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पत्र वापस नहीं लिया तो जाएंगे पटना उच्च न्यायालय

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  1. *पत्र वापस नहीं लिया तो जाएंगे पटना उच्च न्यायालय*

बीएनएमयू, मधेपुरा के बाद टीएमबीयू, भागलपुर में भी राज्यपाल सचिवालय, लोक भवन, पटना द्वारा जारी पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 के आलोक में नामांकन की प्रक्रिया शुरू की गई है। लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों में केवल पीजी विभाग, पीजी सेंटर एवं पीजी शिक्षण महाविद्यालयों के शिक्षकों को ही शोध-निदेशक बनने का प्रावधान किया गया है।‌ बीएनएमयू, मधेपुरा के सीनेटर डॉ. सुधांशु शेखर ने इस पर पुनः अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।

डॉ. शेखर का कहना है कि दोनों विश्वविद्यालय द्वारा जारी यह पत्र राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम के विरुद्ध है। उन्होंने बताया कि पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 की कंडिका संख्या- 8.1.1. (ए) में पीएच. डी. शोध-निदेशक की योग्यता से संबंधित प्रावधान है। इसमें सभी शिक्षकों को विश्वविद्यालय शिक्षक माना गया है। शोध-निदेशक बनने के मामले में विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों तथा स्नातक महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों में कोई भेदभाव नहीं किया गया है। यहां तक कि इसी कंडिका में आगे विशेष परिस्थितियों में संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों को भी शोध-निदेशक बनाने का प्रावधान किया गया है।

डॉ. शेखर ने बताया कि बीएनएमयू एवं टीएमबीयू सहित बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभागों, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों एवं स्नातक स्तरीय महिविद्यालयों के लिए शिक्षकों का चयन एक ही चयन प्रक्रिया, एक ही विज्ञापन और एक ही आयोग द्वारा किया जाता है। आयोग द्वारा सभी शिक्षकों को विश्वविद्यालय के लिए चयनित किया जाता है और चयनित शिक्षकों की सूची संबंधित विश्वविद्यालयों को भेज दी जाती है। ऐसे में एक ही सूची में शामिल शिक्षकों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षकों का विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों अथवा स्नातक महाविद्यालयों में रिक्तियों की उपलब्धता के आधार पर पदस्थापन किया जाता है। अनेक ऐसे शिक्षक हैं, जिनको चयन सूची में उच्च स्थान होने के बावजूद स्नातक महाविद्यालयों में पदस्थापित किया गया है, जबकि दूसरी ओर कई कम रैंक वाले शिक्षक यदि पीजी विभाग अथवा पीजी महाविद्यालय में पदस्थापित किए हैं। अब तक दोनों में कोई अंतर नहीं है।

उन्होंने बताया कि अब विश्वविद्यालय का संदर्भित आदेश लागू होने से स्नातक महाविद्यालयों के शिक्षकों को दोयम दर्जे का मानते हुए उन्हें शोध-निदेशक बनने से वंचित कर दिया गया है। इससे शोधार्थियों के लिए शोध निदेशक की उपलब्धता सीमित हो जाएगी। इसके साथ ही शोध-निदेशक नहीं बनने वाले शिक्षकों के लिए एसोसिएट प्रोफेसर पद पर पदोन्नति हेतु शोध-निदेशन का प्रमाण देना असंभव हो जाएगा।

उन्होंने आरोप लगाया कि बीएनएमयू के कुलपति प्रो. बी. एस. झा, जो टीएमबीयू के भी प्रभार में हैं जानबूझकर अनावश्यक एवं गैरजिम्मेदाराना पत्र निकालकर शिक्षकों एवं शोधार्थियों को मानसिक आघात पहुंचा रहे हैं। यदि वे पत्र को वापस नहीं लेंगे, तो इसकी राज्यपाल-सह- कुलाधिपति एवं पटना उच्च न्यायालय में भी शिकायत दर्ज कराई जाएगी।

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