*उच्च शिक्षा विरोधी है बीएनएमयू प्रशासन : सीनेटर*
बीएनएमयू, मधेपुरा के सीनेटर डॉ. सुधांशु शेखर ने वर्तमान बीएनएमयू प्रशासन पर उच्च शिक्षा-विरोधी होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्वविद्यालय प्रशासन छात्र- विरोधी है और इसके द्वारा लगातार नियम-कानून एवं परंपराओं की अनदेखी कर छात्र-विरोधी कार्य किया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान कुलपति प्रो. बी. एस. झा एवं कुलसचिव प्रो. अशोक कुमार सिंह नहीं चाहते हैं कि कोसी क्षेत्र के पिछड़े एवं गरीबों के बच्चे उच्च शिक्षा खासकर पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त करें। यही कारण है कि पीएच. डी. कार्य में तरह-तरह के अड़ंगे लगाए जा रहे हैं, जिसकी सूची लंबी है। इसमें दर्जनों शोधार्थियों के शोध-प्रबंध मूल्यांकन की प्रक्रिया बाधित करने, स्नातक महाविद्यालयों के शिक्षकों को शोध निदेशक बनने से वंचित करने तथा कोर्स वर्क परीक्षा फार्म भरने का विलंब शूल्क पंद्रह हजार रुपए करने जैसे तुगलकी फरमान शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि पीएचडी अधिनियम 2016 में शोधार्थियों को शोध-प्रबंध जमा करने के लिए निर्धारित अवधि 6 वर्ष पूरी होने के बाद अवधि विस्तारिकरण का प्रावधान है। बीएनएमयू, मधेपुरा में इसका अनुपालन नहीं किया जा रहा है। यहां पीएटी-19 के दर्जनों शोधार्थियों को छ वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद शोध-प्रबंध जमा करने से वंचित कर दिया गया है। यह सरासर राज्यपाल के आदेश की अवहेलना है और अन्याय भी है।
डॉ. शेखर ने बताया कि राज्यपाल सह कुलाधिपति के आदेश से लागू पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 में विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों तथा स्नातक महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों में कोई भेदभाव नहीं किया गया है। लेकिन विश्वविद्यालय ने राज्यपाल के आदेश की अवहेलना करते हुए स्नातक महाविद्यालयों के शिक्षकों को शोध-निदेशक बनने से वंचित कर दिया है। इससे यहां पीएच. डी. नामांकन हेतु रिक्तियां कम हो जाएंगी
डॉ. शेखर ने कहा कि परीक्षा नियंत्रक के हस्ताक्षर से 6 अगस्त को जारी पत्र पत्रांक परीक्षा गो. 835/26 कुलपति के छात्र विरोधी होने का प्रमाण-पत्र है। इस पत्र में पीएचडी कोर्स वर्क 2024 एवं 2025 के परीक्षा प्रपत्र भरने से वंचित हुए छात्र- छात्राओं के लिए एक दिन का समय बढ़ाते हुए एक हजार पांच सौ रुपए शुल्क के एवज में पंद्रह हजार रुपए विलम्ब शुल्क निर्धारित किया गया है। इस तुगलकी फरमान का एकमात्र मकसद यहां के आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को पीएच. डी. करने से रोकना है।
डॉ. शेखर ने कहा है कि बुद्धिजीवियों का यह दायित्व है कि वे जातीय एवं वर्गीय संकीर्णताओं से ऊपर उठकर आम लोगों के हित में कार्य करें। लेकिन बीएनएमयू के कुलपति एवं कुलसचिव लगातार छात्रों, शिक्षकों एवं कर्मचारियों के हितों के विपरीत कार्य कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के कई निर्णयों में इन पदाधिकारियों की संकीर्ण मानसिकता का कुप्रभाव झलकता है और इनके व्यवहार में व्यक्तिगत राग-द्वेष, कुंठा एवं अहंकार स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।














