कोई स्कूल का शिक्षक क्यों बनना चाहेगा जब वह स्कूल और वहां के विद्यार्थी शिक्षक दिवस पर याद करते समय प्राथमिकता क्रम में उन्हें सबसे आखिर में रखें?
ऊंचे ओहदों पर पर पहुंच कर पद- प्रतिष्ठा – सम्मान और सम्पन्नता हासिल कर चुके बहुत कम ही विद्यार्थी अपने प्रारंभिक जीवन के शिक्षकों को सार्वजनिक रूप से याद करते हुए देखे जाते हैं। कोई अपने पीएचडी के गाइड को याद करता है, तो कोई नौकरी दिलाने वाले को , तो कोई उनको जो अब भी किसी प्रभावशाली पद पर हैं और सेवानिवृत्त नहीं हुए।
कृतज्ञ समाज वह होता है जो अपने निर्माण में भूमिका निभाने वाले अच्छे लोगों को तब भी याद करता है जब वे अवकाश ग्रहण कर चुके हैं या अनुपस्थित हैं।
शांतिनिकेतन ने अपने उन सभी अध्यापकों पर एक पुस्तक निकाली थी जो गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के समय तक यानी १९४१ तक रहे। किताब का नाम है ‘ मेकर्स आफ़ ए मिशन ( 1901- 1941)। गुरुदेव तो अपने पहले सहयोगी शिक्षक सतीशचंद्र को याद करते हुए भावुक हो जाते थे। सतीशचंद्र बहुत कम उम्र में चले गए। बाईस साल में। उन्हें शेक्सपियर, बायरन से लेकर अनेक भारतीय कवियों की रचनाएं कंठस्थ थीं जिन्हें वे अपने विद्यार्थियों को बड़े आनन्द के साथ सुनाते थे। वे अपनी कक्षा को निर्धारित पाठ तक सीमित नहीं रखते थे। शांतिनिकेतन के अनेक पेड़ उन्हीं के हाथ के लगाए हुए हैं।
अपने लगाए पौधों को चुपचाप खड़े होकर देर तक निहारना उनका प्रिय काम था।
ऐसे ही एक अध्यापक थे अजित कुमार चक्रवर्ती। सतीश चन्द्र के साथी थे। वे भी बत्तीस साल की अल्पायु में चले गए। लेकिन रवीन्द्रनाथ के भाषण और कृतियों को प्रामाणिक दस्तावेज का स्वरूप शुरू शुरू में उन्होंने ही दिया। जब रवीन्द्रनाथ की ‘ गीतांजलि ‘ पर पाश्चात्य प्रभाव बताया जा रहा था तब सबसे पहला प्रतिवाद उन्होंने ही किया। डॉ रामेश्वर मिश्र द्वारा सम्पादित रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘ कबीर के सौ पद ‘ की भूमिका में यह बात दर्ज है।
‘मेकर्स आफ़ ए मिशन’ में एक अध्यापक ऐसे भी हैं जिनका सान्निध्य इन पंक्तियों के लेखक को मिला। वे हैं धनपति लाहा। शांतिनिकेतन में संतोषालय के बरामदे में छोटे बच्चों की क्लास लेते थे। रवीन्द्रनाथ का सान्निध्य उन्हें मिला था। उनका जन्म उसी साल हुआ जिस साल डा. राममनोहर लोहिया का। १९१० में। शांतिनिकेतन के पाठभवन में मैं प्रवेश पाने योग्य हूं या नहीं, बांग्ला थोड़ी बहुत पढ़ और समझ लेता हूं या नहीं, इसका पहला परीक्षण १९७५ के जाड़ों में उन्होंने ही किया था।
पाठभवन के प्रिंसिपल रहे सुप्रिय टैगोर ने अपनी किताब में उनके अवकाश ग्रहण के दिन को बहुत मर्म भरे शब्दों में याद किया है। लिखा है – ‘ एकदिन वे साइकिल पर बैठकर अपने गांव चले गये। हम उन्हें दूर तक जाता हुआ देखते रहे। ‘
अच्छे शिक्षक , अच्छे लोग ऐसी ही सहजता से दृश्य के परे चले जाते हैं।
समाजवादी विचारक डॉ. जयंत सिंह तोमर के फेसबुक वॉल से साभार।














