इस ‘खुशी’ पर कौन न मर जाए ऐ खुदा…
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आज सुबह-सुबह गुरूवर प्रोफेसर मनोज कुमार जी का फोन आया। सबसे पहले उन्होंने अपनी नवीनतम पुस्तक ‘बिहार में गाँधी’ के संबंध में मेरा ‘फीडबैक’ लिया, जिस पर अलग से बात करने की जरूरत है। आगे हमारे बीच गाँधी की विरासत के संकलन एवं संपादन की आगामी योजनाओं पर चर्चा हुई, जिसकी जानकारी इस माह के अंत तक आप सबों से साझा करूंगा।
लेकिन अंत में गुरुवर ने जो बात कही, उसकी चर्चा करने से अपने आपको नहीं रोक पा रहा हूँ। दरअसल अंत में उन्होंने कहा कि “तुम्हारे कुलपति ने तुमको विश्वविद्यालय से दूर भेज दिया, इससे मैं काफी खुश हूँ। तुम बेवजह अपनी प्रतिभा को ‘बाबूगिरी’ में नष्ट कर रहे थे और हम लोगों को अपेक्षित समय नहीं दे रहे थे। अब विश्वविद्यालय के ‘अनुत्पादक’ कार्यों से मुक्त हुए हो, तो कुछ ‘रचनात्मक’ कार्य हो सकेगा।”
गुरुवर की ऐसी खुशी के बारे में जानकर मुझे काफी सकुन मिला। इससे मेरा इस बात में विश्वास गहरा हुआ कि हरएक ‘नकारात्मक’ चीजों के अंदर भी कुछ-न-कुछ ‘सकारात्मक’ बातें छीपी होती हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने सोचने के ढंग को सकारात्मक बनाएं और विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर कार्य करने की कोशिश करते रहें।
अंत में यह उल्लेखनीय है कि गुरुवर प्रो. मनोज कुमार सहित मेरे कई गुरु एवं शुभचिंतक मेरे विश्वविद्यालय में जनसंपर्क पदाधिकारी बनने के समय से ही मुझे विश्वविद्यालय के कार्यों को छोड़कर पठन-पाठन एवं लेखन पर ध्यान देने की सलाह देते रहे हैं। स्वयं मैं भी समय-समय पर इस संबंध में संकल्प लेता रहा हूँ। इसी कड़ी में मई 2024 में मैंने विश्वविद्यालय के उपकुलसचिव (स्थापना) एवं विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभाग के प्रभारी विभागाध्यक्ष के पद से इस्तीफा देकर अपने पैतृक महाविद्यालय (ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा) की सेवा में वापस आ गया था। उस समय भी प्रो. मनोज कुमार ने मेरे इस निर्णय की सराहना की थी।
लेकिन एक वर्ष के अंदर ही मैं पुनः विश्वविद्यालय के मोहजाल में फंस गया और मई 2025 में कार्यक्रम समन्वयक (एनएसएस) बनकर एक बार फिर पुराने रास्ते पर चला आया। इस बीच प्रो. मनोज ‘बिहार में गाँधी : यात्रा’ के क्रम में मधेपुरा आए। उस समय भी उन्होंने मुझसे कहा था, “तुमने छात्र जीवन में रचनात्मक क्षेत्र (लेखन एवं संपादन) में बेहतर कार्य किया है। लेकिन शिक्षक बनने के बाद प्रशासनिक कार्यों में फंसे हुए हो। प्रशासनिक कार्यों को छोड़कर रचनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाओ।” फिर भी मैंने उस समय उनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था। मैं विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के कार्यों में लगा रहा। मैं कभी कुलपति को खुश करने की कोशिश करता, तो कभी कुलसचिव को और कभी प्रधानाचार्य को।
लेकिन ऐसी परिस्थिति बनी कि मैं कुलपति, कुलसचिव एवं प्रधानाचार्य किसी को भी खुश नहीं रख सका। इसमें भी कुलपति जी तो मेरे ऊपर इतने क्रुद्ध हो गए कि उन्होंने मेरे खिलाफ अपने ‘ब्रहमास्त्र’ का प्रयोग कर दिया। महज शक के आधार पर रातोंरात मेरा स्थानांतरण अपने पैतृक महाविद्यालय से लगभग 85 किलोमीटर दूर ललित नारायण मिश्र स्मारक महाविद्यालय, वीरपुर (सुपौल) कर दिया। मुझे तत्काल इसे चाहे-अनचाहे स्वीकार करना पड़ा- इसमें मेरी ‘खुशी’ एवं ‘गम’ जाहिर करने का कोई अर्थ नहीं था।
खैर, मैं अपने नए महाविद्यालय में योगदान करने आया, तो मैं अपनी खुशी दिखाने के लिए मधेपुरा से (शिवजी साव का) दो-तीन किलो शुद्ध लड्डू लेकर आया। यहां शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. पंकज शर्मा के नेतृत्व में सभी साथियों ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया और मेरे यहां आगमन पर एक व्यक्ति को छोड़कर सभी शिक्षक साथियों ने खुशी जाहिर की। मजे की बात यह है कि जिस व्यक्ति ने खुशी जाहिर नहीं की, वह इस महाविद्यालय में मेरा सबसे करीबी मित्र है-डॉ. मोहित गुप्ता। उन्होंने मेरे हाथों से लड्डू खाने से भी साफ-साफ मना कर दिया और कहा, “मुझे आपके इस तरह यहां आने से कोई ‘खुशी’ नहीं है, बल्कि गहरा ‘गम’ है।” मुझे शिक्षक संघ के अध्यक्ष एवं अन्य शिक्षक साथियों की ‘खुशी’ और मोहित जी के ‘गम’ दोनों में अपने प्रति जो स्नेह एवं सम्मान नजर आया, वह मेरे जीवन की बहुमूल्य निधि है।
आज गुरुवर प्रो. मनोज कुमार द्वारा मेरे मधेपुरा से वीरपुर आने पर खुलकर अपनी खुशी जाहिर की। उनकी इस खुशी में अपने ‘शिष्य’ के दूरगामी हितों के प्रति उनकी चिंता निहित है। सचमुच सच्चा गुरु वही है, जो अपने शिष्य को “प्रेय’ (प्रियकर) की बजाय उसे ‘श्रेय’ (श्रेयष्कर) का मार्ग दिखाए। गुरुजी ने मेरे वीरपुर स्थानांतरण पर खुशी जाहिर कर अपने इसी दायित्व का निर्वहन किया है। गुरुजी को बारंबार प्रणाम और फिलहाल उनके लिए इतना ही-, “इस ‘खुशी’ पर कौन न मर जाए ऐ खुदा…”














