गांधीजी की सारी राजनीति–कुछ सीमाओं और कुछ चूकों के बावजूद बुनियादी तौर से भारतीय सांस्कृतिक अनुभव के सार के शुभ पक्षों के लिए थी। एक राष्ट्र, एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा, एक खानपान वाले राष्ट्र के यूरोपीय नमूने के विपरीत उनकी कोशिश बहुलता से स्पंदित, भारतीय परंपरा से प्रमाणित, समावेशी भारतीय राष्ट्र का निर्माण करने की थी। इसके लिए परंपरा के शुभ से जुड़ना भी जरूरी था, उसके अशुभ से दूर हटना भी।
यह चयन सार्वभौम मानवीय मूल्यों के आधार पर ही किया जाना था। शुभाशुभ के सह-अस्तित्व को समझने-परखने वाली अंतर्दष्टि के साथ ही किया जाना था।
गांधीजी भारतीय स्वाधीनता के साथ-साथ मानवीय सभ्यता की पुन: परिभाषा के लिए भी संघर्ष कर रहे थे। यही कारण है कि वे आज तक जीवित हैं।मुझे विश्वास है कि यह कार्यक्रम गांधीजी की जीवंत उपस्थिति के साथ सार्थक संवाद स्थापति करने में समर्थ होगा।
शुभकामनाएँ।
गांधीवादी कार्यकर्ता डॉ. सुधीर मंडल जी के फेसबुक वॉल से साभार।














