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बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति की पात्रता एवं प्रक्रिया हेतु गठित परिनियमानुसार राज्य के योग्य अभ्यर्थियों के हित में कतिपय महत्वपूर्ण संशोधन के संबंध में अनुरोध।

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विषय : बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति की पात्रता एवं प्रक्रिया हेतु गठित परिनियमानुसार राज्य के योग्य अभ्यर्थियों के हित में कतिपय महत्वपूर्ण संशोधन के संबंध में अनुरोध।

विषयांकित प्रसंगाधीन मामले में नियुक्ति संबंधी परिनियम का उद्देश्य स्वाभाविक रूप से बिहार के योग्य अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करते हुए राज्य के विश्वविद्यालयों में सक्षम शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करना होना चाहिये। किन्तु, वर्तमान में तैयार किये गये परिनियम को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें बिहार के स्थानीय अभ्यर्थियों के हितों की अपेक्षा अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए अधिक अवसर सुनिश्चित कर दिये गये हैं।

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि परिनियम का प्रारूप तैयार करते समय इस बात का समुचित परीक्षण नहीं किया गया कि पूर्व में राज्य के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्तियां किन-किन नियमों और प्रावधानों के अंतर्गत होती रही हैं।

साथ ही, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के प्रचलित प्रावधानों तथा हाल ही में बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा नवसृजित राजकीय डिग्री महाविद्यालयों में Fixed Term Contractual Appointment के आधार पर मिशन मोड में की गई नियुक्तियों को भी अपेक्षित दृष्टि से नहीं देखा गया। आखिर इसी प्रकार की व्यावहारिक और पारदर्शी व्यवस्था को आधार बनाकर राज्य के अभ्यर्थियों के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए छात्रहित में मिशन मोड के तहत ही परिनियम में आवश्यक संशोधनोपरान्त सहायक प्राध्यापकों की स्थाई नियुक्ति का मार्ग क्यों हीं प्रशस्त किया जा सकता है?

महायक प्राध्यापक नियुक्ति से संबंधित प्रसंगाधीन उपरोक्त परिनियम के कंडिका 3.4 में पूर्व निर्धारित आयु सीमा 55 वर्ष को घटाकर 43 वर्ष कर दिया गया है, जिसके कारण पूर्व से चल रही नियुक्ति प्रक्रिया में दीर्घ विलंब होने के कारण राज्य के अधिकांश योग्य अभ्यर्थी आवेदन देने से वंचित हो जा रहे हैं। सम्प्रति राज्य के सक्षम अभ्यर्थियों हेतु इस परिनियम में कतिपय संशोधन अपेक्षित है जो निम्नांकित है –

(क) यह कि, वर्ष 2020 में विज्ञापित सहायक प्राध्यापकों की रिक्ति के विरूद्ध लगभग 7 वर्षों के बाद भी नियुक्ति की प्रक्रिया पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुई है और इन 7 वर्षों की अवधि में जो भी U.G.C. Regulation, 2009 तथा 2016 के तहत पी.एच.डी. उपाधिधारक सक्षम अभ्यर्थी हैं, उन्हें भी अधिकतम उम्र सीमा के नाम पर आवेदन से भी अयोग्य कर दिया गया है, जो राज्यहित में कतई उचित प्रतीत नहीं होता ।

पुनः परिनियमानुसार नियुक्ति हेतु अधिकतम आयु सीमा को भी 55 वर्ष से 43 वर्ष कम किए जाने से राज्य के अधिकांश प्रतीक्षारत योग्य एवं सक्षम पात्रों को शायद जान-बूझकर ही अयोग्य पात्रों की श्रेणी में रख दिया गया है जो न्यायसंगत नहीं है।

ध्यातव्य है कि पूर्वनिर्धारित परिनियम के अंतर्गत सहायक प्राध्यापकों की सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 65 वर्ष तथा NPS के अंतर्गत न्यूनतम 10 वर्षों की Qualifying Service निर्धारित होने के कारण वे नई पेंशन योजना से आच्छादित हो जाते थे। इसीलिए इस आधार पर भी नियुक्ति हेतु अधिकतम आयु सीमा पूर्व की भांति 55 वर्ष ही निर्धारित किया जाना शैक्षणिक एवं प्रशासनिक द्रष्टि से तर्कसंगत, न्यायसंगत एवं उच्च शिक्षा के हित में व्यावहारिक होगा।

अतः नियुक्ति हेतु गठित परिनियम में अधिकतम आयु सीमा 43 वर्ष को पुनर्निर्धारित कर पूर्व की भांति 55 वर्ष किए जाने हेतु सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाना सुसंगत होगा।

(ख) यह कि, NET/J.R.F.Qualified Candidates जिन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी दक्षता प्रदर्शित की है, उनके लिए दोबारा लिखित परीक्षा की जरूरत ही क्या और क्यों है? जबकि N.T.A./C.S.I.R. के NET/J.R.F. की परीक्षा में भी Eligibility for Assistant Professor का प्रावधान भी है।

महोदय, विषयांकित नियुक्ति की प्रक्रिया कुछ ऐसी ही कर दी गई है कि संघ लोक सेवा आयोग से चयनित अभ्यर्थियों से पुनः बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने को कहा जाना। यह सुनने में अटपटा जरूर लगता है, मगर सहायक प्राध्यापक नियुक्ति परिनियम में ऐसा ही प्रावधान कर दिया गया है।

साथ ही UGC Regulation, 2009 तथा 2016 के तहत पी.एच.डी उपाधि हेतु पूर्णकालिक पाठ्यक्रम के अभ्यर्थियों के लिए भी लिखित परीक्षा आयोजित किये जाने का कोई औचित्य ही नहीं है।

(ग) यह कि, राज्य सरकार की आरक्षण नियमावली के अनुरूप नियुक्त एवं कार्यरत /कार्यमुक्त अतिथि प्राध्यापकों के लिए भी पूर्व की भांति नियुक्ति की प्रक्रिया में भारांक (weightage) का प्रावधान नहीं किया गया है, जो नियमसंगत नहीं है। राज्य के लगभग 3000 महायक प्राध्यापकों के कार्यानुभव और उनके अध्यापन अनुभव की सक्षमता पर उम्र सीमा की शर्तों को थोपकर आवेदन दिये जाने से भी वंचित कर दिया गया है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

(घ) यह कि, बिहार गजट, 2013 के प्रावधानों के तहत संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों, जिनकी सेवा नियमितीकरण का कार्य महाविद्यालय चयन समिति की अनुशंसा पर की गई है और उनका अनुभव प्रमाण-पत्र भी संबंधित विश्वविद्यालय के कुलसचिव द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित किया गया है । वैसे अभ्यर्थियों को भी उनकी सक्षमता के आधार पर सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति की प्रक्रिया हेतु योग्य अभ्यर्थी की श्रेणी में लाये जाने का प्रावधान किया जाना श्रेयस्कर होगा।

अतः उपरोक्त तथ्यों के आलोक में भवदीय से अनुरोध है कि राज्यहित में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति परिनियम, 2026 में संशोधन हेतु प्रस्ताव राज्य सरकार के स्तर से लोक भवन को प्रेषित करना चाहेंगे।

– डॉ. संजीव कुमार सिंह, माननीय सदस्य, कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र, बिहार विधान परिषद्, पटना।

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बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति की पात्रता एवं प्रक्रिया हेतु गठित परिनियमानुसार राज्य के योग्य अभ्यर्थियों के हित में कतिपय महत्वपूर्ण संशोधन के संबंध में अनुरोध।

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