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BNMU शिक्षक विरोधी है बीएनएमयू प्रशासन : सीनेटर

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*शिक्षक विरोधी है बीएनएमयू प्रशासन : सीनेटर*

बीएनएमयू, मधेपुरा के सीनेटर डॉ. सुधांशु शेखर ने वर्तमान बीएनएमयू प्रशासन पर शिक्षक-विरोधी होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्वविद्यालय प्रशासन पूरी तरह संवेदनहीन है और इसके द्वारा लगातार नियम-कानून एवं परंपराओं की अनदेखी कर मनमाने ढंग से शिक्षक- विरोधी कार्य किया जा रहा है, जिसकी सूची लंबी है। इसमें दर्जनों शिक्षकों का दंडात्मक स्थानांतरण एवं नव-स्थापित राजकीय डिग्री महाविद्यालयों में शिक्षकों का मनमाना प्रतिनियोजन के बाद स्नातक महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों को शोध- निदेशक बनने से वंचित करना शामिल है।

उन्होंने कहा है कि वर्तमान कुलपति के कार्यालय में विभिन्न तिथियों में प्रशासनिक एवं शैक्षणिक मामले का हवाला देते हुए दर्जनों शिक्षकों का दंडात्मक स्थानांतरण किया गया है। इस क्रम में विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग सहित प्रमुख महाविद्यालयों में कार्यरत वरीय शिक्षकों को भी सुदूरवर्ती महाविद्यालयों में भेज दिया गया है। इससे संबंधित शिक्षकों को काफी असुविधा हो रही है और पठन-पाठन पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने नव-स्थापित राजकीय डिग्री महाविद्यालयों में प्रधानाचार्य, अर्थपाल एवं शिक्षकों का प्रतिनियोजन करते समय भी शिक्षकों की सुविधाओं का ख्याल नहीं रखा। विश्वविद्यालय द्वारा संबंधितों शिक्षकों से विकल्प नहीं लिया गया और अधिकांश शिक्षकों को नव-स्थापित राजकीय डिग्री महाविद्यालयों में भेजकर प्रताड़ित करने का प्रयास किया गया है।

डॉ. शेखर ने बताया कि मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष को डीएसडब्ल्यू जैसे महत्वपूर्ण पद को छोड़कर पचास किलोमीटर दूर के डिग्री महाविद्यालय में और वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष को लगभग सौ किलोमीटर दूर अवस्थित डिग्री महाविद्यालय का अतिरिक्त प्रभार लेने को मजबूर किया गया है।एलएनएमएस कॉलेज, वीरपुर में हिंदी विषय के तीनों शिक्षकों को डिग्री महाविद्यालयों में प्रतिनियोजित कर दिया गया। इनमें से एक सीनेटर एवं अर्थपाल तथा दूसरे महाविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष हैं। विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर इकाई से निर्विरोध निर्वाचित एक सीनेटर और स्नातकोत्तर महाविद्यालय में कार्यरत एक सीनेटर को भी डिग्री महाविद्यालय प्रतिनियोजित कर दिया गया है।

डॉ. शेखर का कहना है कि विश्वविद्यालय द्वारा स्नातक स्तरीय महिविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों को शोध- निदेशक बनने से रोकना भी शिक्षकों को प्रताड़ित करने का एक ताजा मामला है।इस संबंध में उल्लेखनीय है कि राज्यपाल सह कुलाधिपति के आदेश से लागू पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 में विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों तथा स्नातक महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों में कोई भेदभाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद बीएनएमयू के कुलसचिव राज्यपाल के आदेश की अवहेलना करते हुए स्नातक महाविद्यालयों के शिक्षकों को दोयम दर्जे का मानते हुए उन्हें शोध-निदेशक बनने से वंचित करने का प्रयास कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट है कि वर्तमान विश्वविद्यालय प्रशासन पूरी तरह शिक्षक-विरोधी है और इसे शिक्षकों को परेशान एवं प्रताड़ित करने में मजा आता है।

डॉ. शेखर ने बताया कि विश्वविद्यालय के कुलपति (सेवानिवृत्त शिक्षक) एवं कुलसचिव (तीन महिनों में सेवानिवृत्त होने वाले) दोनों वरिष्ठतम शिक्षक हैं, जो पास चार दशकों से अधिक समय से शिक्षण पेशे से जुड़े हैं। फिर भी इनके द्वारा अपने कनीय सहयोगियों के प्रति दुर्भावना एवं दुष्टता पालना और लगातार शिक्षक-विरोधी निर्णय लिया जाना हृदयविदारक है। ऐसे लोगों को शिक्षक-समाज से बहिष्कृत करने की जरूरत है।

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