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Ravi डॉ. रवि : कुलपिता का कालखंड।

डॉ. रवि : कुलपिता का कालखंड

मैंने 03 जून, 2017 को भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, लालूनगर, मधेपुरा के प्रतिष्ठित ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में असिस्टेंट प्रोफेसर (दर्शनशास्त्र) के रूप में योगदान दिया और यहाँ मैंने अपनेी और से पहला कार्यक्रम 31 जुलाई, 2027 को आयोजित किया। यह ‘आधुनिक सभ्यता का संकट और गाँधीय समाधान’ विषयक व्याख्यान था। इसके मुख्य वक्ता थे- पूर्व सांसद एवं पूर्व कुलपति एवं सुप्रसिद्ध गाँधीवादी विचारक प्रो. रामजी सिंह। इसमें उद्घाटनकर्ता तत्कालीन कुलपति प्रो. अवध किशोर राय, अध्यक्ष तत्कालीन प्रधानाचार्य प्रो. एच. एल. एस. जौहरी सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। प्रायः सभी लोगों ने कार्यक्रम को सराहा। लेकिन एक छात्र-युवा नेता ने इस कार्यक्रम का विरोध किया। उनका मुख्य सवाल था कि कार्यक्रम में भागलपुर से वक्ता क्यों बुलाया गया, मधेपुरा के डॉ. रमेंद्र कुमार यादव ’रवि‘ या किसी अन्य विद्वान को क्यों नहीं बुलाया गया ? इस तरह मैंने पहली बार ‘रवि बाबू’ का नाम सुना। फिर मैंने आपके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। मुझे ज्ञात हुआ कि आप हमारे ही महाविद्यालय के सेवानिवृŸा प्राध्यापक (हिंदी) एवं प्रथम कमीशंड प्रधानाचार्य तथा हमारे विश्वविद्यालय के संस्थापक (प्रथम) कुलपति हैं और विधायक (सिंहेश्वर विधानसभा) तथा सांसद (लोकसभा एवं राज्यसभा) भी रहे हैं। इसके बाद स्वाभाविक रूप से मैं आपके प्रति आकर्षित हुआ तथा मेरे हृदय के किसी कोने में आपकी एक सकारात्मक छवि अंकित हो गई और मन में आपके दर्शन की एक उत्कंठा भी जगी।
पहला दर्शन: सौभाग्य से कुछ ही दिनों बाद मुझे आपके शुभ-दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त हो गया। पहली ही मुलाकात में आपने मेरे ऊपर अमिट छाप छोड़ीं। जैसे ही मैंने आपको देखा मैं आपके श्रीचरणों में लिपट-सा गया और आपके चरणस्पर्श होते ही मुझे असीम आनन्द की अनुभूति हुई- मानो मैंने एक शीतलतादाता सूर्य का संस्पर्श कर लिया हो। आपकी सुमधुर ऋषिवाणी मेरे कानों से होकर सीधे मेरे दिल में उतर गई, ‘‘बेटा! अच्छा कर रहे हो। आगे भी अच्छा करते रहना।’’ (शायद आपको कुछ-कुछ अग्रज डॉ. रतनदीप ने मेरे बारे में ‘फीडबैक’ दिया था और कुछ-कुछ जानकारियाँ अखबारों से मिली थीं।)
मैं पहली मुलाकात की इस तारीख (16 सितंबर, 2017) और स्थान (ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा का राजकीय अंबेडकर कल्याण छात्रावास) को कभी नहीं भुला सकता। अवसर था-‘हिंदी पखवाड़ा सह सम्मान समारोह’ का। इस अवसर पर मुख्य अतिथि तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर डॉ. अवध किशोर राय, विशिष्ट अतिथि संस्थापक कुलपति प्रोफेसर डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव ‘रवि’, अध्यक्ष छात्रावास अधीक्षक डॉ. जवाहर पासवान, स्वागतकर्ता डॉ. सिद्धेश्वर काश्यप, संचालक हर्षवर्धन सिंह राठौर, धन्यवाद ज्ञापनकर्ता डॉ. रतनदीप आदि उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में मुझे पहली बार आपका सारगर्भित एवं प्रेरणादायीं अभिभाषण सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ। आपने कहा, ’’जिस तरह हमें अपनी माता पूज्य है, वैसे ही मातृभाषा पूज्य है। हिंदी दिवस मातृदिवस है। हिंदी राष्ट्रीयता की प्रतीक है। हिंदी के बिना हिंदुस्तान वैसे ही है, जैसे आत्मा के बिना शरीर।’’
सत्संग का सिलसिला: आगे भी विभिन्न कार्यक्रमों में मुझे डॉ. रवि के शुभ-दर्शन, आपकी प्रेरणादायी वाणी के श्रवण और आपके साथ सत्संग का सुअवसर मिलता रहा। 18 फरवरी, 2018 को मोहन-शकुन्तला टीचर्स ट्रेनिंग काॅलेज, मधेपुरा में आयोजित ‘सत्रारंभ एवं प्रतिमा अनावरण समारोह’ में दिया गया आपका वक्तव्य अविस्मरणीय है। इस कार्यक्रम में आपने कहा, ‘‘अच्छे नागरिक से ही अच्छा राष्ट्र बनता है। लेकिन अच्छे नागरिक एवं महापुरुष किसी औद्योगिक कारखाने में नहीं बनते हैं, ये अच्छे शिक्षण संस्थान में बनते हैं। आगे आपने कहा, ‘‘अच्छे शिक्षण संस्थान की स्थापना एक पुण्य का कार्य है। शिक्षा दान से बङा कोई दान नहीं है और सच्चे शिक्षक से बङा कोई धनवान नहीं है।’’
इसके महज दो दिनों बाद 21 फरवरी, 2018 को ‘शिव- राजेश्वरी युवा सृजन क्लब’, कोसी प्रमंडल के तत्वावधान में राजकीय अंबेडकर कल्याण छात्रावास, मधेपुरा में ही ‘मातृभाषा दिवस पर भाषायी अस्मिता और मातृभाषा’ विषयक परिचर्चा आयोजित हुई। इस अवसर पर उद्घाटनकर्ता डॉ. रवि, मुख्य अतिथि तत्कालीन प्रतिकुलपति डॉ. फारूक अली, अध्यक्ष सह छात्रावास अधीक्षक डॉ. जवाहर पासवान, विषय-प्रवेशकर्ता डाॅ. सिद्धेश्वर काश्यप, संचालक हर्षवर्धन सिंह राठौड़ एवं धन्यवाद ज्ञापनकर्ता डाॅ. आलोक आदि उपस्थित थे। इसमें आपने एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण बात कही, ’’भगवान सभी जगह हर समय नहीं रह सकते, इसलिए उन्होंने माँ को बनाया। माँ की भाषा ही मातृभाषा है। माँ और मातृभाषा का कोई दूसरा विकल्प नहीं है।’’
फिर महज तीन दिनों बाद 25 फरवरी, 2018 को यू. के. इंटरनेशनल स्कूल, मधेपुरा में आयोजित एक कार्यक्रम में भी मुझे आपका सानिध्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उद्घाटनकर्ता के रूप में बोलते हुए आपने कहा, ‘‘घर पहली पाठशाला है और माँ से बड़ी कोई शिक्षिका नहीं है। अतः स्त्री-शिक्षा पर अत्यधिक जोर दिया जाना चाहिए। स्त्री-शिक्षा समाज एवं राष्ट्र के विकास हेतु आवश्यक है। यही कारण है कि एक दार्शनिक ने कहा है कि तुम मुझे एक शिक्षित माँ दो, मैं तुम्हें एक विकसित राष्ट्र दूंगा।’’ इस कार्यक्रम में तत्कालीन कुलपति डाॅ. अवध किशोर राय, तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के पूर्व प्रति कुलपति डॉ. के. के. मंडल एवं तत्कालीन प्रधानाचार्य डॉ. परमानंद यादव, स्कूल के संस्थापक डाॅ. उदय कृष्ण आदि उपस्थित थे।
रजत जयंती समारोह: अगले वर्ष हमने 26 फरवरी, 2019 को भू. ना. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के रजत जयंती समारोह के अंतर्गत ‘उच्च शिक्षा के बदलते परिदृश्य एवं चुनौतियाँ’ विषयक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया। इस अवसर पर तत्कालीन कुलपति डाॅ. अवध किशोर राय, तत्कालीन प्रति कुलपति डॉ. फारूक अली, पूर्व प्रति कुलपति डॉ. के. के. मंडल, साहित्यकार डॉ. भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’, तत्कालीन अध्यक्ष, छात्र कल्याण डॉ. शिवमुनि यादव एवं संयोजक डाॅ. नरेश कुमार आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए आपने कहा, ‘‘यह विश्वविद्यालय महामना भूपेन्द्र बाबू के नाम पर है। उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व बेमिसाल है। उनका चरित्र व्यक्तिगत, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का आदर्श है।’’ आपने आगे कहा, ‘‘हमारे विश्वविद्यालय की यात्रा शून्य से शिखर तक जारी है। हमारा वर्तमान अतीत से बेहतर है और हम उज्ज्वल भविष्य के प्रति हम आशान्वित हैं।’’
संदेश: यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि रजत जयंती अंतर्गत आयोजित उक्त राष्ट्रीय सेमिनार के अवसर पर एक स्मारिका का भी प्रकाशन किया गया था, जिसमें रवि बाबू ने भी कृपापूर्वक अपना शुभकामना संदेश उपलब्ध कराया था। मेरे लिए यह खुशी की बात है कि मेरी एक प्रकाशनाधीन पुस्तक के लिए आपने ‘साक्षी के दो शब्द’ शीर्षक से आशीर्वचन उपलब्ध कराया था, जो एक ऐतिहासिक दस्तावेज (‘संस्थापक कुलपति की आखिरी वसीयत’) की तरह है। इसमें आपनेे लिखा है, ’’जी हाँ, मैं इस विश्वविद्यालय का संस्थापक कुलपति ही नहीं रहा, मैंने इसकी गर्भावस्था का सुख भी अनुभूत किया है, प्रसव की पीड़ा भी झेली है, इसे घुटने के बल चलते और फिर डगमगाते हुए दौड़ते भी देखा है तथा आज इसे उस ऊँचाई पर भी देख रहा हूँ, जहाँ से अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ देख पा रहा है। जहाँ तक आने वाले कल को धारण करने की बात है, यह कहने का दुस्साहस भी शायद मैं ही कर सकता हूं, क्योंकि इस विश्वविद्यालय का वांड.मय में चाहे जितना बड़ा हो जाए, इसकी इमारत में चाहे जितनी मंजिलें जुड़ जाएँ, इसकी बुनियाद बदली नहीं जा सकती है और ना ही उस बुनियाद से मेरे लहू और पसीने को अलग किया जा सकता है।’’ उन्होंने यह भी लिखा है, ‘‘ईश्वर ने मुझे मेरे अकादमिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कई रूपों में और कई पदों पर कार्य करने का अवसर दिया लेकिन आज मैं यह बात पूरी जिम्मेदारी और विश्वास के साथ और निसंकोच कह सकता हूँ कि इस विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति के तौर पर बीते छह महीने मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ कालखंड है।’’ इस संदेश में आपने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव और उनकी सरकार को साधुवाद दिया ह,ै जिन्होंने इस इलाके में विश्वविद्यालय की बहुप्रतीक्षित मांग पूरी की, मधेपुरा को इसका मुख्यालय बनाया और सर्वप्रथम आपको इसकी सेवा करने का अवसर दिया। आपनेे तत्कालीन राज्यपाल श्री वाई. एम. कुरैशी के साथ बिहार के तत्कालीन कुलपतियों की बैठक को भी याद किया है, जिसमें नए बने विश्वविद्यालयों में परीक्षा आयोजित करने की बात हुई थी और उन विश्वविद्यालयों में केवल भू. ना. मंडल विश्वविद्यालय ने यह चुनौती स्वीकार की। फिर आपके नेतृत्व में आपके तत्कालीन सभी सहयोगियों ने दिन-रात मेहनत की और परीक्षा का सफल आयोजन कर इस विश्वविद्यालय ने बता दिया कि वह कितनी उर्वर मिट्टी पर खड़ा है। इस तरह विश्वविद्यालय के लिए संस्थापक कुलपति, (जिन्हें ‘कुलपिता’ कहना अतिश्योक्ति नहीं) का कालखंड काफी महत्वपूर्ण है। वेसे इस संक्षिप्त कालखंड के बाद अच्छे नागरिक से ही अच्छा राष्ट्र बनता है। लेकिन आगे कुलपति का पद त्यागने के उपरांत भी आप जीवन के अंतिम समय तक विश्वविद्यालय के समग्र विकास हेतु समर्पित रहे और हमेशा विश्वविद्यालय परिवार को आपका मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद मिलता रहा।
ऑनलाइन संवाद: डॉ. रवि ने ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में कोरोना काल (अगस्त-सितंबर 2020) में आयोजित ऑनलाइन वेबिनार शृंखला का उद्घाटन किया था। मुझे याद है कि आपको ऑनलाइन बोलने में सहयोग के लिए मैंने अपने यूट्यूब चैनल ‘बीएनएमयू संवाद’ में अपने सहयोगी द्वय श्री सारंग तनय एवं श्री सौरभ कुमार चैहान को आपके मधेपुरा स्थित आवास (चतरा कोठी) पर भेजा था। आपने इन दोनों के सहयोग से ऑनलाइन उद्घाटन अभिभाषण दिया और सबसे बड़ी बात यह कि अभिभाषण के तुरंत बाद बच्चों-सी उत्सुकता के साथ मेरे दोनों सहयोगियों से कहा, ‘‘सुधांशु बेटा से पूछकर मुझे बताओ कि मैंने कैसा बोला ?’’ यह आपकी महानता का एक छोटा-सा उदाहरण है। आगे कोरोनाकाल में ही मैने यू-ट्यूब चैनल ‘बीएनएमयू संवाद’ के लिए कई दिनों तक लगातार आपसे मुलाकात की और विभिन्न विषयों पर आपके विचारों को रिकॉर्ड किया। रिकार्डिंग के पूर्व आप मुझसे और डॉ. रतनदीप भाईजी से काफी चर्चा करते थे। खैर आपके व्याख्यानों को हमने ‘डाॅ. रवि की पाठशाला’ (‘साक्षी से संवाद’) शृंखला अंतर्गत प्रसारित किया है, जो हमारे लिए एक बहुमूल्य धरोहर की तरह है। ये व्याख्यान हैं- ‘शिक्षक, शोधार्थी एवं साहित्य’, ‘आजादी: कुछ यादें-कुछ बातें’, ‘श्रीकृष्ण का संदेश’, ‘कबीर का दर्शन’ और ‘श्रीराम का आदर्श चरित’।
डॉ. रवि विचार मंच का गठन: हमें अत्यंत दुख के साथ लिखना पर रहा है कि आपका कोरोनाकाल में ही 14 मई, 2021 को असमय निधन हो गया। इसके बाद आपके विचारों एवं कार्यों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आपके निकटतम सहयोगी एवं कुलपति के निजी सहायक श्री शंभू नारायण यादव के नेतृत्व में डाॅ. रवि विचार मंच का गठन किया गया है। मंच के माध्यम से हमने फरवरी 2022 में तत्कालीन कुलपति डॉ. आर. के. पी. रमण को आवेदन देकर विश्वविद्यालय में आपकी आदमकद प्रतिमा लगाने की मांग की थी। हमारी माँगों के आलोक में 17 फरवरी, 2022 को अभिषद् (सिंडिकेट) और 19 फरवरी, 2022 अधिषद् (सीनेट) में सर्वसम्मति से इस आशय का प्रस्ताव पारित हुआ। तदुपरांत विश्वविद्यालय द्वारा जून 2022 में प्रतिमा हेतु स्थल चिह्नित करने के लिए एक पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया गया। इसमें तत्कालीन अध्यक्ष, छात्र कल्याण डॉ. पवन कुमार को संयोजक और मुझे सदस्य-सचिव की जिम्मेदारी दी गई थी। आगे इस समिति के प्रस्ताव के आलोक में कुलपति कार्यालय के बगल में डॉ. रवि की प्रतिमा हेतु स्थान आवंटित कर दिया गया है। आशा है कि आने वाले दिनों में आपकी आदमकद प्रतिमा लगेगी।
दुखद पहलू: संक्षेप में, प्रोफेसर डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव ‘रवि’ एक सुप्रसिद्ध विद्वान, स्वाभिमानी शिक्षक, कुशल प्रशासक, लोकप्रिय राजनेता एवं सहृदय इंसान थे। आपके निधन से शिक्षा, साहित्य एवं राजनीति के एक युग का अंत हो गया। आज आप सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपकी कृतियाँं हमारे साथ हैं। इनमें ‘परिवाद’, ‘आपातकाल क्यों ?’, ‘लोग बोलते हैं’, ‘बातें तेरी कलम मेरी’, ‘बढ़ने दो देश को’ आदि प्रमुख हैं। लेकिन मुझे काफी खेद के साथ लिखना पर रहा है कि मुझे आपके पैतृक शहर मधेपुरा में भी किसी बुक स्टाॅल या लाइब्रेरी में आपकी कोई पुस्तक देखने को नही मिली है। यहाँ तक कि हमारे ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा और भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के पुस्तकालय में भी इनकी पुस्तकें नहीं हैं या कुछ होगी भी तो कहीं किसी कोने में! अतः मैंने यह आलेख लिखने के क्रम में हीं 7 दिसंबर, 2023 को अपने महाविद्यालय के प्रधानाचार्य और अपने विश्वविद्यालय के कुलसचिव को पत्र लिखकर माँंग किया है कि महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में डॉ. रवि गैलरी का निर्माण किया जाए और उसमें डॉ. रवि एवं कोसी क्षेत्र के अन्य विभूतियों की कृतियों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए। इसके साथ ही आपके अधूरे सपनों को पूरा करने और आपकी रचनाओं को संरक्षित एवं पुनर्प्रकाशित करने हेतु भी विभिन्न स्तरों पर प्रयास करने की जरूरत है। पूरे कोसी क्षेत्र एवं विशेषकर बीएनएमयू परिवार के सभी सदस्यों की यह महती जिम्मेदारी है कि हम अपने कुलपिता की वैचारिक विरासत को उŸाराधिकारभाव से ग्रहण करें और उसके संरक्षण एवं संवर्धन में यथासंभव योगदान दें। यह अपने विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति (‘संस्थानिक-वैचारिक पिता’) के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि तो होगी ही, हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से भी पुण्यकारक भी होगा। ‘‘पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तप है। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो जाते हैं। जिसकी सेवा एवं सदगुणों से पिता-माता संतुष्ट रहते हैं, उस पुत्र को प्रतिदिन गंगा-स्नान का पुण्य मिलता है। माता सर्वतीर्थमयी है और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप है। इसलिए सब प्रकार से माता-पिता का पूजन करना चाहिए। माता-पिता की परिक्रमा करने से पृथ्वी की परिक्रमा हो जाती है।’’ (‘‘पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः। पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः।। पितरौ यस्य तृप्यन्ति सेवया च गुणेन च। तस्य भागीरथीस्नानमहन्यहनि वर्तते।। सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता। मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्।। मातरं पितरंश्चैव यस्तु कुर्यात् प्रदक्षिणम्।। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तदीपा वसुन्धरा।।’’) -‘पद्मपुराण’
-डॉ. सुधांशु शेखर, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग, ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा (बिहार), मो.- 9934629245

नोट : यह आलेख 06.12.2023 को युवा संपादक श्री हर्षवर्धन सिंह राठौड़ की प्रकाशनाधीन पत्रिका के लिए लिखा गया।