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Intrnational Webinar। Revisting Gandhian Thoughts in 21st Century

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Intrnational Webinar : Revisting Gandhian Thoughts in 21st Century (15 oct., 2020).    इतिहास विभाग डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर द्वारा 15 अक्टूबर 2020 को रिविजिटिंग गांधियन थॉट इन 21 सेंचुरी विषयक एक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार के दूसरे मुख्यवक्ता प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री एवं गांधीवादी विचारक प्रोफेसर डॉ. अंबिकादत्त शर्मा ने गांधी के विचारों को प्रासंगिक बताते हुए गांधी आत्मा इन मेकिंग पुनर्विचार पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि गांधी सामान्य पुरुष नहीं थे, बल्कि एक विचार पुरुष थे। उन्होंने यह भी बताया कि गांधी कोई अवतारी पुरुष नहीं थे, बल्कि गांधी ट्रांस पर्सनलाइज पर्सनैलिटी थे। प्रोफ़ेसर शर्मा का कहना था कि गांधी राष्ट्रीय आंदोलन के न केवल जननायक थे, बल्कि एकमात्र नायक थे। उन्होंने बताया कि संपूर्ण दुनिया में स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य केवल स्वतंत्रता मात्र था, जबकि गांधी ने स्वतंत्रता के ऊपर उन्होंने सत्य को वरीयता दिया था। उन्होंने बताया कि हम सबके अंदर गांधी है। बस आवश्यकता है कि हम अपनी चेतना के अंदर के गांधी को जागृत करें। यदि हम यह कर पाएं, तो हम सही मायने में गांधी के विचारों के साथ न्याय कर पाएंगे।

उद्घाटन सत्र में वेबिनार के संयोजक डॉ. पंकज सिंह ने यह बताया कि गांधी के विचारों की ओर लौटने की क्या आवश्यकता है? डॉ. पंकज ने यह बताया कि गांधी जी को अवतारी पुरुष या देवता मानने की आवश्यकता नहीं है और ना ही उन्हें महात्मा बनाकर पूजे जाने की आवश्यकता है। हमें महात्मा गांधी के विचारों को आत्मसात करने की आवश्यकता है। महात्मा गांधी के जीवन दृष्टि को समझने की आवश्यकता है।
दुनिया में हो रही हिंसा तथा पर्यावरण को हो रहे नुकसान और तथाकथित विकास के कारण चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है, इससे बचने के लिए यदि हमें आगे बढ़ना है, तो हमें गांधी के विचारों की ओर लौटने की आवश्यकता है।

इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति तथा प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक प्रोफ़ेसर रविंद्र कुमार ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के बीज वक्तव्य दिया। प्रोफेसर रवींद्र कुमार ने बताया कि गांधीजी मानव जीवन के सर्वोत्कृष्ट जीवन पद्धति को खोजने का प्रयास किया। गांधीजी ने अपनी परंपराओं को जोड़ने का कार्य किया। इसकी गहन जांच-पड़ताल की उन्होंने अनावश्यक तत्वों को इन परंपराओं से अलग करने का कार्य किया। गांधीजी आर्थिक विषमता से पैदा होने वाली मानसिक विपन्नता की बात करते हैं। उन्होंने दीनता से पैदा होने वाले आत्मसम्मान की विलगन की बात की। गांधीजी दीनता पर विलाप नहीं करते थे, बल्कि दूसरे की दीनता पर आप पश्चाताप करते थे। उन्होंने बताया कि सत्य के समूचे फलक पर कभी भी नहीं पहुंचा जा सकता। गांधीजी ने सत्य को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग कर रहे थे। गांधी जी ने भारतीय जनमानस के सत्य को समझने के लिए संपूर्ण भारत की यात्रा की। उन्होंने बताया कि गांधीजी का सार्वजनिक थे। गांधी जी का सम्पूर्ण जीवन अंतिम आदमी के लिए समर्पित था।

मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी उदयपुर की प्रोफेसर प्रोफ़ेसर प्रतिभा पांडे ने गांधी के नई तालीम तथा बुनियादी शिक्षा की आज क्या प्रासंगिकता है। इस पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।
उन्होंने बताया कि पश्चिमी शिक्षा से तुलना करें, तो यह शिक्षा मनुष्य को आत्म केंद्रित बना रही है जबकि महात्मा गांधी ने आत्म केंद्रित के साथ-साथ सार्वभौमिक शिक्षा पर बल देते थे। गांधी की शिक्षा सिद्धांत के अनुसार कर्म तथा श्रम का महत्व था स्वावलंबी शिक्षा, मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया था। गांधी की शिक्षा नीति में प्राकृतिक परिवेश में जोर था। और आज गांधीजी के बुनियादी शिक्षा में ही हम आज बेरोजगारी और तमाम समस्याओं का हल देख सकते हैं यदि हम गांधी जी की शिक्षा नीति को समय के साथ कुछ बदलाव करते हुए उसे आत्मसात कर सकें।

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की इतिहास की प्रोफेसर आभार रूपेंद्र पाल ने गांधी की इतिहास दृष्टि पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। प्रोफेसर पाल ने यह बताया कि कि गांधी के अनुसार इतिहास में असामान्य चीजों को ही दर्ज किया गया है। उन्होंने यह बताया गांधीजी के अनुसार इतिहास में हमने युद्ध हिंसा रक्त पाठ के अलावा सामान्य चीजों पर कभी दृष्टि डाली ही नहीं हमने इतिहास में उन तमाम असामान्य घटनाओं का वर्णन किया है जो मानव की मूल स्वभाव के विपरीत है।

इतिहास विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बी. के. श्रीवास्तव ने गांधी के गीता के महत्व विषयक विचारों की वर्तमान में प्रासंगिकता पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। गीता गाँधी के जीवन में क्या प्रभाव था तथा किस तरह आज जीवन में गीता के विचारों से सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। गांधी ने अपनी समस्याओं का हल गीता को खोजने का प्रयास किया। गांधी गीता को अपनी माता कहते थे गांधी के गीता पर बहुत आस्था थी। ओके सर श्रीवास्तव ने बताया कि यदि हम अपने जीवन में नैतिकता तथा मन पर नियंत्रण करना चाहते हैं तो हमें गीता का अध्ययन करना चाहिए। आज के सभी युवाओं को गीता आत्मसात करना चाहिए।
द्वितीय सत्र में डॉ. संजय बरोलिया ने डायरेक्टर, महात्मा गांधी मेमोरियल सेंटर वॉशिंगटन डीसी अमेरिका की चेयर पर्सन प्रोफ़ेसर करुणा का स्वागत किया। द्वितीय सत्र के मुख्य वक्ता प्रोफेसर करुणा ने गांधी के सत्य तथा हिंसा के विचारों के पर अपना विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि गांधी जी के सत्य अहिंसा के के विचारो की प्रासंगिकता न केवल बीसवीं शताब्दी में थी बल्कि 21 वी शताब्दी में भी गांधीजी के अहिंसा के विचार की प्रासंगिक है। गांधीजी का सादा जीवन और उच्च विचार का जो दर्शन था, आज तमाम आधुनिक तथा विकसित देश उसको स्वीकार कर रहे हैं। यह विडंबना है कि भारत तथाकथित आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है और सम्पूर्ण यूरोपीय तथा पश्चिमी देश गांधी के विचारों को आत्मसात कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि किसी शताब्दी में गांधी के विचार सारस्वत हैं और इतने ही सार्वभौमिक और सर्वकालिक हैं। दूसरे सत्र के वक्ता नेशनल चैन कुंग यूनिवर्सिटी, ताइवान के प्रोफेसर फ्रैंक डोंट ने गांधी तथा शुभ कारणों के विचारों के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित अपना व्याख्यान दिया। प्रोफेसर फ्रैंक ने बताया की गांधी कथा सुकर्णो कारणों के विचारों में अत्यधिक समानता थी। अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के आखिरी सत्र में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. पंकज सिंह ने किया। अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता डॉ. संजय बरोलिया, उप संयोजक, डॉ. प्रीति अनिल खंदारे, उप संयोजक प्रोफ़ेसर अशोक अहिरवार, प्रोफेसर डी. सी. शर्मा, बृजेंद्र कुमार, मंजुला गौर, स्वाति सोनी, एल्सा तथा रामलाल चौधरी ने की।

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