इस पोस्ट में शामिल सभी तस्वीरें अपनी पुस्तक ‘गांधी-विमर्श’ (2015) को लेकर देश के जाने-माने साहित्यकारों, लेखकों से बातचीत करते हुए ली गई हैं। नवोदित लेखक का अपनी कृतियों पर अपने क्षेत्र के दिग्गजों से बातचीत करना अविस्मरणीय अनुभव है।
मेरा यह सौभाग्य है कि मैंने शोधार्थी के रूप में दो पुस्तकें लिखीं हैं, ‘सामाजिक न्याय : अंबेडकर-विचार और आधुनिक संदर्भ’ (2014) तथा ‘गांधी-विमर्श’ (2015)। दोनों को पाठकों एवं आलोचकों ने काफी सराहा।
लेकिन विश्वविद्यालय में शिक्षक बनने के साथ ही मैं लगभग 9 वर्षों तक विभिन्न तरह के प्रशासनिक दायित्वों एवं लिपिकीय कार्यों में उलझ गया। मेरे कई शिक्षकों ने बार-बार मुझको हिदायत दी कि विश्वविद्यालय का मोह छोड़कर शैक्षणिक कार्य करो। कई बार मेरा भी थोड़ा-थोडा़ मोहभंग होता रहा, लेकिन झूठी लोकप्रियता के चक्कर में मैं विश्वविद्यालय में लगा रहा। इसका मेरे शैक्षणिक कैरियर खासकर अध्ययन एवं लेखन पर काफी कुप्रभाव पड़ा है। मेरी कई पुस्तकें आधी-अधूरी रह गईं और अन्य शैक्षणिक गतिविधियां भी मंद पड़ गईं।
संयोग से अप्रैल में विश्वविद्यालय के वरीय पदाधिकारी महोदय को ईश्वर ने ‘सद्बुद्धि’ दी। उन्होंने सपने में यह देखा कि उनके खिलाफ जो कुछ भी हो रहा है, उसका मुख्य सूत्रधार मैं ही हूँ। बस उन्होंने आनन-फानन में मेरा दंडात्मक स्थानांतरण मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर अवस्थित एक सुदूरवर्ती महाविद्यालय में कर दिया। इससे मुझे व्यक्तिगत रूप से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
मुझे खुशी है कि मैं प्रशासनिक एवं लिपिकीय कार्यों से मुक्त हो गया हूँ। ऐसे में मुझे अपने आधे-अधूरे शैक्षणिक कार्यों को पूरा करने का कुछ समय मिल रहा है। आशा है कि पांच-छह महीने में अपनी एक-दो कृतियां आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर सकूंगा।
आप सबों की शुभकामनाएं मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
















