भारत बुक स्टोर’ की सुखद स्मृतियां
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जीवनव्रती आपाधापी में हम आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन अतीत की कुछ यादें हमेशा हमारे साथ रहती हैं। हम आज जहां हैं, उसमें हमारे अतीत का भी योगदान है। ऐसे में अतीत की सुखद स्मृतियों को वर्तमान के झरोखे से देखना मुझे काफी शकून देता है।
मेरा यह स्पष्ट रूप से मानना है कि आज मेरे खाते में जो चंद उपलब्धियां हैं, उसमें मेरे परिजनों-गुरुजनों, मित्रों-शत्रुओं सैकड़ों ज्ञात-अज्ञात लोगों का योगदान है। मैं उन सबों के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।
आज कुछ देर ‘भारत बुक स्टोर’, तारापुर (मुंगेर) में और पुरानी सुखद स्मृतियों को ताजा किया और बड़े भाई पप्पू कुमार सिंह से मिलकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त किया और मित्र गोपाल कुमार सिंह (जो आज तारापुर से बाहर थे) से फोन पर बात कर आपस में सुख-दुख बांटा।

मालूम हो कि तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के प्रतिष्ठित टी. एन. बी. कॉलेज, भागलपुर में दाखिले के पूर्व मैं कुछ दिनों तक अपने स्थानीय बाजार तारापुर (मुंगेर) में रहा हूँ। उस दौरान मेरा पता था-संजय लॉज, कुशवाहा कॉलोनी, तारापुर। यहाँ लॉज में ही रहने वाले गोपाल कुमार सिंह जी से मेरी काफी घनिष्ठता हो गई, जो ‘भारत बुक स्टोर’, तारापुर (मुंगेर) के प्रोपराइटर हैं।
गोपाल जी से घनिष्ठता के कारण मुझे उनके ‘भारत बुक स्टोर’ में दूसरे मालिक का दर्जा प्राप्त था, जहां मैं नियमित रूप से शाम में कुछ घंटे अवश्य समय देता था। मुझे दुकान के अंदर बैठकर कोई भी किताब या पत्र-पत्रिका पढ़ने, उसे घर ले जाकर पढ़ने एवं फिर वापस कर देने की स्वतंत्रता थी और आवश्यकतानुसार लागत मूल्य पर किताबें खरीदने या ऑर्डर देकर किताबें मंगबाने का विशेषाधिकार भी था। मैंने इस स्वतंत्रता एवं विशेषाधिकार का भरपूर इस्तेमाल किया और जमकर पढ़ाई की।

इस तरह गोपाल जी मेरे सबसे प्रमुख शौक पढ़ाई में मेरे स्वाभाविक सहयोगी थे, जबकि मेरी दूसरी लत ताश-खेल में वे मेरे चीर-प्रतिद्वंदी भी थे। वे अपनी दोस्ती निभाते हुए मुझसे किताबों की कोई ‘प्रोफिट’ नहीं लेते थे और मैं भी अपनी दुश्मनी की लाज रखते हुए उन्हें ताश-खेल में जीत का स्वाद कम ही चखने देता था।
(तस्वीरें मेरे छोटे भाई सिनेमेटोग्राफर रविरंजन शेखर उर्फ गुलशन सिंह ने अपने मोबाइल से ली हैं।)














