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Poem। हमने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा

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हमने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा।
ग़रीबों को सड़क पर सोते देखा।
बच्चों को भूख से बिलखते देखा।
मासूमोों को काम की खोज में दर-दर भटकते देखा‌।
उनके घर परिवारों को बेसहारे तिल-तिल मरते देखा।
हमने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा।

क़र्ज़ में डूबे माँ-बाप को बेटी के ब्याह के लिए सिसकते देखा।
बेटियों को दहेज़ प्रथा का शिकार होते देखा।
दहेज़ ना मिलने पर उन्हें छोड़ जाते ससुराल वालों को देखा।
फिर उन बेटियों को लोगों के ताने सुुन-सुन घुटते देखा।
हमने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा।

पैसे ना रहने पर गरीबों का इलाज ना करने वाले डाक्टरों को देखा।
अपने बच्चे के लिए दर-दर भीख मांगती माओं को देखा।
बलात्कार का शिकार होती बहु-बेटियो को देखा।
लोगों को उन बहु-बेटियो का नााम सोशल मीडिया पर फैलाते देखा‌
हमने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा।

बहुओं को आते ही घर को नरक बनाते देखा।
माँ के खिलाफ बेटों के कानों को भरते देखा।
बेटे के होते हुए बूढ़े माँ बाप को वृद्धाश्रम जाते देखा।
हमने ये तक होते देखा।                            हमने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा।

गरीबों के छोटे छोटे बच्चो को पढ़ाई छोड़ काम करते देखा।
उन्हें अपना बचपन खोते देखा।
जितना हैं, उतने में खुश रहते देखा।
फिर भी उन्हें स्वाभिमान से जीते देखा।
हमने ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा।

शालू पंसारी
अतिथि व्याख्याता, वाणिज्य विभाग, के. पी. कॉलेज, मुरलीगंज, मधेपुरा

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