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Bihar अलविदा सुशील कुमार मोदी। प्रेम कुमार मणि

अलविदा सुशीलकुमार मोदी

-प्रेमकुमार मणि, पटना

देर रात मनहूस खबर मिली है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता, बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और हमारे प्रिय साथी सुशीलकुमार मोदी दिवंगत हो गए. पिछले अक्टूबर (2023 ) में उनसे दिल्ली में उनके आवास पर मिला था. देर तक हमलोग साथ रहे. दुनिया-जहान की बातें. अगले रोज उन्हें जापान जाना था. आने के बाद भी दूरभाषिक बात हुई. इधर अचानक उनके ही ट्वीट से मालूम हुआ कि उन्हें कैंसर है. और आज उनके निधन की दुखद सूचना.

सुशील जी से मित्रता पुरानी थी. जेपी आंदोलन से जुड़े रहे. तब वह पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के सचिव थे. लालू जी छात्र संघ के अध्यक्ष थे. उस समय भी समाजवादी युवजन सभा और विद्यार्थी परिषद् के बीच गुपचुप समझौता था. इसी समझौते के तहत दोनों जीते थे.

सुशील मोदी चाहे जिस दल में रहें, विचारों से आधुनिक और तरक्कीपसंद थे. ईसाई परिवार से आने वाली पत्नी का मान हमेशा रखा. उनके साथ चर्च भी जाते रहे. समारोहों में फिजूलखर्ची के वह विरोधी रहे. बेटे के विवाह में चाय और लड्डू से अतिथियों का स्वागत किया. भोजन की व्यवस्था नहीं की. उन्हें कभी धार्मिक पाखण्ड से भी जुड़ा नहीं देखा. बल्कि इन चीजों का मजाक उड़ाते थे.

राजनीतिक जीवन में सुचिता हमेशा बनाए रखी. उनका निजी कार्यालय सुव्यवस्थित होता था. हमेशा सीखते रहते. बिहार के वित्त मंत्री थे. अर्थशास्त्र उनका विषय कभी नहीं रहा,क्योंकि विज्ञान के विद्यार्थी थे. उन्हें देखा कि इण्टर स्तर की किताबों से अर्थशास्त्र के मूलभूत चीजों को जानने की कोशिश कर रहे हैं. लगातार और व्यवस्थित सीखने में वह यकीन रखते थे. हमलोग प्रायः आद्री ( एशियाई विकास शोध संस्थान) में बैठते थे. दिवंगत शैबाल गुप्ता संस्था के सचिव हुआ करते थे. प्रभात घोष, पूर्व विदेश सचिव मुचकुन्द दुबे और अन्य अनेक ब्यूरोक्रेट और दूसरे साथी वहाँ नियमित बैठते थे. सुशील जी भी उनमें एक होते थे. धीरे-धीरे वित्तीय मामलों के वह गहरे जानकार हो गए. केंद्र सरकार में भी वित्तीय मामलों की कमिटी में उन्होंने उल्लेखनीय और प्रशंसनीय कार्य किया.

स्मरण आता है वह दिन जब विधान परिषद् में बजट पर मुझे बोलना था. कोई घंटे भर के भाषण में मैंने बजट की तीखी आलोचना की थी. वित्त मंत्री सुशील जी थे. भाषण ख़त्म होने पर वह मंत्री-बेंच से उठ कर मेरे पास आए हाथ मिलाया और यह कहते हुए बधाई दी कि बहुत अच्छा बोले. उन्हें अपनी आलोचना सुनने का भी धैर्य था.

कितनी बातें याद करूँ. मन भीगा हुआ है. उनकी हमेशा शिकायत रही कि आपको भाजपा में होना चाहिए था. वह मेरे विचारों से परिचित थे. मैं जनता दल यु के उम्मीदवार के रूप में 2005 में चुनाव लड़ रहा था. भाजपा से चुनावी गठबंधन था. मैंने अपनी गाड़ी पर कभी भाजपा का झंडा नहीं लगाया. भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने सुशील जी से शिकायत की. सुशील जी ने नीतीश जी से कहा. नीतीश जी ने मुझे इस वास्ते फोन किया कि आप को झंडा लगाना चाहिए. मैंने मना कर दिया. मुझे लगता था सुशील जी मेरे चुनाव प्रचार में नहीं आएंगे . लेकिन आये . दो बार आये. मुस्कुराते हुए कान में धीरे से कहा कि झंडा लगाने केलिए नहीं कहूंगा. इत्मीनान रखें. इस तरह दिल्लगी में बात ख़त्म हुई.

ओह ! आधी रात भी ढल गई है. नींद नहीं आएगी. जाना तो एक रोज सबको है. लेकिन सुशील जी आप को इतनी जल्दी नहीं जाना था. आपको श्रद्धांजलि लिखते हुए रुलाई से मन भीग रहा है. भूल-चूक मुआफ करना साथी.

आख़िरी प्रणाम. श्रद्धांजलि…