BNMU। हीरा की महत्ता…

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हीरा की महत्ता…
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बिहार लोक सेवा आयोग, पटना द्वारा असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (दर्शनशास्त्र) का परीक्षाफल दिसंबर 2016 में प्रकाशित किया गया और मैं भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के लिए चयनित हुआ। यह सूचना मिलने पर मेरे एक परिचित प्राध्यापक ने मुझसे कहा कि जब मैं मधेपुरा जाऊँ, तो मैं सामान्य शाखा के प्रशाखा पदाधिकारी हेमंत कुमार उर्फ हेमंत हीरा से अवश्य मिलूँ; क्योंकि उनके शब्दों में, “हीरा के पास विश्वविद्यालय की सभी समस्याओं का समाधान है।”

मैंने इस विश्वविद्यालय में अपने तीन वर्ष 9 माह के कार्यकाल में इस बात को बड़ी सिद्दत से महसूस किया। उन्हें नियमों-परिनियमों की काफी जानकारी थी और उन्हें तथ्यों एवं परिस्थितियों को अपने मनोनुकूल बनाने में महारथ था। खास बात यह कि उन्हें जो भी जिम्मेदारी दी जाती थी, उसे वे बखूबी निभाते थे।

हीरा बाबू शुरू से ही मुझे अपना छोटा भाई मानते थे और हमेशा मुझे उचित सलाह देते थे। मैं भी समय- समय पर उनसे मिलकर या उन्हें फोन करके उनका मार्गदर्शन लेता था। वे मुझे अक्सर कहते थे अपना विनम्र व्यवहार बनाए रखिए और निरंतर ज्ञानार्जन कीजिए। यही आपकी असली पूंजी होगी। कुलपति बदलते रहेंगे और पद भी आते-जाते रहेगा। लेकिन व्यवहार कुशलता और कार्यदक्षता का महत्व हमेशा बना रहेगा।

इधर, जब मुझे उपकुलसचिव अकादमिक की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिली, तो मेरी उनसे निकटता काफी बढ़ गई। दरअसल उन्हें भी प्रभारी, निकाय एवं प्राधिकार के रूप में हमारे अकादमिक शाखा में ही एक छोटी-सी जगह उपलब्ध कराई गई थी। वे बाहर बरामदे में बैठकर देर रात तक काम करते रहते थे और कम्यूटर ऑपरेटर को इस्ट्रक्शन देकर लिखाते रहते थे। मैं अंदर में बैठकर उनके मुखारविंद से विभिन्न नियमों-परिनियमों का भाष्य और बीच-बीच में विश्वविद्यालय के विभिन्न ‘देवी-देवताओं’ के गुण-कर्म पर टीका-टिप्पणी सुनकर अपना ज्ञानवर्धन करता था।

हीरा बाबू के रहने से हमारी शाखा में हमेशा रौनक बनी रहती थी। वे हमेशा किसी-न-किसी बात को लेकर हमारे अकादमिक निदेशक प्रोफेसर डॉ. एम. आई. रहमान एवं मुझसे चर्चा करते थे और हमारे बीच अक्सर हँसी-मजाक भी होती थीं।

हीरा बाबू से हमें अकादमिक शाखा के अपने कार्यों में भी सहयोग मिलता था। गत वर्ष दूर्गा-पूजा एवं दीपावली की छुट्टी के बीच यहाँ के शोधार्थियों को 5 प्वाइंट सर्टिफिकेट वितरित करने में उनका सहयोग अविस्मरणीय है। साथ ही दिसंबर 2020 में आयोजित एकेडमिक काउंसिल की बैठक के आयोजन में भी मुझे उनसे काफी मदद मिली।

मैं यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेख करना चाहता हूँ कि हीरा बाबू चाय के काफी शौकीन थे। उन्होंने अकादमी शाखा में चाय बनाने की सभी व्यवस्था कर रखी थी और हमें प्रत्येक दिन उनके हाथों की बनी चाय पीने मिलती थीं। हम उनके आग्रह को कभी भी टाल नहीं पाते थे। एक-दो बार तो उनके कहने पर मैंने सहर्ष बिना चीनी वाली फिकी चाय भी पी ली थीं।

यहाँ मैं विशेष रूप से हीरा बाबू से जुड़े अपने हालिया दो संस्मरण का जिक्र करना चाहता हूँ, जिससे यह लगता है कि उन्हें अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। एक दिन जब मैं जल्दबाजी में उनकी चाय पिए बिना ही जाने लगा, तो उन्होंने कहा, “सुधांशु बाबू पी लीजिए, जब तक हैं। हम चले जाएँगे, तो याद कीजिएगा।” इसी तरह एक दिन वे अकादमी शाखा में मेरे सहयोगी बिमल किशोर बिमल को उनका बकाया रूपया जबरन लौटाने लगे और हँसते हुए बोले, “बिमल कर्जा नय राखबौ। अब हमरा जाय के दिन नजदीक आए गेल छौ।”

हेमंत हीरा जी लंबे समय से अस्वस्थ थे। इसके बावजूद वे निरंतर कार्य करते रहे। उन्होंने डाक्टर द्वारा आराम करने की सलाह को भी ‘इग्नोर’ कर सीनेट की बैठक के आयोजन में मदद किया। वे सीनेट के अधिवेशन के लिए बनी लेखनी एवं कार्यालयी कार्य समिति के वरीय सदस्य थे, जिसके संयोजन की जिम्मेदारी मुझे दी गई थी।

मुझे आज विशेषरूप से दो बातों का हमेशा के लिए मलाल रहेगा- एक, मुझे उनके ऐतिहासिक संस्मरणों को रिकार्ड करने या बीएनएमयू संवाद पर प्रसारित करने का अवसर नहीं मिल पाया। दो, उनके जीते जी अकादमिक शाखा में बुनियादी सुविधाओं का अभाव दूर नहीं हो पाया।

अंत में, मैं हेमंत हीरा जी के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे उनके परिजनों को दुख की इस घड़ी में धैर्य धारण करने की शक्ति दें।

सादर नमन।
– सुधांशु शेखर, जनसंपर्क पदाधिकारी एवं उप कुलसचिव अकादमिक, बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा

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