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श्री बाबू को नमन…

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बिहार के प्रथम प्रधानमंत्री (स्वतंत्रता के पहले मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बोला जाता था) एवं मुख्यमंत्री बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) को उनकी जयंती पर सादर नमन। आपका जन्म 21 अक्टूबर, 1887 को नवादा जिले के खनवां गांव में हुआ था। आपने स्वतंत्रता आंदोलन और बिहार के नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे आपके नाम पर स्थापित श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय, नयागांव (खगड़िया) में तीन वर्षों तक पढ़ने तथा वहां से ही मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।

आज श्री बाबू के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर मैं अपने श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय, नयागांव (खगड़िया) के बारे में कुछ बातें आप सबों से शेयर कर रहा हूँ। इनमें से अधिकांश जानकारियां मेरे सहपाठी मित्र मारुति नंदन मिश्र (नयागांव) ने उपलब्ध कराई हैं।

खगड़िया जिलांतर्गत परबत्ता प्रखंड के नयागांव में आजादी के साथ वर्ष पूर्व सन् 1940 ई. में श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय की स्थापना हुई। उस समय संपूर्ण परवत्ता क्षेत्र में एक भी उच्च विद्यालय नही था। शिक्षा, प्राप्त करना सामान्य स्तर के लोगों के लिए आसान नहीं था। इस क्षेत्र के मध्य विद्यालय से उतीर्ण छात्रों का भटकना पड़ता था। ऐसे में गाँव के प्रबुद्ध शिक्षाप्रेमियों ने नयागांव में विद्यालय स्थापना का संकल्प लिया। तत्काल गाँव वालों ने बाँस, शिशम इकट्‌ठा करके सौ हाथ का फूस का मकान तैयार किया।

गाँव वालों की इच्छा हुई की श्रीकृष्ण सिंह के नाम पर इस विश्चालय का नाम रखा जाए। इस कार्य की स्वीकृति के लिए नयागांव से तीन व्यक्ति त्रिवेणी सिंह, दामोदर प्रसाद सिंह एवं यमुना प्रसाद सिंह, श्री बाबू से मिलने मुंगेर गये। श्री बाबू प्रेम भाव से लिखित रूप में अपने नाम की स्वीकृति दी।

इस विद्यालय के प्रति डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का काफी लगाव था। 16 फरवरी, 1942 को उन्होंने लिखा है, – “इस विद्यालय की स्थापना पर मैं यहाँ के उत्साही लोगों को बधाई देता हूँ और में आशा करता हूँ कि इसकी उत्तरोत्तर उन्नति होती जाएगी” इस विद्यालय में लोकनायक जयप्रकाश नारायण, गोविन्द वल्लभ पंत, अनुग्रह नारायण सिंह, महेश प्रसाद सिंह, कुमार गंगानंद सिंह, आर. सी. सिंह, वद्रीनाथ वमी, कैलाशपति मिश्र जैसे दिग्गजों का आगमन हो चुका है।

यह विद्यालय काफी बड़ा है। विद्यालय के पास 10 एकड़ जमीन है। बड़ा खेल मैदान है। पर्याप्त कक्षाएं हैं और एक भव्य ऑडीटोरियम है, जैसा अभी हमारे विश्वविद्यालय के किसी भी महाविद्यालय में उपलब्ध नहीं है। है जहाँ प्रतिभा को प्रस्फुटित कर राष्ट्र को समर्पित है।

विद्यालय में कई विद्वान शिक्षक हुए हैं। इनमें शिक्षक श्री भोलानाथ वमी, श्री अनंत मिश्रा, श्री बलदेब मिश्चा, क्षी महेन्द्र मिश्वा आदि हमारे अध्ययन काल के पूर्व के बड़े नाम हैं। हमारे समय में श्री वकील सिंह, श्री जनार्दन प्रसाद सिंह, श्री सुरेंद्र कुंवर, श्री अंगद कुमार, धीर प्रशांत, श्री निरंजन कुमार, श्रीमती मीरा देवी, मो. यूसूफ, श्री प्रभाल कुमार आदि अपने-आपने विषय के विद्वान शिक्षक थे।‌

आगे अपने इस विद्यालय और यहां के शिक्षकों के बारे में बाद में विस्तार से लिखूंगा। फिलहाल श्री बाबू को पुनः सादर नमन करता हूँ और विद्यालय के निर्माण एवं विकास में योगदान देने वाले सभी ग्रामीणों, शिक्षकों एवं अन्य ज्ञात-अज्ञात लोगों को सादर प्रणाम निवेदित करता हूँ। इसके साथ ही मित्र मारुति को बहुत-बहुत धन्यवाद ज्ञापित करना भी मैं अपना परम कर्तव्य समझता हूँ।

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