योग के अष्टांग : एक विमर्श
भूमिका : योग दर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को चित्रवृतियों का निरोध कहा है। “योगश्चित्रवृत्तिनिरोधः।” योगसूत्र-1/2
योग के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, धारण प्रत्याहार धारणा, ध्यान और समाधि। “यमनियमासनप्रणायाम- प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोअष्टांङ्गानि।” योगसूत्र-2/29
लाभ : इन आठ अंगों का अनुष्ठान करने से चित्र सर्वथा शुद्ध हो जाता है और मा विवेकख्याति की प्राप्ति होती है। “योगाङ्कननुष्ठा -नाद शुद्धिक्षये जानन्दीप्रिरा विवेकख्याते।” योगसूत्र- 2/28
साधन के रूप में वर्गिकरण- बहिरंग साधन : यम, नियम, आसन, प्रणायाम एवं प्रत्याहार।
अंतरंग साधन : धारणा, ध्यान एवं समाधि।
अनुशासन की दृष्टि से वर्गीकरण- नैतिक अनुशासन : यम एवं नियम।
शारीरिक अनुशासन : आसन, प्राणायाम एवं प्रत्याहार।
मानसिक अनुशासन : धारणा ध्यान एवं समाधि।
यम’ और ‘नियम’ वस्तुतः शील और तपस्या के द्योतक हैं।
‘यम’ का अर्थ है- संयम, जो पांच प्रकार का माना जाता है –
अहिंसा, सत्य, अस्तेय,
ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह। अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरग्रहाः यमा। योगसूत्र-2/34
पांच यम (सामाजिक नैतिकता) हैं-
i. अहिंसा : मन, वचन एवं कर्म से किसी को अकारण हानि नहीं पहुँचाना अहिंसा है। अहिंसा से प्रतिष्ठित हो जाने पर उस योगी पास वैरभाव छूट जाता है। “अहिंसाप्रतिष्ठायांतत्सन्निधौ वैरत्याग:।” योगसूत्र-2/35॥
ii. सत्य : विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, जैसा विचार मन में है वैसा ही प्रामाणिक बातें वाणी से बोलना। “सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफ़लाश्रययत्वम्॥ “योगसूत्र- 2/36 ॥
सत्य से प्रतिष्ठित (वितर्क शून्यता स्थिर) हो जाने पर उस साधक में क्रियाओं और उनके फलों की आश्रयता आ जाती है । जब साधक सत्य की साधना में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसके किए गए कर्म उत्तम फल देने वाले होते हैं और इस सत्य आचरण का प्रभाव अन्य प्राणियों पर कल्याणकारी होता है।
iii. अस्तेय : अस्तेय अर्थात् चोर-प्रवृति का न होना है। अस्तेय के प्रतिष्ठित हो जाने पर सभी रत्नों की उपस्थति हो जाती है। “अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्।” योगसूत्र -2/37 ।।
iv. ब्रह्मचर्य : ब्रह्मचर्य के दो अर्थ हैं- चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना सभी इन्द्रिय जनित सुखों में संयम बरतना। ब्रह्मचर्य के प्रतिष्ठित हो जाने पर वीर्य(सामर्थ्य) का लाभ होता है।”ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभ:।” योगसूत्र -2/ 38 ।।
v. अपरिग्रह : अपरिग्रह का अर्थ आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना है। अपरिग्रह स्थिर होने पर (भूत, वर्तमान और भविष्य के ) जन्मों तथा उनके प्रकार का संज्ञान होता है। “अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोध:।”योगसूत्र-2/ 39।।
नियम के भी पांच प्रकार के होते हैं- शौच, संतोष, तपस, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान। “शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा:।” योगसूत्र-2/32
पाँच नियम (व्यक्तिगत नैतिकता) हैं-
i. शौच – शरीर और मन की शुद्धि
ii. संतोष – संतुष्ट और प्रसन्न रहना
iii. तप – स्वयं से अनुशाषित रहना
iv. स्वाध्याय – आत्मचिंतन करना
v. ईश्वर-प्रणिधान – ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए।
आसन : निश्चल सुखपूर्वक बैठना आसन है। “स्थिर सुखमासनम्!” योगसूत्र-2/46.
पतंजलि के अनुसार स्थिर सुखपूर्वक बैठने के बाद शरीर सम्बंधी सभी चेष्टाओं का त्याग करने अर्थात् प्रयत्न की शिथिलता और में मन लगाने से आसन परमात्मा की सिद्धी होती है। आसनों के सिद्ध हो जाने से शरीर पर सर्दी गर्मी आदि द्वंदों का प्रभाव नहीं पड़ता है।
“ततो द्वंदानभिघात:।” योगसूत्र-2/48
प्राणायाम : आसन की सिद्धी के श्वास प्रश्वास की गति का नियंत्रण प्राणायाम है। “तस्मिन कति स्वासप्रश्वासयोगविकिप प्राणायाम:।” योगसूत्र-2/49
पतंजलि ने 4 प्रकार के प्राणायाम बताये हैं-
i. बाह्यवृति ( रेचक) : श्वास को बाहर रोकना ।
ii. अभ्यन्तरवृति (पूरक) : श्वास को भीतर रोकना।
iii. स्तम्भवृत्ति या कुम्गक : शरीर के भीतर जाने वाली और बाहर निकलने वाली जो प्राणों की स्वभाविक गति है उसे प्रयत्नपूर्वक रोकना ।
iv. चतुर्थ या केवल कुम्भक : शरीर के भीतर जाने वाली और बाहर निकलने वाली जो प्राणों की स्वभाविक गति है, उसका अपने आप नियंत्रित हो जाना। यह पहले बताये प्रणायामों से भिन्न है क्योंकि पतंजलि ने इसे चतुर्थ कहा है। बाहाम्यंतर विषयाक्षेपी चतुर्थः। योगसूत्र-2/51 लेकिन कुछ लोग इसे स्वतंत्र नहीं मानते है, वरन् कुम्भक के अन्तर्गत ही रखते है।
प्राणायाम के लाभ : प्राणायाम के अभ्यास से अज्ञान का आवरण क्षीण हो जाता है। अर्थात् क्लेश और कर्म संस्कार अविद्या क्षीण हो जाते हैं और साधक का ज्ञान सूर्य की भांति प्रकाशित जाता है।
“ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।” योगसूत्र-2/52)
मन में धारणा की योग्यता आ जाती है। अर्थात् मन को किसी भी जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है, “धारणासु च योग्यता मनस:।” योगसूत्र- 2/53
प्रत्याहार : अपने विषयों के सम्बंध से रहित होने पर इंद्रियों का चित्र के स्वरूप में तदाकार-सा हो जाना प्रत्याहार कहलाता है।
“प्रत्याहार स्वविषया सम्प्रयोग चित्र स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणी प्रत्याहारः।” योगगसूत्र-2/154
प्रणायाम के अभ्यास से मन एवं इंद्रियाँ शुद्ध हो जाती है। उसके बाद प्रत्याहार में इंद्रियों की बाह्यवृत्तियों को सब ओर से खींचकर मल उन्हें मन के वश में करने का अभ्यास किया जाता है। साधनाकाल में जब साधक इंद्रियों के विषयों का त्याग करके चित्त को अपने ध्येय में लगाता है, उस समय यदि इंद्रियों विषयों की ओर न जाकर चित्र में विलीन हो जाये तो यह प्रत्याहार सिद्ध होने की पहचान है।
लाभ – प्रत्याहार की सिद्धी के बाद इंद्रियाँ अपने वंश में आ जाती है। “तत परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्।” योगसूत्र-2/55)
धारणा – बाहर या शरीर के भीतर कहीं भी एक देश में चित्र को ठहराना धारणा है। “देशबंधश्चितस्य धारणा।” 3/1.
नाभि चक्र हृदय कमल आदि शरीर के भीतरी देश हैं और आकाश श्री चंद्रमा मूर्ति में इत्यादि बाहर के देश हैं आसान शरीर को नियंत्रित करता है एवं स्थिर रखता है प्राणायाम से स्वास्थ्य का नियंत्रण होता है प्रतिहार से इंद्रियों और धारणा से चित्त का नियंत्रण होता है। यहां किसी स्थान विशेष में चित्र को बांधने का काम उसे क्रम में होने वाली बढ़ाओ को केवल हटाना नहीं है और ना ही वह स्पष्ट रूप से विषय से संबंध होना है वरन् उसे विशेष को स्पष्ट रूप में ग्रहण करना है।
ध्यान : जहाँ चित्त लगाया जाय उसी में वृति का एकतारा-सा चलना ध्यान है। “तत्र प्रत्येकतानता ध्यानम्।” योगसूत्र-3 /2
यहां जिस दिए विश्व वस्तु में चित्र को लगाया जाता है वह उसी में एकाग्र हो जाता है अर्थात् केवल दिए मात्रा की एक ही तरह की वृद्धि का प्रवाह चलता है और उसके बीच में कोई दूसरी वृद्धि नहीं उठाती है इस तरह ध्यान प्रत्यय की एकता माता है अर्थात उसमें दिए वस्तु का ज्ञान लगातार अविच्छिण रूप से होता है। वाचस्पति मिश्र के अनुसार एकतांता का अर्थ चित्र की एकाग्रता है। इसे समझने के लिए तैल्यधारा के सदस्य प्रवाह की उपमा दी जाती है अर्थात तैल्यधारा की तरह वृक्तियों का अविच्छिन्न प्रवाह ध्यान है। यहां चित्त के विचलन को जब पूरी तरह नियंत्रित कर लिया जाता है, तो एकतानता वाली अबाधित सम्यक् विषय वृत्ति प्रवाहित होती है।
समाधि : जब ध्यान में केवल ध्येयमात्र की ही प्रतीती होती है और चित्त का नितज स्वरूप शुन्य-सा हो आता है, तब वही स्थान ही समाधि है। “तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:।” -योगसूत्र 3/3.
ध्यान की अवसवथा में ध्याता, ध्येय और ध्यान की ‘त्रिपुरी’ बनी रहती है लेकिन समाधि की स्थिति में ध्यान और ध्याता दोनों ध्येय रूप में स्थित हो जाता है। जैसे जल में खुला हुआ कमल विद्यमान बहता हुआ भी ध्ययरूप ही भाता है। वैसे ही समाधि काल में ध्यान निम्गन रहता हुआभी ध्येय रूप ही भासता है।
योग समाधि के द्वारा कैवल्य की प्राप्ति होती है। इसलिए व्यास ने योग को समाधि कहा है।
समाधि के द्वारा पुरुष पुनः नित्यपद को प्राप्त कर लेता है। बह देश-काल से सम्बंधित सोपाधि को तथा परिवर्तनशील जीवन से ऊपर उठकर एक सरल, नित्य एवं पूर्ण जीवन प्राप्त करता है।
निष्कर्ष : वर्तमान समय में प्राय आसन, प्राणायाम अथवा ध्यान को ही योग मान लिया गया है। लेकिन ये तीनों योग के एक-एक अंग मात्र हैं। महर्षि पतंजलि ने योग के अष्टांगिक अंगों को एक विशेष क्रम में रखा है। इस क्रमबद्धता का पालन करने पर
ही योग के लाभों को प्राप्त किया जा सकता है।