स्त्री : सृजन, सरोकार एवं आलोचना
लंबे समय से आप सभी से दूर रहने के बाद अंततः सार्थक और बेहद परिश्रम से लिखी गई पुस्तक तैयार हो गई …. इस पुस्तक में हिंदी स्त्रीवादी आलोचना की को केवल अस्मिता या पश्चिमी सिद्धांतों तक सीमित न रखकर भारतीय अनुभवों जाति, वर्ग, श्रम, लोक, स्मृति, मिथक, विभाजन और युद्ध से जोड़ा गया है। यह पुस्तक ‘देशज स्त्रीवादी दृष्टि’ का विकास है, जो वैश्विक चिंतन से संवाद करते हुए स्थानीय यथार्थ को केंद्र में रखती है। यह आलोचना को निर्णय सुनाने का उपक्रम न मानकर रचना के साथ बौद्धिक-संवेदनात्मक सहयात्रा मानती है । यह दृष्टिकोण इस पुस्तक की नैतिक शक्ति है ।
यह पुस्तक हिंदी स्त्रीवादी आलोचना की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है जो 1980-90 के दशक से विकसित हुई और अब अधिक अंतर्संबंधित, देशज और बहुस्वर हो रही है जो स्त्री को केवल पीड़िता या प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि स्मृति, श्रम, प्रतिरोध, स्वप्न और ज्ञान की सक्रिय वाहिका के रूप में पढ़ती है।
जो पाठक स्त्री-विमर्श को अस्मिता के दायरे से बाहर निकालकर साहित्य, इतिहास और समाज की गहन संरचनाओं से जोड़ना चाहते हैं, उनके लिए यह कृति उपयोगी है। यह न केवल हिंदी साहित्य के स्त्री-पाठों को नए प्रश्नों के साथ पढ़ने का आमंत्रण देती है, बल्कि आलोचना की अपनी पद्धति पर भी पुनर्विचार करने का अवसर प्रदान करती है।
नोट: पुस्तक का कवर पेज AI जेनरेटेड है । बहुत जल्द इसका कवर और समस्त प्रकाशन विवरण आप सभी के साथ साझा करूंगी । इंतजार कीजिए ….
– डॉ. सुप्रिया पाठक जी के फेसबुक वॉल से साभार।














