नामवर जी को नमन…
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सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह जी को उनकी सौवीं जयंती पर सादर नमन। आज आपके जन्मदिवस के बहाने कुछ बातें-
यूँ तो मैं दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी हूँ, लेकिन मुझे बचपन से ही साहित्य में भी थोड़ी-बहुत रूचि है। जब मैंने पढ़ना-लिखना शुरू किया, तभी से मेरे मामाजी श्री अग्निदेव सिंह जी मेरे लिए भागलपुर से पत्र-पत्रिकाएं लाते थे। इनमें विशेष रूप से समाचार पत्र ‘हिंदुस्तान’ और राजनीतिक पत्रिका ‘माया’ के साथ साहित्यिक पत्रिका ‘कादम्बिनी’ शामिल होती थीं। बाद में ही मुझे समाचार पत्रिकाएं ‘इंडिया टुडे’ एवं ‘आउटलुक’ और साहित्यिक पत्रिकाएं ‘कादम्बिनी’, ‘हंस’, ‘वागर्थ’, “आलोचना’, ‘तदभव’, ‘तदभव’, ‘वर्तमान साहित्य’, ”आजकल’, ‘साहित्य अमृत’ आदि पत्रिका भी काफी पसंद आने लगी।
मैंने भागलपुर में कुछ वर्षों तक ‘कादम्बिनी क्लब’ का संचालन भी किया था, जिसमें पत्रिका के वार्षिक ग्राहक सदस्य होते थे। मैंने कई अन्य पत्रिकाओं की भी वार्षिक सदस्यता ली थी। मेरे मित्र डॉ. अश्विनी कुमार ने कुछ दिनों ‘वागर्थ’ में कार्य करने के दौरान मुझे नियमित रुप से यह पत्रिका उपलब्ध कराई थी। कई बार मेरे पास अन्य नई पत्रिकाओं को खरीदने के पैसे नहीं होते थे, तो मैं आधे से भी कम कीमत पर एक माह पुरानी पत्रिका खरीदता था।
मैं ‘कादम्बिनी’ के कार्यकारी संपादक श्री विष्णु नागर जी, ‘वागर्थ’ के संपादक श्री विजय बहादुर सिंह जी, ‘हंस’ के संपादक श्री राजेन्द्र यादव जी तथा ‘आलोचना’ के संपादक प्रो. नामवर सिंह जी से प्रेरित-प्रभावित रहा हूँ।
श्री विष्णु नागर जी ने ‘कादम्बिनी’ में मेरी एक कविता ‘जीवन” प्रकाशित की थी। इस कविता को पढ़कर गोवा सेंट्रल जेल से कैदी श्री संजय यादव ने मुझे पत्र भेजा था और फिर उनसे कई वर्षों तक मेरी पत्र-मित्रता रही। मैंने श्री विष्णु नागर जी से नई दिल्ली में सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री अनिल चमड़िया जी के साथ एक कार्यक्रम में मुलाकात की थीं।
मुझे राजेंद्र यादव जी से कभी प्रत्यक्षत: मिलने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है। लेकिन मैंने भागलपुर में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अमरेन्द्र, श्री रंजन कुमार, श्री शिवकुमार शिव एवं मित्र ओम सुधा के माध्यम से आपके किस्से भी बहुत सुने हैं। इसके साथ ही गत वर्ष दिल्ली प्रवास के दौरान मैंने अपने सहकर्मी मित्र डॉ. पंकज शर्मा जी के साथ ‘हंस’ कार्यालय जाकर ‘यादवजी’ को श्रद्धांजलि दिया।
मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे भागलपुर में एक कार्यक्रम के दौरान श्री विजय बहादुर सिंह जी से मिलने का सौभाग्य मिला है और मैंने कई बार आपसे फोन पर भी बातचीत की है। मैंने आपके संपादकीय में शामिल एक कविता को अपनी पुस्तक ‘गाँधी-विमर्श’ में उद्धृत भी किया है।
मुझे एक बार नई दिल्ली के पुस्तक मेले में नामवर सिंह से मिलने का अवसर मिला था। मेरा यह भी सौभाग्य है कि मुझे आपके मार्गदर्शन में पीएचडी करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. श्रीभगवान सिंह जी (भागलपुर) का स्नेह-सानिध्य प्राप्त है।
मेरा श्री कमलेश्वर जी सहित कई अन्य साहित्यकारों से भी पत्राचार रहा है और मैं श्री श्रीमती रमणिका गुप्ता, श्री केदारनाथ सिंह, प्रो. चौथीराम यादव, श्रीमती उषा किरण खान, डॉ. अरूण कमल, श्री आलोक धन्वा, प्रो. रमाशंकर आर्य, एच. एल. दुसाध, प्रो. दिनेश कुमार, जयप्रकाश कर्दम, प्रो. बद्रीनारायण आदि कुछ प्रमुख साहित्यकारों से मिला भी हूँ। लेकिन आज इन सबों की विस्तृत चर्चा नहीं की जा रही है।
आज बस इतना ही कहना है कि मैं प्रो. नामवर सिंह सहित अपने समय के सभी लेखकों (चाहे उनकी विचारधारा कुछ भी रही हो) का व्यक्तिगत रूप से सम्मान करता हूँ। मैं अपने युवा साहित्यकार मित्रों से कहना चाहता हूँ कि वे अपनी-अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहें, लेकिन वैचारिक छुआछूत से दूर रहकर अपने समय के सभी वरिष्ठ लेखकों को पढ़ें-समझें तथा यथासंभव उनके संपर्क-सानिध्य में रहने का प्रयास करें।
बहुत-बहुत धन्यवाद।














