रहिमन ओछे नरन सो…
मैंने 05 अप्रैल, 2026 को अपने फेसबुक वॉल पर महान कवि रहिम की दो पंक्तियां लिखी थीं- “रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न प्रीत। काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥”
(अर्थात् “ओछे स्वभाव वाले लोगों से न तो दुश्मनी अच्छी और न दोस्ती; जैसे कुत्ता चाहे काटे या चाटे, दोनों ही स्थितियों में नुकसान ही होता है।”)
इस पोस्ट के एक-दो दिन बाद ही विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के पास एक बुढ़े कुत्ते ने पीछे से मेरा कुर्ता पकड़ लिया और जब मैंने उसे छुड़ाने की कोशिश की, तो उसका ‘दो दांत’ मेरे बाएं पैर में गड़ गया। उस समय न खून बहा था और न ही किसी प्रकार का कोई दर्द हुआ, तो मैंने इसे ‘सिरिअसली’ नहीं लिया।
लेकिन आज लगभग सौ दिनों बाद पैर में हल्का दर्द महसूस हुआ। ऐसे में मैंने पटना फोन कर आपने ‘फेमिली डाक्टर’ से सलाह ली। डाक्टर साहेब ने कहा है कि जल्दी क्लिनिक आकर दिखा लीजिए और ‘कुत्ते के इलाके’ में जाने से परहेज़ कीजिए। उनका यह भी कहना है कि उनकी सूई-दवाई से तत्काल थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन ‘घाव’ पूरी तरह ठीक होने में अभी लगभग दो सौ दिन और लग सकता है।लेकिन आज लगभग सौ दिनों बाद पैर में हल्का दर्द महसूस हुआ। ऐसे में मैंने पटना फोन कर आपने ‘फेमिली डाक्टर’ से सलाह ली। डाक्टर साहेब ने कहा है कि जल्दी क्लिनिक आकर दिखा लीजिए और आगे ‘कुत्ते’ से सावधान रहिए। उनका यह भी कहना है कि उनकी सूई-दवाई से तत्काल थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन ‘घाव’ पूरी तरह ठीक होने में अभी लगभग दो सौ दिन और लग सकता है।
बहरहाल, मुझे इस बात का अफसोस है कि मैं ‘विश्वविद्यालय गेट’ (जो श्वान जी का मुख्य इलाका है), वहां गया ही क्यों? “रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग। करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग।” (अर्थ : जिनकी प्रवृत्ति उजली एवं पवित्र है, उनकी संगत नीच से न हो तो अच्छा ही है। नीच एवं दुष्ट लोगों की संगत से कोई न कोई कलंक लगता ही है।”
(नोट : पोस्ट में जिस श्वान जी का फोटो है, वह इंटरनेट से लिया गया है। इन्होंने मेरा कुछ भी नहीं बिगड़ा है। इसलिए मैं अपने शुभचिंतकों से अनुरोध करता हूं कि इन्हें कोई नुक्सान नहीं पहुंचाया जाए।)












