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श्रीकृष्ण के अनन्य भक्तकवि नजीर अकबराबादी 

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श्रीकृष्ण के अनन्य भक्तकवि नजीर अकबराबादी 

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विष्णु के अवतारों में एकावतार सृष्टि के महालोकनायक श्रीकृष्ण का कल दिनांक 4 सितम्बर 2026 यानी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को अवतरणोत्सव है।इनकी प्रभा की ऐसी व्यापकता रही है कि कई मुसलमान कवियों ने आत्मविभोर होकर इनकी भक्ति में जो समर्पणऔर तन्मयता दिखलायी है वह साम्प्रदायिक सद्भाव की दृष्टि से अद्भुत है।इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाम रसखान का तो लिया जाता है पर सन्१७३५ में दिल्ली में जन्मे और पले-बढ़े नजीर अकबरावादी एक ऐसे कृष्ण भक्त कवि हुए जिन्होंने प्रतिस्पर्धा में सबको पीछे छोड़ दिया।इनका वास्तविक नाम शेखवली मोहम्मद था जो उर्दू के एक नामचीन कवि होने के साथ-साथ श्रीकृष्ण केअनन्य भक्त थे।श्रीकृष्ण के वात्सल्य वर्णन में उन्होंने जिस तन्मयऔर समर्पण की भक्ति की धारा प्रवाहित की है वह नि:सन्देह सम्पूर्ण कृष्ण भक्ति साहित्य में अनूठा है।यों तो महाकवि सूरदास कृष्ण के बाल-वर्णन के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं पर नजीर अकबरावादी द्वारा किया गया कृष्ण का बाल-वर्णन स्वाभाविकता में स्पर्धाविहीन है।महाकवि सूर जहॉ कृष्ण में सामान्य बालक के गुणों का वर्णन करते -करते उनके अलौकिक रूप का दर्शन करा जाते हैं वही नजीर अकबरावादी कृष्ण के बाल रूप के वर्णन में एक सामान्य बालक के रूप की मर्यादा का उल्लंघन नहीं होने देते हैं।वर्णन की यह स्वाभाविकता नजीर साहब को भक्त कवि के उस मुकाम पर पहुंचा देता है जहां सब पीछे छूट जाते हैं।इनके द्वारा किया गया कृष्ण के भावपूर्ण बाल- वर्णन के एक-एक वंद से आस्था की ऐसी किरणें फूटती हैं जिनसे एक भक्त के हृदय के बंद द्वार का कपाट सहजता से खुल जाता है और उसके हृदय का कोना- कोना प्रतिभाषित हो जाता है।ऐसी विलक्षण भावुकता तो रसखान में भी नहीं मिलती है।कृष्ण के प्रति रसखान की भक्ति एक भक्त की अपने भगवान के प्रति अंधभक्ति है पर नजीर अकबरावादी की भक्ति अंधभक्ति की सीमाओं को लांघकर उनकी महिमा को संसार से जोड़कर देखती है।वे कृष्ण को समस्त संसार का पुरौधा मानते हैं।पर रसखान उनकी भक्ति में तन्मय होकर समर्पण के लिए इतने विह्वल हो जाते हैं कि कौए के भाग्य की सराहना करने लग जाते हैं—“काग के भाग कहा कहिये हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी “।औरमहाकवि सूर कृष्ण के बालरूप का वर्णन करते हुए इतने रसलीन हो जाते हैं कि उनके वर्णन में एक सामान्य बालक की छवि बनते- बनते ब्रह्म का रूप दृश्यमान होने लग जाता है।इसीलिए इनका वात्सल्य-वर्णन हृदयग्राही होते हुए भी सामान्य भाव-भूमि से ऊपर उठ जाता है।किन्तु,नजीर साहब ने कृष्ण के बाल्यकाल का ऐसा लोकाश्रित और नयनाभिराम वर्णन किया है जिसकी स्वाभाविकता पाठकों के चित्त से कभी नहीं उतरती है।जरा इनके वर्णन की सवाभाविकता देखिए–

“नन्द को यशोदा बालक को वॉ हाथों छॉव में रखते थे

नित प्यार करें तन मन वारें सुथरी अबरन गहने बनकें

जी बहलाते मन परचाते और खूब खिलौने मंगवाते

हर शाम झुलाते पालने में और इधर उधर बैठाते

कर याद नजीर अब हर सॉसत उस पालने और झूले की

आनन्द से बैठो चैन करो जय बोलो कान्ह झंडूले की।”

नजीर साहब कृष्ण की बाललीला के एक – एक दृश्य की स्वाभाविकता और चपलता का वर्णन किस प्रकार करते हैं जरा इस वंद में देखिये—

“थे घर जो ग्वालिनों के घर से जा बजा

जिस घर को खाली देखा उसी में जा फिरा

माखन,मलाई,दूध जो पाया सो खा लिया

कुछ खाया,कुछ खराब किया,कुछ गिरा दिया

ऐसा था बांसुरी बजैया का बालपन

क्या-क्या कहूं किशन कन्हैया का बालपन ।

कोठी में होवे तो फिर उसी को ढिढोरना

मटका में हो तो उसी में मुंह बोरना

ऊंचा हो तो कंधे पे चढ़कर न छोड़ना

पहुंचा न हाथ तो उसे मुरली से फोड़ना

ऐसा था बांसुरी बजैया का बालपन

क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन।

गर चोरी करते आ गई ग्वालन कोई वहां

औ आकर उसे पकड़ लिया तो उससे बोले हॉं

मैं तो तेरे दही की उड़ाता था मक्खियां

खाता नहीं मैं इसकी निकाल रहा था चींटियां

ऐसा था बांसुरी बजैया का बालपन

क्या क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन।”

यह तो हुआ नजीर अकबरावादी द्वारा श्रीकृष्ण के बालपन का वर्णन।महाकवि सूर की तरह इन्होंने उनकी लीलाओं का भी मधुमय वर्णन किया है जिससे अवतारवाद में उनकी आस्था की पुष्टि होती है जबकि मुसलमान अवतारवाद को नहीं मानते हैं।वे श्रीकृष्ण को सबसे बड़ा अवतारी घोषित करते हुए कहते हैं–

“है शाद नजीर अब हर दम वो जो हरि के नित बलिहारी हैं

श्रीकृष्ण कहौ श्रीकृष्ण कहौ श्रीकृष्ण बड़े अवतारी हैं।”

जिस प्रकार सूर ने कृष्ण की मुरली को कार्यसाधिका माया के रूप में चित्रित किया है उसी प्रकार का चित्रण नजीर साहब ने अपने इस वंद में किया है,जरा देखिए कृष्ण की मुरली की जादुई शक्ति का चमत्कार–

“मोहन की बांसुरी के मैं क्या क्या करूं जतन

लै उसके मन की मोहिनी धुन उसकी चितहरन

इस बांसुरी की आन के जिस जा हुआ वचन

क्या चल पवन नजीर पखेरू व क्या हिरन

सब सुनने वाले कह उठे जय-जय हरि-हरि

ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसुरी।

इतना ही नहीं बेमिसाल गंगा-जमुनी संस्कृति की भावधारा भारत-भूमि पर प्रवाहित करने के लिए इन्होंने महादेव तथा दुर्गा आदि देवी-देवताओं का वर्णन करते हुए विद्यापति की तरह शैव और वैष्णव में समन्वय भी दिखलाया है,जिसके नेपथ्य में इनका उद्देश्य हिन्दू-मुुसलमान के धार्मिक झगड़े की बुनियाद को खत्म करना रहा है।अपनी धार्मिक निरपेक्षता,भावात्मक राष्ट्रीय एकता,निष्पक्ष जीवन-दृष्टि तथा असाधारण काव्य-प्रवृतियों के जल से साम्प्रदायिक कलुषता को धोने तथा हिन्दुस्तान के आवाम को हिन्दुस्तानी होने के प्रेम का पाठ पढ़ाने का काम किया है।

श्रीकृष्ण अवतरणोत्सव के ऐसे पावन दिवस पर श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन तमाम भक्त कवियों और कथावाचकों को सादर नमन! राधे!राधे!

यह पोस्ट 3 सितम्बर 2018 का है किन्तु इसकी प्रासांगिकता को लक्ष्य कर श्रीकृष्ण अवतरणोत्सव की पूर्व संध्या पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है।

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दिनांक 15 अगस्त को शिक्षा विभाग से संबंधित उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषित पहल के संदर्भ में समिति के व्यापक कार्यादेश एवं कार्यक्षेत्र में राज्य की संपूर्ण स्कूली एवं उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े नीतिगत, संरचनात्मक एवं सेवा-संबंधी विषयों को समाहित किए जाने के संबंध में।

वित्त रहित शिक्षा नीति की समाप्ति के उपरांत परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान से आच्छादित माध्यमिक, इंटरमीडिएट एवं डिग्री महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों के बकाया वेतनानुदान के एकमुश्त भुगतान तथा सम्मानजनक नियमित वेतन-संरचना निर्धारित किए जाने के संबंध में अनुरोध ।

बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षक-निर्माण, शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता एवं एकरूपता तथा शैक्षणिक शोध एवं नवाचार को सुदृढ़ करने हेतु पृथक् “राज्य शिक्षण-प्रशिक्षण विश्वविद्यालय” की स्थापना के संबंध में अनुरोध।