विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का सवाल!
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बिहार सरकार के प्रस्तावित विश्वविद्यालय अधिनियम- 2026, जिससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के छीनने की आशंका है के विरोध में शिक्षकों एवं कर्मचारियों का संयुक्त आंदोलन जारी है। इसे बिहार विधान परिषद् में शिक्षकों एवं स्नातकों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रायः सभी माननीय सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। आगे इस आंदोलन के साथ विद्यार्थियों एवं अभिभावकों को भी जोड़ने की योजना है। इस तरह हम आशा रखते हैं कि यह एक जनांदोलन का रूप लेगा, जिसके दवाब में आकर सरकार विश्वविद्यालय अधिनियम- 2026 लाने का विचार त्याग देगी।
लेकिन अभी ही वक्त है कि हम सभी इस समस्या की जड़ों पर ध्यान दें। हमें यह सोचना होगा कि आखिर सरकार ने इस अधिनियम को लाने का मन क्यों बनाया ? इसके कई कारण हो सकते हैं, जिसे हम मोटा-मोटी दो वर्गों में समझ सकते हैं-
01. बाह्य कारण : सरकार महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों को भी विभिन्न स्तरों के विद्यालयों की तरह अपनी नीतियों एवं योजनाओं के प्रचार- प्रसार का एक माध्यम बनाना चाहती है। इसके साथ ही सरकारी तंत्र उच्च शिक्षा को एक दूधारू गाय की तरह देख रहा है। वह पहले ही भवन निर्माण का काम अपने जिम्मे ले चुका है और आगे अन्य कार्यों को भी अपने नियंत्रण में लेना चाह रहा है। इसके साथ ही स्वायत्तता के नाम पर विश्वविद्यालय में व्याप्त अराजकता एवं भ्रष्टाचार ने भी सरकार को इसे अपने नियंत्रण में करने का एक बहाना दे दिया है, इसे हम दूसरे बिंदु (आंतरिक कारण) में विस्तार से समझ सकते हैं।
02. आंतरिक कारण : प्रायः सभी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों के द्वारा वर्तमान विश्वविद्यालय अधिनियम -1976 में प्रदत्त शक्तियों का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग किया जा रहा है और अराजकता, तानाशाही एवं गुटबाजी चरम पर है। खासकर शैक्षणिक एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण के नाम पर शिक्षकों एवं कर्मचारियों का दंडात्मक स्थानांतरण आम हो गई है। सीनेट, सिंडिकेट एवं अन्य प्राधिकारों/निकायों को कुंद कर दिया गया है। विश्वविद्यालय द्वारा ससमय उपयोगिता प्रमाणपत्र भी नहीं दिया जाता है, जो वेतन एवं पेंशन भुगतान में देरी की एक मुख्य वजह है। विश्वविद्यालय में कुलपति, कुलसचिव, वित्त पदाधिकारी एवं परीक्षा नियंत्रक के स्तर से लगातार बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की बातें सामने आती रहती है।अन्य पदाधिकारियों को भी उनसे विभिन्न कार्यों में यथायोग्य चढ़ावा मिलता है। उदाहरण के लिए संबद्ध महाविद्यालयों को मान्यता देने तथा अनुदान वितरण करने में महाविद्यालय निरीक्षक का सूटकेस भी भर जाता है।
इस तरह विश्वविद्यालय की तथाकथित स्वायत्तता विश्वविद्यालय प्रशासन के भ्रष्टाचार का कवज बन गई है और इसकी आड़ में शिक्षकों, कर्मचारियों को प्रताड़ित किया जा रहा है और विद्यार्थियों एवं अभिभावकों का शोषण-दोहन हो रहा है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से कोई मतलब नहीं है। विश्वविद्यालय के वरीय पदाधिकारी स्वयं सरकार के मंत्रियों की खातिरदारी करने को आतुर रहते हैं और सरकारी पार्टी की विचारधारा वाले संगठनों के कार्यक्रमों का आमंत्रण पाकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं।
अतः मेरी विनम्र राय ने हमें विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बचाने के लिए इस समस्या के बाह्य एवं आंतरिक दोनों कारणों पर समान रूप से चोट करना चाहिए। यदि हम ऐसा कर सके, तभी सही मायने में स्वायत्तता बचेगी और स्वाभिमान भी बचेगा।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
-सुधांशु शेखर, सीनेट सदस्य, बीएनएमयू, मधेपुरा।














