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मैं एक समय हूँ : यात्रा-१

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मैं एक समय हूँ : यात्रा-१

वर्ष 2001 में राजकीय मध्य विद्यालय कर्णपुरा से सातवीं कक्षा पास करने के बाद हम और हमारे द्वितीय गुरु भ्राता श्री Bhardwaj Shukla जी का आगे के अध्ययन के लिए राजकीय कृत उच्च विद्यालय, रमुना में हमारा दाख़िला हुआ।

 

तब तक हमारी परिचय मात्र गाँव के शिवाजी प्रभात शाखा के बाल स्वयंसेवक के रूप में थी। मुख्य शिक्षक पुलस्त्य चाचा जी थे और विस्तारक सुमन्त सिन्हा जी हमलोगों में देशप्रेम की भावना को एक दिशा प्रदान करना आरम्भ कर चुके थे।

वर्ष 2003 की बात है, हम दोनों भाई आठवीं पास कर नवीं कक्षा में गए।

 

हम सभी श्री ग्रीन सर के class में थे ,जो इंग्लिश पढ़ा रहे थे ।अचानक चार युवक बीच कक्षा में प्रवेश कर भाषण देने लगे, मेरा मन वो भाषण और शाखा में दिए जाने वाला ज्ञान के बीच संतुलन महसूस करने लगा था।बस एक बात की दोनों में अंतर था शाखा में शांतिप्रिय उच्चारण सुना था ,जबकि यहाँ मुकेश कुमार “विद्यार्थी” नामक युवक ने अपनी ओजपुर्ण क्रांतिकारी अभिव्यक्ति से मानो देश की आज़ादी की समरांगण में हमें ला खड़ा कर दिया था। मुकेश विद्यार्थी ने कहा कि आप युवा भारत को विश्वगुरु बना सकते हो। मुझे लगा ये शाखा वाला व्यक्ति ही है ,मगर काम का बंदा है ।अपने काम का है और विद्रोही है ,मतलब अपने जैसा है।इस वक्त युवकों ने परिचय दिया मैं मुकेश विद्यार्थी और मेरे साथ आप सत्यप्रकाश जी है और आप नीरज पाठक जी,आप उपेन्द्र अश्क़ जी आप………..!

 

उन लोगों ने भैया (क्लास मॉनिटर) को स्कूल में सदस्यता की ज़िम्मेवारी दिए और दो सदस्यता पैड भी साथ में।

सदस्यता शुल्क मात्र एक ₹ था उस वक्त।

भैया ने मुझे सदस्य बना दिया और एक दिन में स्कूल में हम पचास Abvp के मेम्बर हो गए।फिर भी मेरा मन शाखा में ही ठीक से लगता था।एक दिन शुक्रवार को मुकेश विद्यार्थी आते है और भैया को बोलते है – नगर उंटारी अभ्यास वर्ग में चलना है।कुछ विद्यार्थियों को तैयार कीजिए।पहली बार दो दिनके लिए घर से बाहर जाना था ,सोचो वो भी अपरिचितों के बीच…….!

 

भैया का आदेश मिला तो न चाह कर ABVP के अभ्यास वर्ग में जाना पड़ा साथ में भैया,हम ,और कंचन रवि ।

वहाँ अमित तिवारी नामक GLA college का एक सीनियर छात्र को परिषद गीत के लिए आमंत्रित किया गया।रात हम सब साथ खूब बात किए मानो कल महाभारत की युद्ध के लिए हम सभी जुटे थे। सुबह परिचय हुआ गजेंद्र भैया से,पप्पू भैया यानी ओम प्रकाश पप्पू ,प्रिन्स धीरज आदि -आदि से। अंत में व्यवस्था प्रमुख विकाश स्वदेशी ने गाँधी जी सहित कुछ लोगों का परिचय करवाया।

2004 में भैया प्रथम श्रेणी और मैं द्वितीय श्रेणी से मैट्रिक पास कर हम दोनों भाई श्री सद्गुरु जगजीत सिंह नामधारी कॉलेज, गढ़वामें आ गए। अब भैया विज्ञान संकाय का छात्र बने हम कला के। पहली बार जीवन में हम दोनों भाई अलग हुए थे।मानो अब तो मैं बेसहारा सा हो गया ,एक college हम दोनों मगर सिर्फ़ आना-जाना साथ बाक़ी दोनों पुरे दिन दूर ।वो अपने class हम अपने।NCC /NSS में भैया ने मेरी मन उसके बिना भी लगे इस लिए रवि सिंह से बोलकर भर्ती करवाया दिया,ताकि हम व्यस्त हो सके। पहले से स्काउट एवं गाइड में थे ही।

 

2004 में college इकाई का गठन हुआ।अब रफ़्तार बदलने वाला था यारों।मुझे college सह मंत्री बनाया गया और भैया का पुनः वापसी संघ शाखा में हो गया, वो नगर उंटारी विद्या मंदिर में प्राथमिक वर्ग शामिल हुए।

 

मुझे Abvp में जोड़ने वाला अब संघ में और संघ वाला ABVP में आ रहा था। इसी बीच गढ़वा में जिला प्रचारक जैनेंद्र जी का पावन सानिध्य मिला, विभाग प्रचारक श्री अनिल जी ने नरेंद्र कोहली के लिखित “तोड़ो कारा तोड़ो”कि 2 प्रति मेरे लिए उपलब्ध कराएं,जिसे पढ़कर मैंने स्वामी विवेकानंद को अपने जीवन में अपनाया।

वर्ष 2005गिरीडीह प्रांत अधिवेशन में जाने का अपनी लॉट्ररी लगी था।उन दिनों अधिवेशन जाना मतलब भगवान मिलना था।

 

क्योंकि सभी कार्यकर्ताओं में कुछ का चयन होता था अधिवेशन जाने के लिए।गिरीडीह गए वहाँ एक अधिकारी से मिला काली दाढ़ी ,उम्दा व्यक्तित्व ,ज्ञान का भंडार मानो शिक्षक फेल ।जब परिचय हुआ तो मालूम हुआ कि आप माननीय के.एन. रघुनन्दन जी है,Abvp के महामंत्री ।जो आगे चलकर मेरे पूज्य आराध्य बन गए।

कैसी लगी कहानी……….??

जारी है मैं एक समय हूँ……

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बिहार-झारखंड के पूर्व क्षेत्रीय संगठन मंत्री डॉ. याज्ञवल्क्य शुक्ल जी के फेसबुक वॉल से साभार।

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