जेन_जी_की_भाषा
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नहीं कह सकती कि यह आंदोलन.खत्म हुआ है या नहीं। शायद खत्म नहीं ही हुआ है। यह हमारी नई पीढी है, बेबाक और बेलौस। किसी हदतक निडर भी, जुझारू भी और मुँहफट भी।
जेन जी के पोस्टर निशाने पर हैं। कैसे गंदे और अश्लील पोस्टर लेकर जेन जी आंदोलन में कूदी है! यह किसी सभ्य समाज या सभ्य-सुसंस्कृत व्यक्ति की भाषा हो सकती है क्या? कैसी भदेस पीढी आ रही है हमारी?
चिंता वाजिब है। इस चिंता के मद्देनजर मैं तनिक पीछे का सवाल पूछती हूं -“यह पीढी आई कहां से है?” जाहिर है, आसमान से नहीं टपकी है, हमने-आपने ही पैदा किया और गढा है इस पीढी को। तो बेेहतर हो,पहले अपने आप को टटोल लें, अपनी भाषा को टटोल लें।
जहां तक भाषा का सवाल है, भाषा न तो व्यक्ति गढता है और ना ही भाषा किसी एक या दो पीढी के द्वारा रची जाती है। भाषा तो समग्र सामाजिक संरचनाओं की परस्पर द्वंदात्मक प्रक्रियाओं द्वारा दीर्घ काल में निरंतर रचे जाते रहे मानव-मन की एक सुलभ सहज स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। जाहिर है, जेन जी जो भाषा बोल रही है, उस भाषा का पूरा-पूरा ठीकरा हम जेन जी के माथे नहीं फोड सकते। जेन जी जो भाषा बोल रही है, वह भाषा तो हमने, हमारे समाज ने, पीढी दर पीढी अपनी जटिल होती जा रही सामाजिक प्रतिक्रियाओं के दौरान गढी है।
आप कह सकते हैं, यह भाषा किसी शिक्षित सभ्य व्यक्ति या समाज की भाषा नहीं है। हम अपने घरों में, अपने बच्चों से यह भाषा नहीं बोलते। हम सभा-सम्मेलनों में यह भाषा नहीं बोलते। स्त्रियों और बच्चों के सामने इस तरह की भाषा का इस्तेमाल अशिष्टता है।
सच कहा आपने। आज का तथाकथित सभ्य और शिक्षित भारतीय समाज यह भाषा अमूमन नहीं बोलता, कम से कम सरे-आम नहीं बोलता, औरतों और बच्चों के सामने नहीं बोलता… किंतु बोलता तो है। भले अपना चेहरा छुपाकर बोले, पर बोलता तो है! जहां दबंगपना और मर्दानगी दिखानी होती है वहां बेलौस बोलता है।
मतलब, हमने भाषा के दुहरे प्रतिमान गढे हैं। हमने एक ऐसी दोमुंही भाषा गढी है जो सुनने में अच्छी नहीं लगती पर बोलने में अच्छी लगती है। कम से कम खास खास वक्त पर तो जरुर अच्छी लगती है। जब मर्दानगी दिखानी हो तो बडी कारगर भी लगती है। आज के वक्त में, या आज के पहले के वक्त में, जब यह जेन जी बडी हो रही थी, समाज का बडा तबका, दबंग तबका, अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए बेलौस यही दोगली-दोमुंही भाषा बोलता था और आज भी बोलता है। यह भाषा दबंगों, खासकर ‘मर्दों’ की आम भाषा है जिसे तथाकथित ‘सभ्य समाज’ छुपकर या खुलकर कुछ खास अवसरों पर इस्तेमाल कर लेता है।
अब यह जेन जी आगे आकर भाषा के इस दोगलेपन को नकार रही है। खासकर लडकियां भाषा के इस लैंगिक और सामाजिक विभाजन को बलात नकार रही हैं। पिछली लंंबे समय से क्रमशः परवान चढ रहे नारीवाद और लोकतांत्रिक चेतना ने इस पीढी को सिखला दिया है कि स्त्री के लिए गढा गया यह सामाजिक दोयम दर्जा, समाज के बडे तबके के पास का कम पैसा या शिक्षा के कम अवसर सामाजिक षड्यंत्र या विडंबना हैं, ये ‘कमतरी के सबूत’ या ‘चढ दौडने के बहाने’ नहीं हो सकते…और यह भी कि यह भाषा अगर दबंगों की भाषा है तो यह पीढी उन दबंगों की आंखों में आंखें डालकर उनसे इसी भाषा में बात करने के अपने हौसले को खुलकर बता रही है।
तो, जेन जी की भाषा पर तोहमत धरने की बजाय यह सोचें कि कैसा दोगला समाज हमने गढा है जो इतनी भदेस भाषा और इतने दोहरे स्टैंडर्ड लेकर चल रहा है। जेन जी आपको आईना दिखा रही है। इस आईने में अपनी छवि यदि भयावह और घिनौनी दिख रही है तो भागे नहीं न आईने को बुरा भला कहें। जब आईने में अपनी छवि अच्छी नहीं दिखे तो आईना नहीं तोडा करते, अपने आप को सुधार लिया करते है।
#अपने_आप_को_सुधारें।
सुप्रसिद्ध दार्शनिक एवं पूर्व कुलपति प्रोफेसर नीलिमा सिन्हा जी के फेसबुक वॉल से साभार।
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