिस्टेंसिंग का पालन कराने में सहयोग किया जा रहा है। आरोग्य सेतु एप डाउनलोड कराया गया है। बड़ी संख्या में मास्क, साबुन एवं सेनेटाइजर और भोजन पैकेट का वितरण किया गया है।

कार्यक्रम में कई विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं का कहना था कि कोरोना से सावधान रहना जरूरी है, लेकिन इससे डरना नहीं है। विभिन्न सावधानियाँ रखने से कोरोना संक्रमण से बचा जा सकता है। कोरोना से मृत्युदर काफी कम है। बिहार में चार लोगों की कोरोना से मौत हुई है। चारों पहले से दूसरे असाध्य बीमारियों से ग्रसित थे। दो किडनी और दो कैंसर के मरीज थे।

वक्ताओं ने कहा कोरोना या किसी भी बीमारी के संबंध में अफवाहों से बचें। कोई भी फेक मेसेज वाट्सप, फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया में शेयर नहीं करें। बीमार व्यक्ति से घृणा नहीं करें। स्वास्थ्यकर्मियों एवं अन्य कोरोना वारियर्स के साथ अच्छा व्यवहार करें।

युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के राष्ट्रीय निदेशक सौरभ साह ने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना का काफी महत्व है।

हम सुरक्षा मानकों का शत-प्रतिशत पालन करें। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। बार-बार साबुन या सेनेटाइजर से हाथ धोएं। जो भी लोग बाहर से आ रहे हैं, उनका ट्रैवल हिस्ट्री पता करें। चिकित्सकों एवं अन्य कोरोना वारियर्स के साथ अच्छा व्यवहार करें।

उन्होंने कहा कि जैसे हमने पोलियो को अभियान चलाकर हराया, वैसे ही हम कोरोना को भी हराएँगे। यह लड़ाई लंबी है। लेकिन एक दिन कोरोना हारेगा-देश जीतेगा।

राष्ट्रीय सेवा योजना के राष्ट्रीय निदेशक सौरभ साह ने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना ने शुरू से ही समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहा है। यह कोरोना संक्रमण से बचाव में भी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहा है।

उन्होंने बताया कि वे मूलतः बिहार के ही निवासी हैं और वे पुलिस अधिक्षक के रूप में मधेपुरा में भी काम कर चुके हैं। आगे वे बिहार में एनएसएस की गतिविधियों को गति देंगे। एनएसएस स्वयंसेवकों को कैरियर में भी मदद मिले, इसके पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं।

कार्यक्रम के आयोजन में एनएसएस के क्षेत्रीय निदेशक, पटना विनय कुमार ने महती भूमिका निभाई। इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, नेहरू युवा केन्द्र आदि की भी महती भागीदारी रही।

बीएनएमयू के एनएसएस समन्वयक डाॅ. अभय कुमार ने बताया कि बीएनएमयू क्षेत्रान्तर्गत सभी तीनों जिलों के नोडल पदाधिकारियों, कार्यक्रम पदाधिकारियों एवं बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने इसमें भागीदारी निभाई।

इस अवसर पर जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर, स्नातकोत्तर इकाई के डाॅ. शंकर कुमार मिश्र, सीएम साइंस काॅलेज के डाॅ. संजय कुमार, मधेपुरा काॅलेज के विजेन्द्र मेहता, आर. पी. एम. काॅलेज के बालकृष्ण प्रसाद उपस्थित थे।

TMBU। प्रोफेसर डाॅ. रामचंद्र घोष को श्रद्धांजलि

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सादर नमन
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टी. एन. बी. महाविद्यालय, भागलपुर में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर डाॅ. रामचंद्र घोष का निधन हो गया है। वे हिंदी अंगिका के जानेमाने साहित्यकार थे। उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ का अंगिका भाषा में अनुवाद किया था।
सादर नमन।

Philosophy। मार्क्सवाद/ प्रेमकुमार मणि

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आज कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है. इस आलेख द्वारा उनका स्मरण *
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मार्क्सवाद

प्रेमकुमार मणि

दार्शनिकों ने विभिन्न विधियों से विश्व की केवल व्याख्या ही की है ,लेकिन प्रश्न विश्व को बदलने का हैया-
‘थीसिस ऑन फायरबाख ‘ में मार्क्स

कार्ल हेनरिख मार्क्स (1818-1883) के जीवनकाल में ही दुनिया दो हिस्सों में बँट गयी थी . एक हिस्सा उनके समर्थकों का था और दूसरा उनके विरोधियों का ; लेकिन मार्क्स ने स्वयं के बारे में बातचीत के क्रम में एक बार कहा था -‘ मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ .’ इसी से मिलती -जुलती बात बुद्ध ने भी कही थी कि सब कुछ मैंने ही नहीं बतला दिए हैं .

कोई भी वैज्ञानिक या दार्शनिक अपने निष्कर्षों के प्रति भी इतना इत्मीनान नहीं होता ,जितना एक मूर्ख व्यक्ति . कट्टरता मूर्खों की आत्मा होती है , यही उनका केन्द्रक होता है . इसलिए मार्क्सवाद से प्रभावित कोई भी ईमानदार व्यक्ति उसे अंतिम सत्य मानने की जिद नहीं करता . मार्क्सवाद एक विज्ञान है और उसके जड़ होने की कोई गुंजायश नहीं है .

मार्क्स जड़ नहीं थे .किसी भी बात पर आँख मूँद कर उन्होंने कभी यकीन नहीं किया . वह तत्वान्वेषी थे . उन्होंने अपने विवेक से दुनिया को समझा और फिर उसे लेखनी द्वारा प्रकट किया . उन्होंने काफी लिखा है . इन लेखों में उनके विचारों का प्रकटीकरण हुआ है . उनके द्वारा व्यक्त विचारों के सारांश को मार्क्सवाद के नाम से अभिहित किया जाता है .

हम संक्षेप में मार्क्सवाद की चर्चा करेंगे . मेरी कोशिश नौजवान मित्रों को मार्क्सवाद के प्रति जिज्ञासु अथवा उत्सुक बनाना है . यह मार्क्सवाद की एक चर्चा है ,कोई आधिकारिक व्याख्या नहीं . जिन साथियों को प्रतीत हो कि कुछ अनर्गल है ,वे मेरा ध्यान दिलाने की कृपा करेंगे . .

मोटे तौर पर मार्क्सवाद के तीन हिस्से या प्रभाग बनते हैं –
1 , द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद
2 , राजनीतिक अर्थशास्त्र
3 , वैज्ञानिक समाजवाद .

इन तीनो के अलग -अलग महत्त्व अथवा वैशिष्ट्य हैं . लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण है द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद के सूत्र ,जिसका प्रतिपादन मार्क्स ने पहली बार किया . राजनीतिक अर्थशास्त्र -जिसका प्रतिपादन मार्क्स ने अपनी प्रसिद्ध और कई ज़िल्दों वाली भारी -भरकम किताब ‘ कैपिटल ‘ में किया है ,या फिर सरप्लस वैल्यू अर्थात अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत ,जिसके द्वारा पूंजीवादी शोषण चक्र की गुत्थी उन्होंने सुलझाई ; मुख्य रूप से अर्थशास्त्र से सम्बंधित कार्य है ,और यह उन्हें एक अर्थशास्त्री के रूप में प्रतिष्ठापित करते हैं ; वहीं वैज्ञानिक समाजवाद बहुत अंशों में एक यूटोपिया है ,जिसे प्राप्त करने केलिए विभिन्न देशों में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टियां बनीं . हर दार्शनिक का एक यूटोपिया होता है ,जैसे बुद्ध का निर्वाण ,कबीर का अमरदेस ,रैदास का बेगमपुरा और तुलसीदास और गाँधी का रामराज . मार्क्स का यूटोपिया वैज्ञानिक समाजवाद है .

मैं मार्क्सवाद के तीन प्रमुख अवयवों की चर्चा कर रहा था . और पहला अवयव ही हमने द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद बतलाया है . मार्क्सवादी विचारों का यही वह हिस्सा है जहाँ मार्क्स एक दार्शनिक -वैज्ञानिक के रूप में प्रकट होते हैं . इसीलिए मेरी दृष्टि में मार्क्स की किसी अन्य रचना से अधिक महत्वपूर्ण मुझे उनकी छोटी- सी ; आधी -अधूरी लिखी गई रचना ‘ जर्मन आइडियोलॉजी ‘ प्रतीत होती है ,जिसमे उन्होंने बीज रूप में ऐतिहासिक द्वंद्ववाद की व्याख्या की है . यह लेख थीसिस ऑन फायरबाख का एक हिस्सा है .

थीसिस ऑन फायरबाख की रचना नवंबर 1845 और अगस्त 1846 के बीच की गई . तब मार्क्स की उम्र लगभग सत्ताईस साल की थी और वह ब्रसेल्स में रह रहे थे .इसके पूर्व एंगेल्स से उनकी मित्रता हो चुकी थी . निबंध की रचना में एंगेल्स की भी भूमिका थी ,जो उन्ही के शब्दों में सेकेंडरी थी . अर्थात यह मुख्य रूप से मार्क्स की रचना है . ताज्जुब तो यह है कि यह लेख मार्क्स की मृत्यु ,यहाँ तक कि बोल्शेविक क्रांति के संपन्न होने और लेनिन की मृत्यु के उपरांत ही प्रकाशित हो सकी . रूसी में इसका प्रकाशन पहली बार 1924 में हुआ . पूरी दुनिया के समक्ष आने में तो कुछ और समय लगा .

हम कुछ समय केलिए मार्क्स के ज़माने में चलें . मैं पहले ही बतला चुका हूँ कि युवा मार्क्स की दिलचस्पी दर्शनशात्र में थी . वह अपने जमाने के प्रतिनिधि दो दार्शनिकों से प्रभावित थे . एक थे हेगेल (1770 -1831 ) और दूसरे थे फायरबाख . हेगेल का तब बहुत नाम था और जर्मन दार्शनिकों के बीच उनकी तूती बोलती थी . मार्क्स यदि कुछ समय पूर्व उच्च अध्ययन केलिए बर्लिन पहुंचे होते तो हेगेल से साक्षात् मिलने की सम्भावना होती . इसका अफ़सोस मार्क्स को रहा होगा. हेगेल का मुख्य कार्य दुनिया की द्वंद्ववादी व्याख्या है . लेकिन हेगेल के द्वंद्ववाद का आधारतत्व आईडिया है और यह बौद्धों के योगाचार दर्शन से मिलता -जुलता है . मार्क्स आईडिया को मूल मानने से इंकार करते हैं . इसी समय प्रसिद्ध भौतिकवादी फायरबाख से भी वह प्रभावित थे ,जिनके विचारों का कई सोशलिस्टों का भी समर्थन प्राप्त था . लेकिन फायरबाख की दरिद्रता दार्शनिक स्तर पर यह थी कि वह द्वन्द्वात्मकता की अवधारणा की भौतकवादी व्याख्या नहीं कर पाए थे . मार्क्स ने अपने फायरबाख विषयक निबंध में इसकी आलोचना की है . मार्क्स ने अपने नोट के ग्यारह बिंदु बनाये हैं . किसी नारे की तरह लोकप्रिय मार्क्स की उक्ति कि दार्शनिकों ने विभिन्न विधियों से दुनिया की केवल व्याख्या की है , लेकिन प्रश्न दुनिया को बदलने का है ‘ इसी नोट का ग्यारहवां बिंदु है . मार्क्स ने इसके तीसरे बिंदु में बतलाया है ” यह भौतिवादी सिद्धांत कि मनुष्य परिस्थितियों तथा शिक्षा -दीक्षा की उपज है ,और इसलिए परिवर्तित मनुष्य भिन्न परिस्थितियों एवं भिन्न शिक्षा -दीक्षा की उपज है ,इस बात को भुला देता है कि परिस्थितियों को मनुष्य ही बदलते हैं और स्वयं शिक्षक को शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता होती है .अतः यह सिद्धांत अनिवार्यतः समाज को दो भागों में विभक्त कर देने के निष्कर्ष पर पहुँचता है ,जिन में से एक भाग समाज से ऊपर होता है . परिस्थितियों के परिवर्तन तथा मानवीय क्रियाकलाप का संयोग केवल क्रान्तिकारी व्यवहार के रूप में ही विचारा तथा तर्कबुद्धि द्वारा समझा जा सकता है .”

मार्क्स बतलाते हैं – ” फायरबाख धार्मिक आत्मनियोजन अर्थात जगत के दो प्रतिरूपों ,एक काल्पनिक -धार्मिक दुनिया और दूसरी वास्तविक दुनिया में विभाजन के तथ्य से अपनी बात शुरू करते है . …. फायरबाख यह नहीं देख पाते कि धार्मिक भावना स्वयं ही एक सामाजिक उपज है तथा जिस अमूर्त व्यक्ति (ईसा) का उन्होंने विश्लेषण किया है ,वह समाज की एक विशेष अवस्था का प्राणी है . ”

मार्क्स के जमाने के भौतिकवादी चिंतक भारतीय चार्वाक के अंदाज़ में धर्म और धार्मिकता की आलोचना करते थे . मार्क्स का मानना था कि धर्म और उसके विचारों ,यहाँ तक की उसकी पौराणिक अवधारणाओं तक की व्युत्पत्ति समाज से ही होती है . धर्म स्वयं समाज की एक विशेष परिस्थिति की उपज हैं . उन परिस्थियों में परिवर्तन कर हम परिणामों में परिवर्तन संभव कर सकते है . अर्थात सब कुछ मनुष्य और समाज – यानि भौतिक परिस्थितियों के हाथ है . वह मनुष्य को महत्वपूर्ण मानते हैं . निबंध के आरम्भ यानि पहले बिंदु में ही वह कहते हैं – ” अब तक के तमाम भौतिकवादियों ,इनमे फायरबाख भी हैं , की त्रुटि है कि वस्तु ,वास्तविकता और ऐंद्रियता को केवल विषय के रूप में कल्पित किया जाता है ,न कि मानव के इन्द्रियगत क्रियाकलाप व व्यवहार के रूप में . इसका परिणाम हुआ क्रियाशील पक्ष भौतिकवाद द्वारा नहीं ,भाववाद द्वारा विकसित किया गया . .. फायरबाख विचार वस्तुओं से वास्तव में विभेदित इन्द्रियगत वस्तुओं को चाहते हैं ,लेकिन वह स्वयं मानव क्रियाकलाप को वस्तुनिष्ठ क्रियाकलाप के रूप में नहीं देखते . यही कारण है कि अपनी किताब ‘ ईसाई धर्म का सार ‘ में वह सैद्धांतिक पक्ष को ही मानवीय मानते हैं .. वह क्रान्तिकारी आलोचना के क्रियात्मक महत्त्व को नहीं समझ पाते ..”

मार्क्स के विचार उनके कम्युनिस्ट घोषणापत्र तैयार करने के पूर्व पुष्ट हो चुके थे . इसी वैचारिकता के आधार पर उन ने जर्मन आइडियोलॉजी पर प्रश्न उठाये ,जिसकी धाक पूरे यूरोप पर पसरी पड़ी थी और हेगेल जिसके शीर्ष चिंतक थे . अब हम इसी प्रश्न पर विचार करेंगे .

(2)

“जीवन चेतना द्वारा निर्धारित नहीं होता अपितु चेतना जीवन द्वारा निर्धारित होती है . “- मार्क्स

जर्मनी सहित पूरी दुनिया के दार्शनिकों का मत था कि यह दृश्य जगत महत्वपूर्ण नहीं है ,महत्वपूर्ण है वह चेतना ,जो दृश्य जगत को अनुभव करने की योग्यता हमें देता है . यह चेतना ही है जिसके कारण हम जगत का अनुभव कर पाते हैं . इसके अभाव में इस जगत के अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है , वह मिथ्या है . भारतीय वेदान्तिक शंकराचार्य ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए जगत को मिथ्या और ब्रह्म यानि चेतना को सत्य कहा था . जर्मनी में भी विचार दर्शन की मिलती -जुलती ऐसी परम्परा थी . इसका प्रतिनिधित्व कांट करते थे . इसे आगे बढ़ाते हुए ,हेगेल ने अपनी डायलेक्टिक की बात सामने लाई. उनके विचारों ने तहलका मचा दिया था .उनकी अवधारणा थी कि यह दुनिया द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से संचालित है और कोई स्पिरिट इसे सक्रिय रखता है . यह एक अधिभौतिक विचार है और तबतक के विचारों में अधिक तर्कपूर्ण और संश्लिष्ट . पूरे यूरोप में हेगेल की धाक थी . युवाओं में वह अधिक लोकप्रिय थे . उनसे प्रभावित नौजवानों को यंग हेगेलियन कहा जाता था . युवा मार्क्स भी इन में से एक थे. लेकिन स्पिरिट को लेकर उन के मन में आलोचना के भाव थे . उनका कहना था इस द्वंद्वात्मकता को ‘स्पिरिट ‘ नहीं ‘ मैटर ‘ -भौतिक तत्व संचालित रखते हैं . अपने निबंध जर्मन विचारधारा में उन्होंने इसे स्पष्ट किया है . यह लेख स्वतन्त्र रूप से भले बाद में प्रकाशित हुआ हो ,मार्क्स की पूरी समझदारी इसी पर केंद्रित रही . इसी की रौशनी में उन्होंने अर्थ और समाज विज्ञान को परिभाषित किया . इसीलिए इसे मैंने प्रमुखता से लिया है .

मार्क्स इस बात पर जोर देते है ” चेतना सचेत अस्तित्व के अलावे और कुछ हो ही नहीं सकती ,और मनुष्यों का अस्तित्व उनकी वास्तविक जीवन प्रक्रिया होता है . .. मनुष्य अपने भौतिक उत्पादन तथा अपने -अपने भौतिक संघर्ष का विकास करते हुए इस वास्तविक अस्तित्व के साथ अपने चिंतन तथा चिंतन के परिणामों को भी बदलते हैं . जीवन चेतना द्वारा निर्धारित नहीं होता अपितु चेतना जीवन द्वारा निर्धारित होती है . ”

मार्क्स मानते हैं कि चेतना हमेशा ही समाज द्वारा निर्मित होती है और वह तब तक बनी रहती है जब तक मनुष्य का अस्तित्व बना रहता है . मनुष्य या जगत से निरपेक्ष चेतना का न ही कोई अर्थ है ,न अस्तित्व . चेतना के विविध रूप वह चाहे धर्म हो ,या दर्शनशास्त्र या कि साहित्य या कलाएं सब समाज द्वारा निर्मित हैं ,वे स्वर्ग या किसी परलोक से कूद कर नहीं आ गयी हैं . यह मनुष्य में रचने और उत्पादन करने की क्षमता का प्रकटीकृत रूप है .

मार्क्स ने इसी लेख में इतिहास की भौतिकवादी द्वंद्वात्मकता को रेखांकित किया है जिससे मानव समाज विकास के विभिन्न चरण स्पष्ट होते हैं . मनुष्य अपनी उत्पादन क्षमता से सामाजिक परिस्थियों को परिवर्तित कर देते है . परिवर्तन की यह प्रक्रिया यूँ तो निरंतर चलती है ,लेकिन कभी -कभी उत्पादन के औजारों के अचानक अथवा क्रांतिकारी रूपांतरण से उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है . अधिशेष अथवा सरप्लस पर कब्ज़ा करने केलिए समाज में होड़ होती है और फलस्वरूप श्रेणी विकसित हो जाती है; और इससे समाज का एक पहले से भिन्न रूप सामने आता है . अर्थात नई सामाजिक स्थितियां और सम्बन्ध विकसित हो जाते हैं . इसे इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या कहा जाता है . इसी प्रक्रिया में आदिम साम्यवादी समाज के बीच से दास विकसित हुए और फिर सामंत . औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन के औजारों में तकनीकी क्रांति द्वारा विकसित स्थितियों से एक नए पूंजीवादी दौर का विकास किया, जिसके शीर्ष पर पूंजीपति और आधार रूप में सर्वहारा औद्योगिक मजदूर आये .

मार्क्स की एक बड़ी कमजोरी यह हुई कि उसने सब कुछ यूरोप के इस नए दौर को ध्यान में रख कर किया . उसने पूंजीपति और सर्वहारा के संबंधों के अध्ययन में ही स्वयं को खपा दिया . उसकी मृत्यु पर बोलते हुए एंगेल्स ने उसकी तुलना डार्विन से की . निश्चय ही यह जायज तुलना है ,लेकिन डार्विन ने जीवों के क्रमिक विकास के अध्ययन केलिए लम्बी यात्रा की थी .कई द्वीपों में वह गए . वहां जीवों की भिन्न प्रजातियों और पुराने जीवों के जीवाश्म का अध्ययन किया .तब जाकर वह एक निष्कर्ष पर आये और उन्होंने विकासवाद को परिभाषित किया . जीवों के क्रमिक विकास के कतिपय प्राकृतिक नियमों को ढूंढा . मार्क्स ने ऐसा नहीं किया . उन्होंने जल्दीबाजी दिखाई . जर्मन आइडियोलॉजी में अपने विचारों को रखना बिलकुल सही था . उनके महत्व असंदिग्ध हैं . लेकिन बाद में जिस ऐतिहासिक भौतिकवाद को उन्होंने दुनिया के समक्ष रखा ,वह एकांगी अथवा अधूरा बन कर रह गया . स्वयं मार्क्स को इसका आभास था . यही कारण था कि अपने जीवन के आखिरी समय में वह रूसी किसानों के जीवन और वहां की कृषि व्यवस्था का अध्ययन कर रहे थे . यहां तक कि वह रूसी भाषा भी सीख़ रहे थे . इससे पता चलता है की इसे लेकर भीतर से वह कितना व्यग्र और जिज्ञासु थे . वह एक मौलिक चिंतक थे ,इसलिए संभव है उनके भीतर अपराधबोध हो .

बेहतर होगा पूरे प्रसंग को देखें .उन्नीसवीं सदी में रूसी किसानों का एक आंदोलन हुआ ,जिसे नरोदनाया वोल्या कहा जाता है . रूसी समाज में चूकि औद्योगिक क्रांति नहीं हुई थी ,अतएव पूंजीवाद विकसित नहीं हुआ था . हाँ , वहां किसानों के कम्यून थे . किसान नेताओं ने जिज्ञासा की कि क्या पूंजीवाद के चरण को छलांग कर समाजवादी दौर में पहुंचा जा सकता है ? मशहूर मार्क्सवादी नेता प्लेखानोव ,जिसका लेनिन बार -बार जिक्र करते हैं , इसी किसान आंदोलन से जुड़े थे . प्लेखानोव की दृढ़ राय थी कि पूंजीवाद के दौर को छलांग कर समाजवाद के दौर में नहीं पहुंचा जा सकता . एक दूसरे किसान नेता वेरा जासुलिच ने सीधे मार्क्स को खत लिखा और सलाह मांगी . मार्क्स इतने पसोपेश में थे कि उन्होंने अपने पत्र के चार मसविदे बनाये . लेकिन भेजा किसी को नहीं . इसी बीच मार्क्स की मृत्यु हो गई . कहते हैं उनकी मृत्यु के बाद एंगेल्स ने ,मार्क्स के आखिरी मसविदे को निर्णायक मसविदा मानते हुए जासुलिच को भेज दिया . मार्क्स ने जासुलिच के प्रश्न को सकारात्मक मानते हुए स्वीकृति दी थी . लेकिन अब तक मार्क्सवाद का एक महायान विकसित हो गया था . वह पत्र दबा दिया गया . पूरे बोल्शेविक आंदोलन में उसे दबाये रखा गया . शायद इसलिए कि रूसी कम्युनिस्ट पार्टी में किसान नेताओं को महत्व न देना पड़ जाय . 1923 में एक मेंशेविक निकोलाएव्स्की ने इसे प्रकाशित कर दिया . अब बोल्शेविकों को इसे स्वीकारना मज़बूरी थी . महान बोल्शेविक नेताओं ने मंजे सत्ताधारियों की तरह टिप्पणी की कि मार्क्स के अंतिम समय का यह पत्र है .इसे लिखते समय तक उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमताएं खो दी थीं . किसी भी दार्शनिक -विचारक से हुकूमत का ऐसा ही सलूक होता है , चाहे वह उसके विचारों की ही हुकूमत क्यों न हो .

उन्नीसवीं सदी में कई मार्क्सवादी विचारकों ने जड़ मार्क्सवाद से पृथक अपनी व्याख्या प्रस्तुत की और उसे व्यापक स्वीकृति भी मिली . इटली के मार्क्सवादी विचारक अंतोनियो ग्राम्शी ( 1891- 1937) ने वर्चस्व की एक पृथक व्याख्या की . यह रूढ़ मार्क्सवादी लाइन से तनिक भिन्न है . चीन में माओ च तुंग ने तो इस थियरी को ही त्याग दिया कि केवल सर्वहारा मज़दूर वर्ग ही समाजवादी क्रांति कर सकता है . किसानों के बूते एक क्रांति को उन्होंने संभव बनाया . उन्होंने मार्क्सवादी चिंतन में यह भी जोड़ा कि समाजवादी सरकार बना लेने के बाद भी क्रांति की ज़रूरत होगी ,अन्यथा पार्टी का ही एक तबका सरकार पर हावी हो जायेगा और हेजेमनी स्थापित कर लेगा .सतत क्रांति की बातें भारतीय समाजवादी नेताओं ने भी की है . यह सब मार्क्सवाद की अपनी द्वंद्वात्मकता है, जिसपर कम ही विचार हुआ है …।

कार्ल मार्क्स के जन्मदिन (05 मई, 2021) पर इस आलेख द्वारा उनका स्मरण *
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BNMU। चिंतक -विचारक रवीन्द्रनाथ टैगोर

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चिंतक -विचारक रवीन्द्रनाथ टैगोर

प्रेमकुमार मणि

” आज सभी अपराधों में ,राष्ट्रवाद शायद सबसे अधिक घिनौना तथा घातक अपराध है . -टैगोर ”

रवीन्द्रनाथ टैगोर कवि-लेखक के साथ कई दूसरी खूबियों के स्वामी थे . वह चित्रकार -पेंटर थे ,नाट्य -निदेशक थे और शिक्षाशास्त्री भी थे . इन सबके साथ वह एक मौलिक चिंतक -विचारक थे . उनके विचार केवल उनकी साहित्यिक कृतियों में नहीं ,बल्कि अलग से भाषणों और लेखों में भी प्रकट हुए हैं . उनके विचार कई दफा प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध भी होते थे . पूरी दुनिया में जब राष्ट्रवाद और देशभक्ति विविध रूपों में अंगड़ाइयां ले रही थीं ,तब उन्होंने इसके खतरों से आगाह किया . कवि लोग प्रायः भीरु स्वभाव के होते हैं और सीधे तौर पर कुछ कहने के बजाय घुमा -फिरा कर अपनी बातें कहने के वे अभ्यस्त होते हैं . लेकिन टैगोर तो बाज दफा अक्खड़ की तरह अपनी बात रख देते हैं . सर्वविदित है कि 1913 में उन्हें जब साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला ,तब अचानक से उनकी ख्याति दुनिया भर में फ़ैल गई . वह आधुनिक ज़माने के संभवतः प्रथम भारतीय थे, जिन्हे वैश्विक ख्याति मिली थी . गाँधी को यह ख्याति बहुत बाद में मिली . इतनी बड़ी ख्याति को संभालना सहज नहीं होता .

लेकिन टैगोर ने इसका रचनात्मक उपयोग किया . वह समझ रहे थे कि उनकी बातें लोग अब ध्यान से सुनेंगे . इसका उन्होंने खूब उपयोग किया . उन्होंने कई बार दुनिया के कई हिस्सों की यात्रा की . प्रथम विश्वयुद्ध ने पूरी दुनिया को हिंसा के लावे में झोंक दिया था . वह इस मामले में प्रथम चिंतक थे ,जिन्होंने इस महायुद्ध के केन्द्रक अथवा मूल कारण को समझा था . वह केन्द्रक था राष्ट्रवाद . यह वह समय था ,जब उनके अपने भारत में राष्ट्रवाद नई अंगड़ाइयां ले रहा था . उनके बंगाल में राष्ट्रवादी अनुशीलन समिति बीसवीं सदी के आरम्भ में ही गठित हो चुकी थी और उससे जुड़े लोग अपने राष्ट्र के लिए जान की बाज़ी लगाने हेतु उद्धत थे . टैगोर इन सब से बहुत प्रभावित नहीं होते . बंगाल के भद्रलोक में इन सब केलिए उनकी अनेक स्तरों पर आलोचना हो रही थी . इन्ही दिनों 1909 में उनका उपन्यास आता है “गोरा ” . इसमें आप टैगोर के विचारों को देख सकते हैं . गौरमोहन मुखर्जी उद्धत राष्ट्रवादी है ,मानो तिलक की प्रतिमूर्ति . उसकी चेतना में राष्ट्र और ब्राह्मणत्व एकमेव है . उसे अपने वर्णधर्म और राष्ट्र दोनों पर गुमान है . सामाजिक सुधारों का वह पूरी तरह विरोधी नहीं है . लेकिन सुधारवादियों के पश्चिमाभिमुख रुझानों का वह कट्टर विरोधी है . विदेशी नस्ल से ही उसे नफरत है . इस नफरत की गहराई को ही वह देशभक्ति की गहराई समझता है . उसे अपनी माँ से परेशानी है कि वह छूत-अछूत का भेद नहीं मानती . दुसाध जाति की लछमिनिया उसके यहाँ बतौर नौकरानी है और माँ उसे अपना कहती है . गोरा बंगाल के युवकों का स्वाभाविक नायक बना हुआ है, क्योंकि उसकी राष्ट्रनिष्ठा अद्भुत है . वह भारतमय हो चुका है . उपन्यास के आखिर में उसके बीमार पिता उसे बुलवाते हैं और उससे कहते हैं कि वह उसे मुखाग्नि नहीं देगा . गोरा के प्रश्न क्यों का जवाब उसकी माँ देती है . उसे बताया जाता है कि वह तो आयरिश दम्पति का बेटा है . 1857 के ग़दर के समय उसके मातापिता ने उसे मेरी गोद में डाल दिया कि इसकी रक्षा करना . उसके मातापिता गदर की भेंट चढ़ गए . तो यह है गौरमोहन की हकीकत . एकबारगी से उसका पूरा चरित्र डगमग हो जाता है . लेकिन ब्रह्मसमाज के नेता आशु बाबू ,जिनसे वह घृणा करता था , के पास जब वह जाता है तब उसे आश्वस्ति मिलती है . वह उसे देशभक्ति का एक नया पाठ देते हैं . दरअसल टैगोर देशवासियों को देशभक्ति का एक नया पाठ देते हैं . दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि इस उपन्यास की उतनी चर्चा नहीं हुई ,जितनी उनकी कविताओं की .

1916 में टैगोर जापान जाते हैं . जापान में राष्ट्रवाद की आँधी चल रही थी . इस आँधी में टैगोर जापानवासियों को नसीहत देते हैं कि वे राष्ट्रवाद के खतरों को जानें . किसी मुल्क में जाकर उसकी सरकारी वैचारिकी का विरोध एक कवि करे क्या यह साधारण बात है ? लेकिन टैगोर ने यह किया . वह ऐसे निर्भीक व्यक्ति थे . इसी वर्ष वह वह अमेरिका भी जाते हैं और पश्चिम के राष्ट्रवाद की आलोचना करते हैं . उनकी औद्योगिक सभ्यता मानवीयता की उपेक्षा कर रही है ,इस बात की भी हिदायत देते हैं . वह 1927 में रूस जाते हैं,जहाँ दशक भर पहले बोल्शेविक क्रांति हुई थी . वहाँ से परिवार जनों और मित्रों को वह चिट्ठियाँ लिखते हैं ,जो उनकी एक किताब ‘ रसियार चिट्ठी ‘ (रूस की चिट्ठी ) में संकलित है . इन चिट्ठियों में वह बतलाते हैं कि किस तरह वहाँ सार्वजानिक शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है . लेकिन वह किसी समाजवादी सभ्यता की तलाश की जगह मानवीय सभ्यता की ही तलाश करते हैं . उनकी चिंता केवल यह है कि किसी विचारधारा केलिए उसके मनुष्य की उपेक्षा तो नहीं हो रही है .

मानवीय गरिमा और उसकी आज़ादी रवीन्द्रनाथ की पहली चिंता होती है . उनका एक लेख है ‘भारत में राष्ट्रवाद ‘ . इसके आरम्भ ही वह कहते हैं ” भारत में हमारी असली समस्या राजनीतिक नहीं ,सामाजिक है ” वह लिखते है – ‘ इतिहास के आरंभिक काल से ही भारत अपनी एक समस्या से लगातार जूझता रहा है -और वह समस्या है जातिप्रथा की . ‘ टैगोर की मान्यता है कि यह जातिप्रथा हमें केवल यही सीख देती है कि विभिन्नता में एकता के आदर्श को हम कैसे विकसित करें . वह पश्चिम के भारत प्रवेश का बुरा नहीं मानते ,बल्कि उनका मानना है कि इससे दोनों को एक दूसरे से सीखने का अवसर मिला है . उनका मानना है -‘ जो परायों से झगड़ने व उनके प्रति असहनशीलता का भाव बनाए रखते हैं ,वे विलुप्त हो जाएंगे .’

सबलोग जानते हैं कि गाँधी और टैगोर में कितनी मित्रता थी और दोनों एक दूसरे की फ़िक्र करते थे ,लेकिन दोनों में वैचारिक भिन्नता थी . इस भिन्नता को लेकर दोनों के बीच कई बार मतभेद सामने आये . वैचारिक तौर पर टैगोर का विरोध गाँधी से जबरदस्त तरीके से हुआ . गाँधी के कार्यक्रमों और विचारों का विरोध बाद में बहुत लोगों ने किया . कांग्रेस में ही तिलकवादियों का एक दल गाँधी का विरोध कर रहा था . इसके बाद कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों ने अपने- अपने स्तर पर उनके कतिपय विचारों का विरोध किया . नेहरू ने अपनी आत्मकथा में गांधीवाद की तीखी आलोचना की है . मुस्लिम लीग , हिंदूमहासभा का विरोध तो था ही ; डॉ आम्बेडकर दलित प्रश्नों के साथ गाँधी का विरोध कर रहे थे . लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि इस देश में गांधीवाद विरोध का आरम्भ टैगोर ने किया . असहयोग आंदोलन और विदेशी वस्त्रों के जलने के मुद्दे पर टैगोर बिलकुल सहमत नहीं थे ,बल्कि इनके आलोचक थे . चरखा का तो उन्होंने खासा मज़ाक उड़ाया था और इस पर गाँधी और उनमें थोड़ा वाद -विवाद भी हुआ था . गाँधी की निर्णायक टिप्पणी थी -‘ कवियों को किसी चीज को बढ़ा -चढ़ा कर कहने की आदत होती है और कवि के स्वेच्छाचार में किसी बात को अक्षरशः नहीं मानना चाहिए . ‘

गाँधी -टैगोर की असली वैचारिक लड़ाई वर्णव्यवस्था के सवाल पर हुई . टैगोर का मई 1927 के मॉडर्न रिव्यू में एक लेख प्रकाशित हुआ ‘ द शूद्र हैबिट ‘ . बाद में इसे बांग्ला में ‘शूद्र धर्म ‘ शीर्षक से प्रकाशित किया गया . मूल लेख बंगला में था ,या अंग्रेजी में यह ज्ञात नहीं है . इस लेख में टैगोर ने वर्णधर्म और जातिवाद की तीखी आलोचना की है . यह वह समय था जब तक आम्बेडकर भी खुल कर जातिप्रथा के विरुद्ध नहीं आए थे . टैगोर ने लिखा ‘ ब्राह्मणों द्वारा आँख मूँद कर कर्मकांड की पुनरावृत्ति ने मस्तिष्क को जकड़ रखा है . इससे न तो मानसिक और न ही चारित्रिक गुणों का विकास हो रहा है .,जिन आदर्शों का आरम्भ में निर्धारण किया गया था .’ टैगोर ने पूछा – ‘ असली क्षत्रिय भारत में कहाँ पाया जाता है ? ‘ मज़ाकिया लहजे में उन्होंने बतलाया भारत में केवल शूद्रधर्म चल रहा है . दुनिया में आपको कहीं ऐसे लोग नहीं मिलेंगे जिनके धर्म ने उन्हें गुलाम बना दिया हो . इसी आदत ने भारतीयों को ब्रिटिश भारत के सबसे अच्छे नौकर के रूप में तब्दील कर दिया है .

इस लेख की आलोचना करते हुए गाँधी ने टैगोर के विचारों की आलोचना की . प्रसंगवश यह भी जानना चाहिए कि हिंदी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने भी एक लेख लिख कर टैगोर की आलोचना की . लेकिन निर्भीक विचारक टैगोर पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा . वह अपनी मान्यता पर अडिग रहे . आधुनिककाल में जोतिबा फुले ने ब्राह्मणवाद पर जोरदार प्रहार किया था ;किन्तु पूरे वर्णधर्म पर सुसंगत विरोध करने वाले टैगोर संभवतः अपने ज़माने में पहले व्यक्ति थे . किसी खास जाति को खास पेशा से जोड़ देना वर्णधर्म की पहली शर्त होती है . यहाँ पेशा चुनने का आधार व्यक्ति को नहीं,, उस व्यवस्था को है, जिसे वर्णधर्म या ब्राह्मणधर्म कहा जाता है . टैगोर ने कहा – ‘ जन्म के आधार पर व्यवसायों के आबंटन से कार्यकुशलता नहीं आती . बल्कि यह व्यक्तिगत क्षमता से आती है .पीढ़ी दर पीढ़ी वंशानुगत धंधों में लगे रहने से लापरवाही और बोरियत होने की संभावना होती है . इससे दिमाग संकीर्ण हो जाता है . ‘

टैगोर ने जोतिबा फुले की तरह पौराणिकता और इतिहास पर भी विचार किया है . महाकाव्यों और दूसरे संस्कृत साहित्य पर भी उन्होंने नए सिरे से सोचा है . वाणभट्ट की कादंबरी हो, या कालिदास की कृति अभिज्ञान शंकुन्तलम ,उन्होंने इसे अपनी ही तरह से विश्लेषित करने की कोशिश की , महाकवि वाल्मीकि को क्रौंच वध से नहीं, एक अछूत बालिका के वध से द्रवित को कर कवि होता देखा . उनका एक लेख है -‘ ए विज़न ऑफ़ इंडिया ‘ . उम्मीद है ,आप में से बहुतों ने पढ़ा होगा . इस लेख को बहुत पहले मैंने पढ़ा था. इस लेख को पढ़ने के बाद कई सवाल मन में उठते हैं . टैगोर मनु को भिन्न नजरिए से देखते हैं . यह मनु कौन था ? जिसकी स्मृति इतनी चर्चित व विवादित है . उसे ब्राह्मणवादी विचारों का आदि स्रोत बतलाया जाता है . आज तो वह प्रतिगामी सामाजिक चिंतन का आधार ही माना जाता है . रवीन्द्रनाथ कहते हैं मनु तो स्वयं ब्राह्मण नहीं था ,वह क्षत्रिय था ;क्योंकि वह राजा था और राजा क्षत्रिय ही होता था . एक क्षत्रिय राजा ने स्वयं को कमतर और ब्राह्मण को श्रेष्ठतर कैसे बनाया ? रवीन्द्र इस पर गहराई से विचार करते हैं . वह बतलाते हैं जब क्षत्रियों को सत्ता चाहिए होती थी ,तब वे उनका समर्थन लेने केलिए उनकी महत्ता का समर्थन करते थे . ब्राह्मण सीधे सत्ता में नहीं होते थे . उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति और स्वार्थों की रक्षा क्षत्रिय राजा करते थे . ऐसे राजाओं को ब्राह्मण लोग मर्यादा पुरुषोत्तम कहते थे . राम ऐसे ही राजा थे . क्षत्रिय ; लेकिन द्विज हितकारी ,विप्र सेवक . शम्बूक का शिरोच्छेद और सीता को घर निकाला देकर राम ने यह विरुद हासिल किया था .

क्षत्रियों के मोटे तौर पर दो समूह थे . एक समूह सत्ता पसंद था , दूसरा ज्ञान पसंद . जब क्षत्रियों को ज्ञान की भूख होती थी ;वे ब्राह्मणों से टकराने लगते थे . ब्राह्मण इसे पसंद नहीं करते थे . वह क्षत्रियों को कमतर मानते थे और ज्ञान जैसे क्षेत्र केलिए सर्वथा अयोग्य . बावजूद इसके जब क्षत्रियों ने ज्ञान केलिए अपनी जिद कायम रखी ,तो ब्राह्मणों के बीच से परशु या फरसाराम उठ खड़ा हुआ . परशुराम दरअसल ब्राह्मणों की अधीरता और उनके बीच छुपी खूंखार हिंसा का परिचायक है . संभवतः यह एक प्रवृति है . क्योंकि परशुराम रामायण में भी है और महाभारत में भी . इस तरह यह ब्राह्मणों और क्षत्रियों के एक बहुत लम्बे संघर्ष की सूचना देता है . यूँ भी इक्कीस दफा क्षत्रिय संहार का मतलब लम्बा संघर्ष ही है . संभव है परशुराम के मिथक की संरचना क्षत्रियों ने ब्राह्मणों को नीचा और दुष्टतापूर्ण दिखाने केलिए की हो . क्योंकि इस तरह के निकृष्ट नायक की रचना ब्राह्मणों ने स्वयं की होगी ,यह विश्वसनीय नहीं प्रतीत होता . परशुराम तो पुरंदर ( इंद्र ) का विकृत रूप लगता है . इतना लम्पट कि अपनी मां की हत्या करने में भी नहीं हिचकता .

क्षत्रिय जब सत्ताप्रिय होते थे तब ब्राह्मणों -क्षत्रियों का युग्म अथवा संयुक्त मोर्चा बनता था . इस मोर्चे की मजबूती के साथ ही शूद्रों और वैश्यों के बुरे दिन आ जाते थे .जब क्षत्रिय ज्ञानप्रिय होते थे वे ब्राह्मणों से जूझते टकराते थे . ऐसी स्थिति में उनका शूद्रों और वैश्यों से संयुक्त मोर्चा बनता था . यह तथाकथित निम्नवर्णीय समूहों के लिए अनुकूल समय होता था . भारत के वर्णवादी समाज का यही आत्मसंघर्ष या अंतर्संघर्ष था .

इस लेख में टैगोर ने रामायण और महाभारत पर भी अपनी तरह से विचार किया है . रामायण के राम कृषि केंद्रित समाज के नायक होना चाहते थे अथवा थे . उनके गुरु विश्वामित्र की सीख के तीन बुनियादी बिंदु थे –
1. बर्बरता का ख़ात्मा ,जिसके तहत राम ने ताड़का वध और दूसरे समाजविरोधी तत्वों का सफाया किया . आज उसे कानून का राज स्थापित करना कह सकते हैं .
2 . अहल्या उद्धार – अर्थात अहल्या भूमि (अकृषिकारी भूमि )को हल्या यानि हल (जोतदार भूमि ) के अधीन लाना . आज के अर्थ में कृषि पर जोर .
3 . नीचे के वर्णों से समझौता . अर्थात ब्राह्मणों की श्रेष्ठता प्रदर्शित करनेवाली वर्णव्यवस्था की अवहेलना .

राम ने अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में में यह किया . निषादराज से लेकर आदिवासियों तक से उन्होंने समझौते किये . जीवन की शुरुआत ही अयोनिजा (योनि से न जन्मी यानि वर्णहीन )सीता से विवाह करके किया . जनक के दरबार में उनके भाई लक्ष्मण ने परशुराम की जम कर ऐसी -तैसी कर दी . परशुराम को भागना पड़ा . वशिष्ठ की सीधी उपेक्षा करते हैं राम .परशुराम और वशिष्ठ की ही कड़ी में रावण भी है , जो राम की स्त्री का अपहरण कर लेता है . वह दक्षिण का ब्राह्मण है . (सीता की खोज में जब हनुमान लंका पहुँचते हैं तब उनने अपनी बात संस्कृत में रखनी चाही ,लेकिन हनुमान को तुरत इस बात का भान हुआ कि संस्कृत तो ब्राह्मणों की भाषा है . सीता मुझे रावण का दूत मान लेंगी . इसलिए उन्होंने भाषा में बात की .) लेकिन उत्तरार्द्ध के राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनना है . वह उन शक्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण कर देता है ,जिनके विरुद्ध अब तक लड़ते रहे थे .. राम का यह भयानक पतन है ,जो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बना देता है . विश्वामित्र अब चुपचाप परिदृश्य से अनुपस्थित हो जाते हैं .

महाभारत को टैगोर कौरव – पांडवों का संघर्ष नहीं मानते . यह संघर्ष कृष्ण को मानने और नहीं मानने वालों के बीच का संघर्ष था . कृष्ण का जन्म विवादास्पद है . पांडवों का भी यही हाल है . दुर्योधन का तो यही कहना था कि ये सब पाण्डु की जायज संतान नहीं हैं . जन्म और वर्ण की शुद्धता -अशुद्धता के मुद्दे पर यह संघर्ष हुआ ,जिसमे कृष्ण ने वर्ण और जन्म के मुकाबले मनुष्यता का पक्ष लिया .टैगोर का यह दृष्टिकोण महाभारत को एक नया अर्थ दे जाता है . कन्नड़ लेखक भैरप्पा ने महाभारत को लेकर जो उपन्यास ‘ पर्व ‘ लिखा है ,उसकी प्रेरणा संभवतः टैगोर के इस दृष्टिकोण से ही मिली है .

कुल मिला कर यह कि टैगोर हमारे विचारों को झकझोरते हैं . आश्चर्य होता है अनेक प्रश्नों पर वह अपने समय से बहुत आगे के दिखते हैं . उन्होंने भारतीय दर्शनशात्र और प्राचीन संस्कृत वाङ्गमय का गहन अध्ययन किया था . लेकिन वह उसी का हिस्सा नहीं बन गए . अपने चिंतन से उसे नए अर्थ और गति दी . उसे आधुनिक विश्व साहित्य की ऊंचाइयां प्रदान की . वह जितनी गहराई से संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य से जुड़े थे ,उतनी ही गहराई से बाउल और भक्ति गीतों से भी . अपनी माटी के कबीर और लालन फ़क़ीर के जातिमुक्त समाज के आग्रह को उन्होंने अपनी संवेदना से संवारा और उनके आधुनिक अर्थ दिए . समाज ,राजनीति और साहित्य को मनुष्य के निकष पर देखना संवारना एक विचार ही है ,टैगोर ने इसे संभव किया .

आज उनका जन्मदिन है . 7 मई 1861 को कोलकाता में जन्मे टैगोर ने पूरी मानव जाति और उसकी चेतना को अपने साहित्य से समृद्ध किया . उन्होंने भारत को सांस्कृतिक ऊंचाइयां दी . मानव जाति को आज़ादी के नए अर्थ दिए . जब तुम्हारी बात कोई नहीं सुने तब उसे अकेले चलने का मंत्र दिया . आज उनकी शब्द हमारी धड़कनों और वजूद के हिस्सा बन गए हैं . उनके जन्मदिन पर उनका नमन .

BNMU। डाॅ. कृतेश्वर प्रसाद के निधन पर शोक

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डाॅ. कृतेश्वर प्रसाद के निधन पर शोक

नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना के प्रति कुलपति प्रोफेसर डाॅ. कृतेश्वर प्रसाद के असामयिक निधन पर बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के कुलपति प्रोफेसर डाॅ. आर. के. पी. रमण सहित संपूर्ण विश्वविद्यालय परिवार ने गहरी संवेदना व्यक्त की है।

कुलपति डाॅ. रमण ने बताया कि कृतेश्वर प्रसाद एक सरल स्वभाव के मिलनसार व्यक्ति थे और उनमें एक कुशल प्रशासक के सभी गुण मौजूद थे। उनके निधन से शिक्षा जगत को अपूरणीय क्षति हुई है।

उन्होंने बताया कि नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना के प्रति कुलपति के रूप में कृतेश्वर प्रसाद के कार्यों को हमेशा याद रखा जाएगा। यह दुःखद है कि उनका कार्यकाल आगामी 10 मई को समाप्त हो रहा था। लेकिन उसके पूर्व ही उनका निधन हो गया।

उन्होंने बताया कि नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना के पूर्व मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के प्रति कुलपति के रूप में भी इनका कार्य काफी सराहनीय रहा। खासकर शोधार्थियों के हित में किया गया कार्य स्मरणीय है।

उन्होंने बताया कि डाॅ. कृतेश्वर प्रसाद ने 1980 में पटना विश्वविद्यालय, पटना में भूगर्भशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवा शुरू की थीं। वे अपने विषय के प्रकांड विद्वान, लोकप्रिय प्राध्यापक एवं कुशल प्रशासक थे। पटना विश्वविद्यालय के कुलानुशासक के रूप में उनके कार्यों को लोग आज भी याद करते हैं। वहाँ छात्र संघ चुनाव में भी इनकी अहम भूमिका रही।

संवेदना व्यक्त करने वालों में
विश्वविद्यालय की प्रति कुलपति प्रोफेसर डाॅ. आभा सिंह, कुलानुशासक डाॅ. विश्वनाथ विवेका, कुलसचिव डाॅ. कपिलदेव प्रसाद, जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर एवं अन्य प्रमुख हैं। सबों ने डाॅ. कृतेश्वर प्रसाद की आत्मा की शांति की कामना की है और ईश्वर से प्रार्थना की है कि वे उनके परिजनों एवं शुभचिंतकों को इस अपार दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

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