पुस्तक समीक्षा
पुस्तक : स्मृतियों में जीवन – राग , लेखक : श्रीभगवान सिंह, प्रकाशन : यश प्रकाशन, नई दिल्ली, मूल्य – 450 रुपए
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इक्कीसवीं शताब्दी के हिंदी आलोचकों में प्रोफ़ेसर श्रीभगवान सिंह का नाम मुख्य रूप से गांधीवादी आलोचक के रूप में लिया जाने लगा है, परंतु उनके आलोचक का यह रूप उनके समग्र आलोचकीय व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं कर पाता है। केवल श्रीभगवान सिंह ही नहीं किसी भी आलोचक को यदि हम किसी निर्मित सिद्धांत के व्याख्याता के रूप में स्थापित कर दें तो उसका चिंतन एक घेरे के अंदर सिमट कर रह जाता है; और उसके चिंतन का विकास सर्व ग्राही स्तर पर नहीं हो पाता है। श्रीभगवान सिंह ने महात्मा गांधी से संबंधित बहुत – सी पुस्तकें लिखी हैं, इसका मतलब यह नहीं हुआ कि वे गांधीवादी आलोचक हो गए। सच तो यह है कि वे दुनिया की महान हस्तियों से प्रभावित रहे हैं पर किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उन पर हावी होने नहीं सका है। उन्होंने आलोचक का जो चरित्र निर्मित किया है वह उनके संस्कारों से उपजा चरित्र है। श्रीभगवान सिंह खुद अपना विचार देते हैं कि ” अब तक गांधी पर मेरी नौ किताबें आ चुकी हैं और मेरे न चाहने के बावजूद मेरे लिखे को पढ़ने वाले मुझे ‘ गांधीवादी ‘ लेखक कहने लगे हैं।” ( स्मृतियों में जीवन – राग, पृष्ठ – 45 ) । अर्थात् श्रीभगवान सिंह भी नहीं चाहते हैं कि उन पर गांधीवादी आलोचक होने का ठप्पा लगे।
बहरहाल,’ स्मृतियों में जीवन – राग ‘ पुस्तक वैसे तो एक संस्मरण की पुस्तक कही जा सकती है, पर संस्मरण के साथ – साथ साहित्य, समाज एवं राजनीति पर भी जगह – जगह उनका आलोचकीय दृष्टिबोध इस पुस्तक में बखूबी दिखाई दे रहा है अतः इसे संस्मरणात्मक आलोचना के अंतर्गत रखा जा सकता है। पूरी पुस्तक दो खण्डों में विभाजित है – 1. साहित्यकार- प्रसंग, 2. मित्र – प्रसंग। ‘साहित्यकार -प्रसंग’ में दिनकर, फिराक गोरखपुरी, फैज़ अहमद फ़ैज़, अज्ञेय हैं जिन्हें लेखक ने दूर से देखा और सुना है तो दूसरी ओर रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, कृष्णदत्त पालीवाल, रवींद्र कालिया, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी और सदानंद प्रसाद गुप्त हैं जिनसे उनका मित्रवत व्यवहार रहा है। नामवर जी श्रीभगवान सिंह के गुरु रहे हैं एवं रामविलास जी गुरु तुल्य । दूसरे खंड ‘ मित्र – प्रसंग ‘ में अनुपम मिश्र, देवी प्रसाद त्रिपाठी, दिग्विजय सिंह, समिधा मित्र मंडली, पटना कॉलेज के सहपाठी मित्र एवं अपनी मां पर लिखा हुआ एक मार्मिक संस्मरण है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें वार्तालाप स्तर की एवं संगोष्ठियों में आयोजित वाद – विवादों की ऐसी टिप्पणियां उद्धृत की गई हैं जिन से साहित्य के बहुत अनसुलझे तथ्यों की गुत्थियां खुल जाती हैं। ऐसी गुत्थियों को सुलझने से लेखकों के व्यक्तित्व से परिचित होने में काफी सहूलियत मिलती है और संवाद – सूत्रों के हवाले से साहित्येतिहास की यथार्थ छवि मानस – पटल पर अंकित हो जाती है।उदाहरणस्वरूप , रामविलास जी एवं नामवर जी के बीच फैले विवाद को हिंदी साहित्य में जरूरत से ज्यादा तरजीह दी जाती रही है और दोनों को एक दूसरे का प्रतिद्वंद्वी माना जाता रहा है; स्वयं श्रीभगवान सिंह जी के मन में भी दोनों आलोचकों के बीच चल रहे मतभेद को जानने की इच्छा इतनी अधिक बलवती हो चली कि उन्होंने रामविलास जी से एक दिन प्रश्न कर ही दिया – ” आप दोनों में इतना विरोध क्यों देखा जाता है ? ” डॉ. शर्मा ने काफी संयत होकर उत्तर दिया – ” देखो, मैं हिंदी के सभी मार्क्सवादी आलोचकों में नामवर को सबसे अधिक प्रतिभाशाली मानता हूं, लेकिन वह अक्सर राजनीतिक अवसरवाद का शिकार होकर अपनी प्रतिभा को कुंद कर देता है। उसकी प्रतिभा को सही दिशा मिले, उसका और अधिक निखार हो, इसलिए मैं अक्सर उसके राजनीतिक अवसरवाद पर प्रहार करता रहता हूं।” ( पृष्ठ – 32 ) मैं सोचता हूं, विद्वान व्यक्ति क्रोध भी करता है तो उसके पीछे भी स्नेह की सरिता बह रही होती है। रामविलास जी ने संगोष्ठियों में जाना क्यों छोड़ दिया था, उन्होंने अपने समकालीन लेखकों पर लिखना क्यों छोड़ दिया आदि अनेक प्रश्नों के उत्तर रामविलास जी ने लेखक को दिए हैं जिससे लेखक बिरादरी में फैली दरारें और आत्मीयता की मधुर मिठास दोनों खुल कर सामने आती हैं। श्रीभगवान सिंह और नामवर जी के साथ गुजरे कुछ लम्हें और उनके बीच संवाद के कुछ गुजरे पल बहुत सारे साहित्यिक भ्रम को दूर करते हैं। नामवर जी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में श्रीभगवान सिंह की पी एच डी के गाइड रहे हैं। नामवर जी से संबंधित यहां अनेक प्रसंग हैं जो साहित्यिक भी हैं, पारिवारिक और व्यक्तिगत में। जिसमें ज्ञान की गरिमा भी है और हास्य की फुलझड़ी भी, जिसमें गुरु का सम्मान भी है और मित्रता का अपनत्व भी।
कृष्णदत्त पालीवाल इक्कीसवीं सदी की आलोचना के संत आलोचक हैं। उनका अध्ययन जितना विस्तृत था, स्मरण शक्ति भी उतनी ही विलक्षण थी। उनकी आलोचना पद्धति को श्रीभगवान सिंह जी ने जितना आत्मसात किया है उतना शायद किसी आलोचक ने नहीं। इसी प्रकार रवींद्र कालिया के आत्मीय व्यवहार, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का मित्रवत स्नेह और सदानंद प्रसाद गुप्त की प्रज्ञा दृष्टि के संबंध में अनेक रोचक एवं साहित्यिक संस्मरण इस पुस्तक की गरिमा को और बढ़ा देते हैं। विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के सहपाठी मित्रों को याद कर उन्होंने उस जमाने की मित्रता को मूल्यांकित किया है जिसे आजकल हम खोते चले जा रहे हैं। कोई अनमोल चीज हम से खिसकती चली जा रही है, जो कभी हमारे जीवन की आधारशिला बना करती थी।
अंत में इस पुस्तक में लेखक ने अपनी मां को याद किया है जो पढ़ी – लिखी तो नहीं थी पर घर को सहेजने से लेकर अनेक कलाओं दक्ष थीं। इस संस्मरण की अंतिम पंक्तियां आँखों आँसू ला देती हैं जब लेखक अपनी मां के अंतिम संस्कार का उल्लेख करता है। यह लेख श्री रामजन्म मिश्र की ‘ मां ‘ विशेषांक पत्रिका ‘ प्रगति वार्ता ‘ के लिए लिखा गया था।
इस पुस्तक में लेखक की सहधर्मिणी का थोड़ा उल्लेख है कि उन्होंने जे एन यू से पी एच डी की हैं, पर उनके विषय में कुछ और जानकारी होती जैसे उन्होंने उनके जीवन – राग का कितना सुरीला बनाया, उनका कितना सहयोग रहा तो और भी अच्छा होता। पर जहां तक मेरा ख्याल है अपने परिवार के बारे में कुछ लिखना वे मुनासिब नहीं समझते हैं।
यह पुस्तक हमारी सोच को समृद्ध करती है। हमें ऐसे लेखन की ओर प्रेरित करती है जिसमें सच्चाई का अभिज्ञान हो, साक्षात्कार हो, प्रश्न हो, उत्तर हो तथा जिसमें समस्याओं की दीवार नहीं, समाधान का समतल मैदान हो।
-हरेराम पाठक














