[यह पोस्ट किसी के विरुद्ध नहीं है । विद्या क़सम !]
क्या विद्यार्थियों को अब शिक्षक की जरूरत नहीं रही?
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हितेन्द्र पटेल
आज शिक्षा की दुनिया में बहुत तेजी से एक ऐसा परिवर्तन हो रहा है जिसे केवल तकनीकी परिवर्तन कहकर समझा नहीं जा सकता। मोबाइल फोन, इंटरनेट और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनेक उपकरण विद्यार्थियों के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। किसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए अब उन्हें आवश्यक रूप से शिक्षक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। वे किसी कठिन अवधारणा को कुछ ही क्षणों में सरल भाषा में समझ सकते हैं, किसी पुस्तक का सारांश पा सकते हैं, किसी विषय पर सामग्री जुटा सकते हैं, अपने लिखे को सुधार सकते हैं और यहाँ तक कि पूरे उत्तर, निबंध या प्रस्तुति भी तैयार करवा सकते हैं। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या ऐसी स्थिति में शिक्षक की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो रही है। क्या विद्यार्थियों की प्राथमिक निर्भरता अब शिक्षक से हटकर यंत्रों और AI पर चली जाएगी? और यदि ऐसा हुआ तो शिक्षा की उस पूरी व्यवस्था का क्या होगा जिसका आधार इतने लंबे समय तक शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का संबंध रहा है?
इस प्रश्न पर विचार करने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि हम सीखते किससे हैं और कैसे सीखते हैं। हमारी शिक्षा विद्यालय में शुरू नहीं होती। उससे बहुत पहले वह हमारे परिवार और सामाजिक परिवेश में आरंभ हो चुकी होती है। बच्चा अपने माता-पिता, भाई-बहनों, रिश्तेदारों, पड़ोस, भाषा और घर की रोजमर्रा की आदतों से लगातार सीखता है। उसके भीतर शिक्षा के प्रति जो पहला भाव पैदा होता है, वह भी बहुत हद तक इसी परिवेश से बनता है। जिन घरों में किताब को महत्त्व दिया जाता है, जहाँ पढ़ने को जीवन की आवश्यक गतिविधि माना जाता है, जहाँ प्रश्न पूछने को प्रोत्साहित किया जाता है, वहाँ बच्चों के भीतर सीखने की प्रवृत्ति सहज रूप से विकसित होती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल शिक्षित परिवारों में ही शिक्षा का वातावरण बन सकता है। अनेक ऐसे परिवार रहे हैं जहाँ माता-पिता स्वयं बहुत अधिक नहीं पढ़ पाए, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षा की ओर बढ़ाने के लिए असाधारण प्रयास किए। वे स्वयं किताबों की दुनिया से बहुत परिचित न हों, फिर भी बच्चों से कहते हैं कि पढ़ाई आवश्यक है, शिक्षक का सम्मान करना चाहिए और किताब को महत्त्व देना चाहिए। शिक्षा के प्रति श्रद्धा का यह भाव कई बार उन परिवारों में भी बहुत गहरा दिखाई देता है जहाँ औपचारिक शिक्षा का इतिहास बहुत पुराना नहीं है।
हमारे समाज में ज्ञान के प्रति सम्मान विकसित करने के अपने छोटे-छोटे सांस्कृतिक संस्कार भी रहे हैं। किताब या कॉपी में पैर लग जाने पर उसे उठाकर माथे से लगाना, कलम को सम्मान की वस्तु समझना, सरस्वती की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर पढ़ाई करना—इन सबको केवल धार्मिक अनुष्ठान समझ लेना शायद पर्याप्त नहीं होगा। इनके भीतर बच्चे के मन में एक मूल्य स्थापित करने का प्रयास भी था कि ज्ञान सामान्य वस्तु नहीं है। पुस्तक, अक्षर और शिक्षा को सम्मान के साथ देखना चाहिए। श्रद्धा का यह भाव शिक्षा के प्रति एक विशेष प्रकार का संबंध तैयार करता था।
इसके बाद विद्यालय आता है और विद्यालय के साथ शिक्षक। मनुष्य के जीवन में शिक्षक की सबसे अद्भुत भूमिका शायद वहीं दिखाई देती है जहाँ वह एक छोटे बच्चे को पहली बार अक्षरों से परिचित कराता है। बच्चा अपने आसपास की दुनिया देख रहा होता है, लेकिन लिखे हुए शब्दों का अर्थ नहीं जानता। उसके सामने किताब पड़ी होती है, पर वह अभी केवल कागज और कुछ चिह्नों का समूह है। फिर शिक्षक उसका हाथ पकड़कर उसे अ, आ, क, ख सिखाता है। देखने में यह छोटी-सी घटना है, लेकिन जीवन की दृष्टि से इसका अर्थ अत्यंत बड़ा है।
जैसे ही बच्चा अक्षर पहचानना सीखता है, उसके सामने एक ऐसी दुनिया खुलनी शुरू हो जाती है जो उसके प्रत्यक्ष अनुभव से कहीं बड़ी है। अब पुस्तक केवल पुस्तक नहीं रहती। उसके भीतर इतिहास है, साहित्य है, विज्ञान है, कल्पना है, दूर के देश हैं, बहुत पुराने समय के मनुष्य हैं और आने वाले समय की संभावनाएँ हैं। वह उन लोगों से परिचित हो सकता है जो उसके जन्म से सैकड़ों वर्ष पहले जीवित थे। वह उन स्थानों की यात्रा कर सकता है जहाँ वह कभी गया नहीं। वह तारों, ग्रहों, युद्धों, सभ्यताओं, कविताओं और मनुष्य के अनुभवों के बारे में जान सकता है। अक्षर उसे उसके अपने जीवन से बाहर निकालकर समय और स्थान की बहुत बड़ी दुनिया में प्रवेश करा देते हैं।
इस अर्थ में शिक्षक बच्चे की उँगली पकड़कर उसे एक किताब के पास ले जाता है और किताब के भीतर एक समुद्र होता है। शिक्षक उस समुद्र को पैदा नहीं करता, लेकिन वह उसका पहला दरवाजा खोलता है। शायद इसी कारण जीवन के बहुत बाद तक लोग अपने प्राथमिक विद्यालय के उस शिक्षक को याद रखते हैं जिसने उन्हें पहली बार पढ़ना या लिखना सिखाया था। वह कोई महान विद्वान न रहा हो, उसने कोई प्रसिद्ध पुस्तक न लिखी हो, लेकिन किसी मनुष्य के जीवन में ज्ञान की दुनिया का पहला दरवाजा उसी ने खोला था। जीवन में शुरुआत का अपना एक अलग महत्त्व होता है।
इसके बाद शिक्षा की यात्रा लंबी होती जाती है और शिक्षक भी बदलते जाते हैं। प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक अलग होते हैं, माध्यमिक विद्यालय के अलग, कॉलेज और विश्वविद्यालय में दूसरे प्रकार के शिक्षक मिलते हैं। सभी शिक्षक समान रूप से अच्छे हों, ऐसा कभी नहीं रहा। शिक्षक भी मनुष्य है। उसके अपने पूर्वाग्रह होते हैं, उसकी सीमाएँ होती हैं, वह कभी किसी विद्यार्थी के प्रति अधिक उदार होता है और कभी किसी दूसरे के प्रति कम। हमें कई बार यह भी लग सकता है कि किसी शिक्षक ने हमारे साथ न्याय नहीं किया। किसी का स्वभाव कठोर होता है, कोई अपने विषय को ठीक से नहीं पढ़ा पाता, कोई विद्यार्थी को समझ नहीं पाता। फिर भी जब हम अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखते हैं तो अक्सर पाते हैं कि हमारी यात्रा में कुछ शिक्षक ऐसे थे जिनकी उपस्थिति हमारे विकास में निर्णायक रही।
किसी शिक्षक ने किसी विषय में रुचि पैदा कर दी, किसी ने पहली बार कोई ऐसी पुस्तक पढ़ने के लिए दे दी जिसने हमारी दुनिया बदल दी, किसी ने हमारी लिखी हुई चीज पर एक टिप्पणी कर दी जो बहुत बाद तक हमारे साथ रही। किसी ने हमारी क्षमता पहचानी जब हम स्वयं उसे नहीं पहचानते थे, किसी ने हमें आगे धकेला, किसी ने हमारी भूल पर रोका। इस अर्थ में शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं रहा। वह कई बार हमारे जीवन की यात्रा का सहयात्री भी बना।
समय के साथ औपचारिक शिक्षा पूरी हो जाती है। हम रोजगार में जाते हैं, अपने जीवन की जिम्मेदारियाँ सँभालते हैं, परिवार बनाते हैं। एक समय ऐसा भी आता है जब शिक्षक से हमारा नियमित संपर्क टूट जाता है। फिर हमारे बच्चे स्कूल जाते हैं और उनकी अपनी दुनिया में नए शिक्षक आते हैं। लेकिन शिक्षक हमारे जीवन से पूरी तरह चला नहीं जाता। वह स्मृति में रहता है। हम कभी भीतर झाँककर देखें तो अक्सर यह अनुभव होता है कि हम जहाँ पहुँचे हैं वहाँ अकेले नहीं पहुँचे। हमारे माता-पिता, परिवार, मित्रों और परिस्थितियों की तरह हमारे कुछ शिक्षकों ने भी हमें वहाँ तक पहुँचाने में भूमिका निभाई।
यहीं से शिक्षा की प्रकृति को थोड़ा गहराई से समझना आवश्यक हो जाता है। शिक्षा केवल सूचना का हस्तांतरण नहीं है। वह मनुष्य को एक प्रकार की शक्ति देती है, उसकी दुनिया को विस्तृत करती है, उसके अनुभव को व्यापक बनाती है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि अशिक्षित मनुष्य में बुद्धि या विवेक नहीं होता। अनुभव स्वयं बहुत बड़ा शिक्षक है और कई बार औपचारिक शिक्षा से बाहर के लोग जीवन की वास्तविकताओं को अधिक गहराई से समझते हैं। लेकिन शिक्षा मनुष्य के अनुभव की सीमाओं को तोड़ने का एक अतिरिक्त साधन देती है। वह उसे उन चीजों को जानने की क्षमता देती है जिन्हें उसने प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा। वह तुलना करना सीखता है, तर्क करना सीखता है, प्रश्न करना सीखता है और अपनी परिस्थिति को एक बड़ी दुनिया के भीतर देखने लगता है।
इसी कारण शिक्षा एक प्रकार का सशक्तीकरण भी है। वह केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं है। वह मनुष्य की दृष्टि बदल सकती है। वह उसकी अपनी स्थिति के प्रति चेतना पैदा कर सकती है, उसे अपनी सीमाओं से बाहर जाने का रास्ता दिखा सकती है और उसके भीतर एक ऐसी दुनिया बना सकती है जो उसके तत्काल अनुभव से कहीं बड़ी हो। शिक्षक की भूमिका इसी प्रक्रिया से जुड़ी हुई रही है।
यहीं आज AI का प्रश्न गंभीर हो जाता है। यदि शिक्षक का काम केवल यह बताना है कि कोई घटना किस वर्ष हुई, किसी शब्द का अर्थ क्या है, किसी सिद्धांत की परिभाषा क्या है या किसी प्रश्न का उत्तर क्या है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि मशीन यह काम बहुत तेजी से और कई बार अधिक कुशलता से कर सकती है। उसे थकान नहीं होती, वह दिन-रात उपलब्ध रहती है और विद्यार्थी एक ही प्रश्न उससे कई बार पूछ सकता है। इस अर्थ में ज्ञान के स्रोत के रूप में शिक्षक की पुरानी एकाधिकारपूर्ण स्थिति निश्चित रूप से बदल रही है।
लेकिन शिक्षा यदि केवल उत्तर प्राप्त करने का नाम नहीं है तो फिर स्थिति बहुत अलग हो जाती है।
AI मेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है, लेकिन वह मेरे साथ उसी अर्थ में जीवन नहीं जीता जिस अर्थ में एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों के साथ रहता है। शिक्षक विद्यार्थी को देखता है। कई बार वह उसके चेहरे से समझ लेता है कि बात समझ में नहीं आई। उसे पता होता है कि कौन-सा विद्यार्थी सामान्यतः चुप रहता है, कौन बहुत जल्दी उत्तर देता है, कौन अपने भीतर संकोच लेकर बैठा है, कौन कुछ दिनों से विचलित है। वह कभी प्रोत्साहित करता है, कभी रोकता है, कभी प्रश्न करता है, कभी केवल इतना कहता है कि फिर से प्रयास करो।
यही वह मानवीय संस्पर्श है जिसकी चर्चा शिक्षा के संबंध में आवश्यक है। संस्पर्श का अर्थ केवल शारीरिक उपस्थिति नहीं है। इसका अर्थ है एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से वास्तविक संबंध। विद्यार्थी को यह अनुभव होना कि सामने वाला व्यक्ति उसकी प्रगति को देख रहा है, उसकी कठिनाई को समझने की कोशिश कर रहा है, उसकी संभावना को पहचान रहा है और उसके विकास के प्रति किसी सीमा तक स्वयं को जिम्मेदार भी मानता है।
पुराने समय में इस संबंध के भीतर कठोरता भी बहुत अधिक थी। शिक्षक की डाँट और कई बार शारीरिक दंड को भी शिक्षा का हिस्सा मान लिया जाता था। आज शारीरिक दंड का समर्थन नहीं किया जा सकता और न उसकी कोई आवश्यकता है। लेकिन पुराने अनुभव में जो एक महत्त्वपूर्ण तत्व था उसे हमें अलग करके समझना चाहिए—वह था शिक्षक का विद्यार्थी के जीवन में गहरा संलग्न होना। वह उसे केवल कक्षा में उपस्थित एक संख्या की तरह नहीं देखता था। अच्छे शिक्षक की चिंता यह होती थी कि विद्यार्थी आगे बढ़े। आज इस भाव को कठोरता के बिना, सम्मान और संवेदनशीलता के साथ बनाए रखा जा सकता है।
मशीन के साथ हमारा संबंध स्वभावतः अलग है। मशीन हमारी सहायता करती है। मनुष्य के इतिहास में साधनों और मशीनों ने लगातार हमारी क्षमताएँ बढ़ाई हैं। हल, पहिया, छापाखाना, रेल, टेलीफोन, कंप्यूटर और इंटरनेट—हर नई तकनीक ने मानव जीवन को बदला है। AI भी इसी लंबी प्रक्रिया का एक अत्यंत शक्तिशाली नया चरण है। इसलिए उसका विरोध करना न व्यावहारिक है और न बुद्धिमानी। समस्या तकनीक के उपयोग में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब हम वह काम भी तकनीक को सौंप देते हैं जिसे करते हुए हमारे भीतर कोई क्षमता विकसित होती थी।
यदि किसी विद्यार्थी को किसी विषय पर दो पृष्ठ लिखने हों तो पहले उसे सोचना पड़ता था। उसे वाक्य बनाने पड़ते थे, शब्द खोजने पड़ते थे, अपने विचारों को क्रम देना पड़ता था। वह गलतियाँ करता था। कई बार लिखकर काट देता था। फिर से लिखता था। तर्क कमजोर लगता तो उसे बदलता था। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगता था और अंत में जो दो पृष्ठ तैयार होते थे वे बहुत अच्छे हों, यह भी आवश्यक नहीं था। लेकिन उन दो पृष्ठों को लिखते हुए विद्यार्थी के भीतर कुछ बन रहा था।
अब वही विद्यार्थी AI से कह सकता है कि इस विषय पर दो अच्छे पृष्ठ लिख दो। कुछ ही क्षण में उसके सामने उससे कहीं बेहतर भाषा में उत्तर आ सकता है। यही वह जगह है जहाँ एक बहुत गंभीर प्रश्न पैदा होता है। उत्तर बेहतर हो गया, लेकिन क्या विद्यार्थी भी बेहतर हुआ?
आने वाले समय की शिक्षा को इस प्रश्न का सामना करना ही होगा। सीखना केवल अंतिम उत्तर तक पहुँचने का नाम नहीं है। कई बार सीखना उस संघर्ष में होता है जो उत्तर तक पहुँचने के रास्ते में होता है। गणित के किसी प्रश्न को बार-बार हल करने की कोशिश, किसी कविता का अर्थ खोजने में लगने वाला समय, इतिहास की किसी घटना को अलग-अलग स्रोतों से समझने का प्रयास, स्वयं कोई अनुच्छेद लिखकर उसे सुधारना—ये सारी प्रक्रियाएँ मनुष्य के भीतर बौद्धिक क्षमता का निर्माण करती हैं।
यदि हर कठिनाई के पहले क्षण में कोई मशीन हमें अंतिम उत्तर उपलब्ध करा दे तो सुविधा निस्संदेह बहुत बढ़ेगी, लेकिन यह भी संभव है कि हमारी अपनी सीखने की क्षमता कमजोर होने लगे। इसीलिए AI का सबसे बड़ा खतरा केवल यह नहीं है कि वह कभी गलत उत्तर दे सकता है। उससे भी बड़ा खतरा यह हो सकता है कि वह हमें सही उत्तर इतनी आसानी से दे दे कि हम स्वयं उत्तर तक पहुँचने की क्षमता विकसित करना बंद कर दें।
यहीं शिक्षक की आवश्यकता एक नए अर्थ में सामने आती है।
मुझे यहाँ नीत्शे के उस प्रसिद्ध कथन की याद आती है जिसमें आधुनिक संसार के संदर्भ में उसने “ईश्वर की मृत्यु” की बात कही थी। उसका आशय केवल धार्मिक विश्वास के अंत से नहीं था। वह उस बड़े नैतिक और अर्थपूर्ण केंद्र के विघटन की ओर भी संकेत कर रहा था जिसके आधार पर मनुष्य लंबे समय तक अपने जीवन और संसार को समझता आया था। शिक्षक को ईश्वर के समान मानना न उचित है और न आवश्यक, लेकिन एक सीमित रूपक के रूप में इस बात का महत्त्व है। शिक्षा की दुनिया में शिक्षक लंबे समय तक एक केंद्र रहा है। वह अंतिम सत्य का स्वामी नहीं था, फिर भी ज्ञान की यात्रा को एक दिशा देने वाली उसकी एक उपस्थिति थी।
यदि वह केंद्र हटा दिया जाए तो उसकी जगह क्या आएगा? यदि उसकी जगह केवल यंत्र आता है तो हमारी शिक्षा का संबंध भी धीरे-धीरे यांत्रिक हो सकता है। शिक्षक से हमारा संबंध संवाद का संबंध था। मशीन से हमारा संबंध मुख्यतः उपयोग का संबंध है। मैं मशीन से वह लेता हूँ जिसकी मुझे आवश्यकता है। लेकिन शिक्षक कई बार मुझे वह भी देता है जिसकी आवश्यकता मुझे स्वयं मालूम नहीं थी।
एक अच्छा शिक्षक कई बार हमारे प्रश्न का उत्तर देने के बजाय हमारे प्रश्न को बदल देता है। वह कह सकता है कि तुम गलत दिशा में सोच रहे हो। वह कह सकता है कि पहले यह पुस्तक पढ़ो। वह किसी अत्यंत आत्मविश्वासी विद्यार्थी को उसकी सीमा दिखा सकता है और किसी संकोची विद्यार्थी को पहली बार यह विश्वास दिला सकता है कि वह बहुत आगे जा सकता है। मशीन हमारी माँग पर उत्तर प्रस्तुत करती है; शिक्षक कई बार हमारी माँग से आगे जाकर हमारे भीतर किसी ऐसी संभावना को पहचानता है जिससे हम स्वयं परिचित नहीं होते।
यही कारण है कि मुझे शिक्षक का भविष्य समाप्त होता हुआ नहीं दिखाई देता। लेकिन शिक्षक की पुरानी भूमिका निश्चित रूप से बदल रही है। जो शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक पढ़कर सुना देता है, नोट्स लिखवा देता है और विद्यार्थियों से वही उत्तर दोहराने की अपेक्षा करता है, उसकी उपयोगिता सचमुच कम होगी। इस प्रकार का शिक्षण AI के सामने बहुत कमजोर दिखाई देगा। लेकिन संभव है कि यह शिक्षा के लिए अंततः अच्छा ही सिद्ध हो। नई तकनीक शिक्षक को अपने वास्तविक काम की ओर लौटने के लिए बाध्य कर सकती है।
अब शिक्षक का महत्त्व इस बात से तय नहीं होगा कि उसे कितने तथ्य याद हैं। विद्यार्थी अपने फोन पर उससे कहीं अधिक तथ्य कुछ ही क्षणों में खोज सकता है। शिक्षक का महत्त्व इस बात से तय होगा कि वह विद्यार्थियों को सोचने के लिए कितना प्रेरित करता है, उनकी जिज्ञासा को कितना विकसित करता है, उन्हें प्राप्त सूचना की जाँच करना कितना सिखाता है और उनके भीतर स्वतंत्र निर्णय की क्षमता कितनी पैदा करता है। शिक्षक को सूचना का भंडार होने के बजाय धीरे-धीरे एक मार्गदर्शक, सहयात्री और आलोचनात्मक संवादकर्ता बनना होगा।
इसीलिए आने वाली शिक्षा को शिक्षक और AI के बीच युद्ध के रूप में देखना उचित नहीं होगा। दोनों के बीच एक नए प्रकार का संबंध बनाना होगा। AI एक अत्यंत शक्तिशाली सहायक हो सकता है। वह किसी कठिन विचार का प्रारंभिक परिचय दे सकता है, भाषा की बाधा को कम कर सकता है, किसी छात्र को अतिरिक्त अभ्यास करा सकता है, पुस्तक या सामग्री तक पहुँच आसान कर सकता है और कई ऐसे अवसर उपलब्ध करा सकता है जो पहले सबके लिए संभव नहीं थे। इस अर्थ में उसके उपयोग का स्वागत किया जाना चाहिए।
लेकिन शिक्षक को यह देखना होगा कि विद्यार्थी तकनीक का उपयोग सोचने में सहायता लेने के लिए कर रहा है या सोचने से बचने के लिए। यह अंतर बहुत छोटा दिखाई देता है, लेकिन शिक्षा के भविष्य के लिए शायद यही सबसे निर्णायक अंतर होगा।
अंततः मनुष्य केवल जानकारी से मनुष्य नहीं बनता। वह संबंधों के भीतर बनता है। परिवार उसका पहला संसार बनाता है, समाज उसे व्यवहार सिखाता है, मित्र उसे बदलते हैं, पुस्तकें उसकी दुनिया का विस्तार करती हैं और शिक्षक इन सबके बीच ज्ञान और जीवन को जोड़ने वाला एक मानवीय पुल बनता है। तकनीक इस पुल को मजबूत कर सकती है, उसकी पहुँच बढ़ा सकती है और उसे अधिक उपयोगी बना सकती है। लेकिन यदि हम यह मान लें कि पुल की आवश्यकता ही समाप्त हो गई है, तो शायद हम शिक्षा की किसी बहुत बुनियादी बात को भूल रहे होंगे।
इसलिए आज का वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि AI शिक्षक की जगह ले लेगा या नहीं। अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसी शिक्षा की ओर बढ़ना चाहते हैं जिसमें ज्ञान पहले से कहीं अधिक उपलब्ध हो, लेकिन ज्ञान के साथ मनुष्य का मानवीय संबंध धीरे-धीरे कम होता जाए।
मेरा अपना विश्वास है कि यदि शिक्षा से शिक्षक का मानवीय संस्पर्श समाप्त हो गया तो हमारे पास जानकारी बहुत अधिक होगी, सुविधा बहुत अधिक होगी और उत्तर शायद पहले से कहीं तेज मिलेंगे, लेकिन संभव है कि शिक्षा स्वयं कुछ कम हो जाए।
मशीन हमें संसार के बारे में बहुत कुछ बता सकती है। लेकिन संसार को समझने की इच्छा, ज्ञान के प्रति सम्मान, अपनी सीमाओं को पहचानने की विनम्रता, असहमति के साथ जीने की क्षमता और किसी दूसरे मनुष्य के साथ संवाद करते हुए अपने को विकसित करने की प्रक्रिया अभी भी मूलतः मानवीय है।
और शिक्षा में उस मनुष्य को हम शिक्षक कहते हैं।
वरिष्ठ इतिहासकार प्रो. हितेंद्र पटेल जी के फेसबुक वॉल से साभार।














