Gandhi। नवनालंदा महाविहार, नालंदा द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी : जीवन एवं दर्शन विषयक ऑनलाइन परिचर्चा आयोजित

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भारतीय दर्शन के चर्मोत्कर्ष हैं। वो भारत भारतीय सभ्यता-संस्कृति के मूल सार हैं। वे भारतीय जीवन-दृष्टि के प्रायोगिक रुप है। गांधी के जीवन- दर्शन को अपनाकर ही मानवता का कल्याण संभव है। यह बात नव नालंदा महाविहार, नालंदा के कुलपति प्रोफेसर डॉ. वैद्यनाथ लाभ ने कही। वे गुरुवार को नव नालंदा महाविहार, नालंदा द्वारा आयोजित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी : जीवन एवं दर्शन विषयक ऑनलाइन परिचर्चा में अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे‌। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन केवल सैद्धांतिक बात नहीं है, बल्कि वह पूर्णत: व्यवहारिक है। वह अध्यात्मिक साधना से जुड़ी हुई है और इसमें संपूर्ण मानवता के कल्याण की भावना निहित है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन दर्शन में भारतीय दर्शन की इसी मानवीय मानवीय संवेदना को अपनाया। भारतीय परंपरा में जो कुछ भी उदात्त सकारात्मक मूल्य हैं, गांधी का दर्शन उसका निचोड़ है।

उन्होंने कहा कि सभी धर्म मानवता की हित के लिए बात करते हैं। सभी धर्मों में चराचर जगत के कल्याण की कामना की गई है। यदि धर्म को केवल मजहब बनाकर उसे संप्रदायिकता का जामा नहीं पहनाया जाए, तो सभी धर्म अच्छे हैं। गांधी ने अपनी सर्वधर्म प्रार्थना में सभी धर्मों की प्रार्थना को सम्मिलित किया। कोई भी धर्म ऐसा नहीं कहता है कि दूसरे का गला काट दो या दूसरों का शोषण करो। लोग धर्म की विकृत व्याख्या करके उसका दुरुपयोग करते हैं और उसके नाम पर गलतफहमियां फैलाते हैं। नफरत फैलाते हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में वासुधैव कुटुंबकम् का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। पूरा संसार ही हमारा परिवार है। हम शांतिपूर्ण सहअस्तित्व मैं विश्वास करते हैं। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने हमें ट्रस्टीशिप का सिद्धांत दिया है। इसका आधार है कि हमारे अंदर एक त्याग की भावना आए। जितने की आवश्यकता हमको है उतना ही हम लेंगे और बाकी हम दूसरों के लिए छोड़ देंगे।आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह नहीं करेंगे।उन्होंने कहा कि आज गांधी के नाम पर ढेर सारी भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं और अनर्गल प्रलाप किए जा रहे हैं। ऐसे में दही गांधी का सही संदर्भ में पाठ करने की जरूरत है। गांधी जी को जब हम पढ़ेंगे नहीं, तो गांधीजी समझ में नहीं आएंगे। इस अवसर पर आमंत्रित वक्ता बीएनएमयू, मधेपुरा के जनसंपर्क पदाधिकारी डॉ. सुधांशु शेखर ने कहा कि मनुष्य अपने को इस धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझता है और पूरे प्रकृति-प्रर्यावरण का संचालन अपने हिसाब से करना चाहता है। मनुष्य का यही अहंकार

कोरोना संकट के पैदा होने का कारण है। कोरोना ने अपने आप को सर्वशक्तिमान मानने वाले मनुष्य और उसकी आधुनिक सभ्यता को एक आईना दिखाया है।

उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी मानव सभ्यता के ऊपर मानव सभ्यता रूपी शरीर के ऊपर एक बुखार बनकर आया है। यह हमें इस ओर संकेत कर रहा है कि हमारी पूरी सभ्यता दृष्टि, हमारी पूरी विकास दृष्टि, हमारी पूरी जीवनशैली दोषपूर्ण एवं रोगग्रस्त है। इस पूरे सिस्टम को चिकित्सा की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि पूरी आधुनिक सभ्यता को चिकित्सा की जरूरत है। आधुनिक सभ्यता के उपचार में ही कोरोना का भी उपचार शामिल है। लेकिन यदि हम सिर्फ कोरोना का उपचार करेंगे और पूरी सभ्यता का इलाज नहीं ढूंढेंगे, तो आने वाले दिनों में हमारी यह सभ्यता की बीमारी बढ़ जाएगी‌। हमारा जीवन संकट में पड़ जाएगा। शायद तब हमें इलाज का अवकाश भी नहीं रहे।उन्होंने कहा कि आधुनिक सभ्यता के संकटों का समाधान करने के लिए हमें स्वेच्छा से सादगी, संयम एवं सुचिता को अपनाना होगा। प्रकृति-पर्यावरण के साथ सहकार वाली जीवन दृष्टि को अपनाना होगा। हमें अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करना होगा। हमें तकनीकी प्रगति की हद बांधनी होगी। हमें मशीनों को मनुष्य का नियंता बनाने से रोकना होगा। हमें विकास के बढ़ते होड़ और हथियारों के बढ़ते जाखिरे को कम करना होगा।

गाँधी विचार विभाग, टीएमबीयू, भागलपुर के अध्यक्ष डाॅ. विजय कुमार ने कहा कि आजादी को हमारे पुरखों ने स्वराज कहा है। स्वराज अपने मन का राज है। यह राज सब के द्वारा बनेगा सबके लिए बनेगा और सब प्रकार से बनेगा। उन्होंने कहा कि स्वराज अपने लिए नियत कार्यों को मनोयोग पूर्वक करने वाला राज्य है। सत्याग्रह इसकी कुंजी है। उन्होंने बताया कि गांधी यह मानते थे कि भारत को अंग्रेजों ने गुलाम नहीं बनाया है। भारत अंग्रेजी सभ्यता के कारण गुलाम हुआ है। मुहम्मद साहेब के शब्दों में यह शैतानी सभ्यता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह घोर कलयुग है। उन्होंने कहा कि आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य का प्रकृति के साथ रिश्ता बिगाड़ दिया है। इसके विपरीत गांधी दर्शन में प्रकृति के साथ सहचार्य आदर्श निहित है। गांधी मानते हैं कि हम प्रकृति के अंग हैं। प्रकृति के साथ हमारा अन्योन्याश्रय संबंध है। ना केवल मनुष्य का बल्कि मनुष्येत्तर प्राणी जगत का जगत से रिश्ता है।कार्यक्रम का संचालन डॉ. राणा पुरुषोत्तम सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरेकृष्ण तिवारी ने की। कार्यक्रम में डॉ. निहारिका लाभ सहित कई गणमान्य अतिथि, प्राध्यापक एवं शोधार्थी ने भाग लिया।

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