असिस्टेंट प्रोफेसर (कांट्रेक्ट) बनने वाले सभी अभ्यर्थियों को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं। जो नहीं बन सके, वे आगे प्रयास जारी रखें।
हमेशा याद रखें कि कोई भी एक परीक्षा का परिणाम आपकी योग्यता एवं क्षमता का परिचायक नहीं हो सकता है। सफलता एवं असफलता बहुत हद तक निर्धारित मापदंडों पर भी निर्भर करता है। कई बार मापदंड ही ऐसे होते हैं कि कुछ लोगों की जीत एवं कुछेक की हार नियोजित हो जाती है। विशेष रूप से बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के संदर्भ में यह बात कुछ ज्यादा ही चरितार्थ हो रही है।
उदाहरण के लिए
01. वर्ष-2014 की नियुक्ति में बिहार के विश्वविद्यालयों से पीएच. डी. करने वाले सैकड़ों अभ्यर्थियों को पहले ही अयोग्य करार दे दिया गया और अनुभव एवं शोध-पत्र प्रकाशन को भी दरकिनार किया गया। इसके कारण बड़ी संख्या में वैसे लोग असिस्टेंट प्रोफेसर बनने में सफल हो गए, जिन्होंने सिर्फ नेट-जेआरएफ किया था।
02. वर्ष-2020 में वर्ष-2014 के ठीक विपरीत नियम लाया गया। इसमें पीएच. डी. के लिए 30, अनूभव के लिए 10 एवं शोध-पत्र के लिए भी 10 अंक का प्रावधान था। ऐसे में स्वाभाविक रूप से पीएच. डी. योग्यताधारी अभ्यर्थियों का पलड़ा भारी रहा। इसके साथ ही वर्षों से विभिन्न संबद्ध महाविद्यालयों में मर-खप रहे शिक्षकों एवं अतिथि व्याख्याताओं को लाभ मिला और पैरवी एवं पैसे वाले लोगों की भी किस्मत चमकी।
03. वर्तमान में असिस्टेंट प्रोफेसर (कांट्रेक्ट) की बहाली प्रक्रिया चल रही है। इसमें फिर मापदंड बदल दिया गया है। इसमें मैट्रिक से लेकर स्नातकोत्तर तक के अंकों का महत्व बढ़ा है। अनुभव एवं शोध-पत्र प्रकाशन को दरकिनार कर दिया गया है। पीएच. डी का अंक 30 से घटाकर 11 और नेट एवं जेआरएफ का अंक क्रमश: 5 से बढ़कर 8 एवं 7 से बढ़कर 11 कर दिया गया है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि साक्षात्कार का अंक जो वर्ष 2014 एवं वर्ष 2020 दोनों में 15 था, को इस बार घटाकर 12 कर दिया गया है और उम्रसीमा भी 55 से घटकर 43 कर दी गई है। ऐसे में ज्यादा उम्र वाले अभ्यर्थी तो पहले ही रेश से बाहर हो गए। फिर जिनका एपीआई स्कोर अच्छा था, उनकी लॉटरी लग गई।
बहरहाल, नीति नियंताओं से अनुरोध है कि वे वैसा मापदंड रखें, जो तर्कसंगत एवं न्यायपूर्ण हो।
बहुत-बहुत धन्यवाद।


















