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Kavita कविता। फटा जीन्स, निकली नई संस्कृति!  डॉ. सामबे

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कविता। फटा जीन्स, निकली नई संस्कृति! डॉ. सामबे

जब औरतों के जिस्म पर/होता था आंचल/तो बनते थे गीत-/छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा!/जब औरतें थी आंचल में/तो आंचल मैला होता था/और उपन्यास लिखा जाता था/मैला आँचल!                                         आंचल के साथ/बहुत समस्या थी! /आंचल लहराता थाऔर लिखने वाले लिखते थे/लहरा के आंचल/ तुझकुो लाए बार-बार/कोई नहीं है/फिर भी है मुझको/ना जाने किसका इंतज़ार!

जब आंचल में होती थी नारी/तो निकलती थी पंक्ति-/हाय अबला तेरी यही कहानी/आंचल में है दूध/आंखों में पानी!

औरतों ने बदल दी तमाम कहानी/और आंचल को छोड़कर/धारण कर ली है/जीन्स और टाप/सारे गीतकारकवि और उपन्यासकार/हो गए फ्लाप!            एक साथ/मन की बात की तरह लोकप्रिय/हो गए रंग बिरंगे टाप!                                                           चला गया है/छोड़ दो आंचल का जमाना/आ गया है बाजार में/फटा जीन्स पुराना/फटा जीन्स/निकली नई संस्कृति!

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03/02/2024

भागलपुर, बिहार।

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