कविता /खुद को बदलते हुए देखा है…/सुनील कुमार
आज मैंने खुद को बदलते हुए देखा है।
रिस्तों की बुनियाद पर स्वार्थ को हावी होते देखा है।
सोचता था कि दुनिया मेरी ही तरह है,
लेकिन यहाँ के लोगों को मैंने ईर्ष्या से भरे हुए देखा है।
यहाँ अपने ही अपनों को पराये करते हैं।
जरूरत पड़ने पर ही याद किया करते हैं ,
खुद के फायदे के लिए दूसरों को धोखा दिया करते हैं,
लोगों के इस भीड़ में छल से उन्हें आगे आते देखा है।
कुछ सुलझी हुई -कुछ अनसुलझी हुई कहना तो चाहता हूँ
अनकही और अनचाही बात …. डरता हूँ कहीं छोड़ न दे लफ्ज़ भी जुबां का साथ ,
क्योंकि ! मैनें मजबूरियों को सामने आते देखा है।
सुनील कुमार
बी. एड., टी. पी. कॉलेज , मधेपुरा (बिहार)
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