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डाॅ राजेंद्र प्रसाद : देशरत्न से भारतरत्न बनने की दास्तान 

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डाॅ राजेंद्र प्रसाद :  देशरत्न से भारतरत्न बनने की दास्तान 

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आजकल प्रो श्रीभगवान सिंह की पुस्तक ‘डाॅ राजेंद्र प्रसाद:देशरत्न से भारतरत्न बनने की दास्तान ‘ पढ रहा हूँ। भगवान जी तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं। लेखन का आरंभ कहानी और नाटक से किया।फिर आलोचन का देशी ठाठ निर्मित करने के क्रम में दर्जनभर पुस्तकें लिख गए। शोध किया डाॅ नामवर सिंह के निर्देशन में, पर उनकी साहित्य-दृष्टि के केन्द्र में तुलसीदास और महात्मा गाँधी हैं। गुरु की छद्मछाया से मुक्त यह खांटी भोजपुरिया अपनी जन्मभूमि सीवान से गहरे स्तरों पर जुड़ा है। रहना भले भागलपुर में होता है,पर मन सरयू तीरे बारम्बार लौटता है।’गांव मेरा देश ‘ में अपने गांव निखतीकलां का जीवंत चित्रण किया। कथेतर गद्य की यह नायाब कृति है।

 

भगवान जी निखतीकलां के और डाॅ राजेंद्र प्रसाद जीरादेई के। राजेंद्र बाबू को लोग भूलते जा रहे हैं। समय की बलिहारी कि संविधान सभा के अध्यक्ष ओझल कर दिए गए और प्रारूप समिति के अध्यक्ष संविधान निर्माता हो गए। वोट जो न करावे। प्रसन्नता और संतोष का विषय है कि भगवान जी डाॅ राजेंद्र प्रसाद के देशरत्न से भारतरत्न बनने की दास्तान को रीडिसकवर कर रहे हैं।

मेरे गृह जनपद बेगूसराय से राजेंद्र बाबू का कोई रिश्ता नहीं था। लेकिन यहाँ बिहार का पहला गंगा ब्रिज राजेंद्र पुल है।पार्श्व में राजेंद्र पुल स्टेशन है । यह उत्तर वाहिनी सिमरिया धाम का स्टेशन है। सिमरिया राष्ट्र कवि दिनकर का गांव भी है। भारत की आनंद के बाद दूसरी सबसे बड़ी डेयरी ‘ देशरत्न डाॅ राजेंद्र प्रसाद दुग्ध सहकारी समिति’बरौनी में है। नामकरण हाल में हुआ है। पहले बरौनी डेयरी कहलाती थी।इसके शिलान्यास हेतु राजेंद्र बाबू स्पेशल ट्रेन से बरौनी उतरे और जिस रास्ते से शिलान्यास स्थल गए उसे राजेंद्र पथ कहा जाता है।बेगूसराय के प्रवेशद्वार हरहर महादेव चौक पर राजेंद्र बाबू की आदमकद प्रतिमा है। इसके प्रतिष्ठापन में तत्कालीन जिलाधिकारी रामेश्वर सिंह की महती भूमिका थी।बरौनी की पार्श्ववर्ती उपनगरी गढहरा में राजेंद्र प्रसाद जयंती समारोह समिति है। इधर समिति में थोड़ी शिथिलता आयी है।

राजेंद्र बाबू जिस जाति के थे उसका वर्चस्व बेगूसराय जनपद में नही है। बिहार में तो जाति ही आदि-अंत है। बेगूसराय जनपद में राजेंद्र बाबू के प्रति श्रद्धा भाव मुझे आकर्षित करता रहा है, सो पुस्तक हाथ लगी तो पढने बैठ गया। दो तिहाई पढ चुका हूँ,पूरी पुस्तक पढने के बाद किसी पत्रिका के लिए विस्तृत समीक्षा लिखूँगा।

-प्रो. चंद्रभानु प्रसाद सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के फेसबुक वॉल से साभार।

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