‘गांधारी’ : पट्टी आँखों पर है, प्रश्न चेतना में
डॉ. प्रेमचन्द पाण्डेय जी का ‘गांधारी’ पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात मुझे आकर्षित करती है, वह यह है कि कवि ने महाभारत की एक अत्यंत परिचित स्त्री को उसके परिचित विशेषणों—पतिव्रता, धृतराष्ट्र की पत्नी, सौ कौरवों की माता—के भीतर बंद नहीं रहने दिया। उन्होंने गांधारी को स्वयं बोलने दिया है। इसीलिए यह काव्य महाभारत की कथा का मात्र पुनर्कथन नहीं रह जाता; वह एक ऐसी स्त्री की आत्मस्वीकृति, आत्मप्रश्न और आत्मसाक्ष्य बन जाता है, जिसके जीवन के अधिकांश बड़े निर्णय दूसरे लोगों ने लिए, किंतु उनके परिणाम उसने स्वयं भोगे।
कवि ने अपने आत्मकथ्य में भी स्पष्ट किया है कि उन्हें लगा, गांधारी के चरित्र के पास “कहने-सुनने के लिए बहुत कुछ” है और उसकी निजी व्यथा वस्तुतः व्यापक नारी-व्यथा से जुड़ती है। यही दृष्टि पूरी रचना की वैचारिक भूमि बनती है।
काव्य का प्रथम सर्ग इस दृष्टि से रोचक है कि गांधारी तुरंत मंच पर नहीं आती। प्रकृति, कली, भ्रमर और बरगद के संवाद के माध्यम से कवि पहले प्रेम, सौंदर्य, समर्पण, स्त्री और पुरुष-दृष्टि का वैचारिक वातावरण निर्मित करते हैं। यह आरंभ पहली दृष्टि में मुख्य कथा से अलग लग सकता है, किंतु आगे बढ़ने पर उसका प्रयोजन स्पष्ट होता है—गांधारी की कथा सुनने से पहले कवि पाठक को उस प्रश्नभूमि में ले जाना चाहते हैं जहाँ स्त्री केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, स्वयं अपनी चेतना और अस्मिता वाली मनुष्य है।
इसीलिए आरंभिक सर्ग में नारी पर होने वाले अन्याय की चर्चा पौराणिक उदाहरणों से वर्तमान तक आती है। भ्रूण में बेटी की हत्या से लेकर गार्गी, मैत्रेयी, घोषा और झाँसी की रानी तक का स्मरण करके कवि गांधारी की कथा को केवल द्वापर में नहीं रहने देते। यह कृति की शक्ति भी है और उसके स्वरूप को समझने की कुंजी भी—यह महाभारत की गांधारी के माध्यम से आज की स्त्री को भी देखती है।
दूसरे सर्ग से गांधारी स्वयं अपनी कथा का द्वार खोलती है। बालिका गांधारी का खेलना, गेंद का जल में जाना, संकट में पड़ना और शकुनि का सहायता न करना—ये प्रसंग शकुनि के भावी चरित्र का एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक पूर्वाभास बनते हैं। यहाँ कवि पौराणिक चरित्रों को नियति द्वारा पहले से तैयार खलनायक और नायिका मान लेने के बजाय उनके व्यक्तित्व की जड़ें बचपन में खोजने का प्रयास करते हैं। साहित्यिक दृष्टि से यह प्रयोग उल्लेखनीय है।
तीसरे सर्ग में शिव-आराधना और सौ पुत्रों के वरदान का प्रसंग आता है। यहीं काव्य में एक बड़ी विडंबना जन्म लेती है—जो वरदान भविष्य की गांधारी के लिए सुख का आश्वासन होना चाहिए था, वही अंततः उसके जीवन के सबसे विराट दुःख की भूमिका बन जाता है। इसलिए सौ पुत्र केवल मातृत्व की समृद्धि नहीं हैं; वे भविष्य में सौ गुना विस्तृत होने वाली मातृ-वेदना की छाया भी हैं।
परंतु काव्य का सबसे विचारोत्तेजक मोड़ गांधारी के विवाह के प्रसंग में आता है। स्वयंवर और अपना जीवन-साथी चुनने की संभावना सामने आती है, लेकिन स्त्री के उस अधिकार पर परिवार और सत्ता की संरचना भारी पड़ती है। गांधारी स्वयं प्रश्न करती दिखाई देती है कि युगों से पुरुष नारी के अधिकार क्यों हरते आए हैं। यहाँ कवि पौराणिक घटना को आधुनिक स्त्री-अधिकार के प्रश्न में रूपांतरित कर देते हैं।
भीष्म का ससैन्य गांधार पहुँचना और जन्मांध धृतराष्ट्र के लिए गांधारी का हाथ माँगा जाना इसीलिए केवल विवाह-प्रसंग नहीं रह जाता; वह सत्ता और स्त्री की इच्छा के टकराव का प्रसंग बन जाता है। आलोचनात्मक भूमिका में भी इसी बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि गांधारी की आँखों पर पट्टी बाँधना केवल पतिव्रता का प्रदर्शन मान लेना पर्याप्त नहीं; उसमें एक मौन प्रतिरोध भी पढ़ा जा सकता है।
मेरे लिए इस काव्य की केंद्रीय छवि यही नेत्रपट्टी है।
परंपरा ने प्रायः कहा—पति संसार नहीं देख सकता तो पत्नी भी संसार नहीं देखेगी। पाण्डेय जी की गांधारी के संदर्भ में प्रश्न इससे आगे जाता है—क्या यह समर्पण था? विरोध था? आहत अस्मिता की प्रतिक्रिया थी? या इन सबका जटिल मिश्रण?
यहीं गांधारी आधुनिक पाठक के लिए जीवित हो उठती है। आँखों पर पट्टी बाँधने वाली स्त्री की अंतरदृष्टि बंद नहीं होती। वह देखती रहती है—बिना आँखों के। अपने विवाह की विडंबना, शकुनि का छल, धृतराष्ट्र की दुर्बलताएँ, पुत्रों का अहंकार, राजसत्ता की अंधता और अंततः युद्ध की विभीषिका—सब उसके भीतर दर्ज होते जाते हैं।
हस्तिनापुर पहुँचने के बाद भी वैभव उसे मानसिक शांति नहीं देता। राजमहल, सेवा, संपन्नता—सब कुछ उपलब्ध है, फिर भी चिंता और उदासी बनी रहती है। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक बिंदु है। बाह्य वैभव किसी स्त्री की आंतरिक स्वतंत्रता और संतोष का विकल्प नहीं हो सकता।
काव्य जैसे-जैसे महाभारत के परिचित घटनाक्रम की ओर बढ़ता है, उसका स्वर व्यक्तिगत व्यथा से पारिवारिक और फिर सभ्यतागत त्रासदी की ओर विस्तृत होता जाता है। शकुनि की प्रतिशोधाग्नि, छल-प्रपंच और सत्ता की राजनीति को कवि उस विनाश की क्रमिक तैयारी के रूप में देखते हैं जो अंततः कुरुक्षेत्र तक पहुँचती है।
लेकिन यहाँ भी गांधारी केवल कौरवों की माता बनकर अपने पुत्रों का पक्ष नहीं लेती। यही चरित्र की जटिलता है। उसमें ममता है, पुत्रमोह है, आक्रोश है, विवशता है, किंतु साथ ही धर्म-अधर्म का बोध भी है। इसी कारण युद्ध के बाद उसका दुःख एक खलपक्ष की पराजित माता का दुःख नहीं रहता—वह मातृत्व की सार्वभौम त्रासदी बन जाता है।
युद्धोत्तर अंशों में काव्य की करुणा अपने चरम पर पहुँचती है। महाविनाश समाप्त हो चुका है, किंतु युद्धभूमि में स्त्रियों का विलाप शेष है। गांधारी कुरुक्षेत्र जाती है; राजमहल की विधवाएँ अपने मृत पतियों के निकट विलाप करती दिखाई देती हैं। यहाँ युद्ध विजय और पराजय के राजनीतिक अर्थों से बाहर निकल जाता है। प्रश्न यह रह जाता है—अंततः युद्ध जीतता कौन है?
राज्य किसी को मिल जाता है, किंतु माताओं के पुत्र, पत्नियों के पति और बच्चों के पिता लौटकर नहीं आते।
यही वह स्थान है जहाँ ‘गांधारी’ केवल पौराणिक आख्यान नहीं रहता, बल्कि युद्ध-विरोधी मानवीय दस्तावेज जैसा प्रभाव उत्पन्न करता है।
कृष्ण के प्रति गांधारी का रोष भी इसी संदर्भ में समझना चाहिए। वह ईश्वर से प्रश्न करने का साहस रखने वाली स्त्री है। अपने पुत्रों के विनाश के सामने वह केवल नियति स्वीकार नहीं करती; वह उत्तर माँगती है। उसके प्रश्नों में मातृत्व की असहायता भी है और नैतिक प्रतिवाद भी। दूसरी ओर कृष्ण का पक्ष युद्ध को रोकने के प्रयासों और कौरव-पक्ष की हठधर्मिता की ओर संकेत करता है। � इस प्रकार काव्य दोषारोपण को एकरेखीय न रखकर संवाद की संभावना पैदा करता है।
कृति के अंतिम भाग का स्वर फिर बदलता है। राजमहल, पुत्र, सत्ता, प्रतिशोध और युद्ध पीछे छूट जाते हैं। वानप्रस्थ में गंगा-स्नान, वेद-शास्त्र का श्रवण-मनन और संसार की नश्वरता का बोध गांधारी को एक दूसरी मानसिक भूमि पर ले आता है। और अंततः दावानल।
यह अंत मुझे विशेष रूप से अर्थवान लगा। गांधारी के जीवन की शुरुआत जिस राजसी संसार में हुई थी, उसका अंत किसी राजकीय वैभव में नहीं, प्रकृति के विराट अग्नि-तत्त्व के सामने होता है। अंतिम क्षण में अतीत आँखों के सामने घूमता है और मृत्यु की स्वीकृति सामने आती है; धृतराष्ट्र के साथ गांधारी और कुन्ती भी अग्नि की ओर बढ़ते हैं।
इस पूरे काव्य को देखकर मुझे लगता है कि डॉ. प्रेमचन्द पाण्डेय जी की सबसे बड़ी उपलब्धि गांधारी को ‘घटना’ से ‘व्यक्ति’ में बदलना है।
महाभारत में हम प्रायः उसे संबंधों से पहचानते हैं—सुबाल की पुत्री, शकुनि की बहन, धृतराष्ट्र की पत्नी, दुर्योधन की माता। यहाँ वह बार-बार इन संबंधों से बाहर निकलकर कहती प्रतीत होती है—मेरी अपनी भी एक कथा है।
और शायद इसी कारण आत्मालापीय शैली इस कृति के लिए बहुत उपयुक्त सिद्ध हुई है। भूमिका में भी इसे ‘मैं’ अथवा आत्मालापीय शैली का प्रबंध-काव्य कहा गया है। पाठक गांधारी के बारे में नहीं सुनता, बहुत-से स्थानों पर गांधारी से सुनता है। दोनों में बड़ा अंतर है ।
शिल्प की दृष्टि से पूरी रचना को ‘सार’ छंद में बाँधना कवि के छंद-अनुशासन को प्रमाणित करता है। इतने विस्तृत आख्यान में एक ही छंद का निर्वाह आसान नहीं होता। दूसरी ओर इसी कारण कुछ स्थलों पर कथात्मक विस्तार और प्रत्यक्ष कथन कविता पर भारी भी पड़ता है। कहीं-कहीं कवि चरित्र और दृश्य को स्वयं बोलने देने के बजाय अपना सामाजिक निष्कर्ष अधिक स्पष्ट रूप से सामने रख देते हैं। यदि कुछ स्थानों पर व्याख्या कम और नाटकीय दृश्यात्मकता अधिक होती, तो काव्य की व्यंजना और तीव्र हो सकती थी।
इसी प्रकार शकुनि के चरित्र को आरंभ से ही अत्यधिक नकारात्मक संकेतों में प्रस्तुत किया गया है। कथा की दृष्टि से इसका औचित्य है, लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यदि उसके भीतर प्रतिशोध पैदा होने की प्रक्रिया और गांधार-कुरु संबंधों की राजनीतिक जटिलता को कुछ अधिक स्थान मिलता, तो उसका चरित्र और बहुआयामी हो सकता था।
फिर भी ये बातें कृति की उपलब्धि को कम नहीं करतीं। उलटे यह बताती हैं कि ‘गांधारी’ ऐसी रचना है जिस पर केवल प्रशंसात्मक टिप्पणी नहीं, गंभीर साहित्यिक बहस भी की जा सकती है।
मुझे विशेष रूप से अच्छा लगा कि कवि ने स्त्री-विमर्श को आधुनिक शब्दावली का आरोपण बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसे गांधारी के जीवन की घटनाओं—विवाह में उसकी इच्छा, नेत्रपट्टी, मातृत्व, पारिवारिक सत्ता, पुत्रों के आचरण, युद्ध और पुत्र-वियोग—से जोड़ने की कोशिश की है। स्वयं कवि भी गांधारी की निजी पीड़ा को व्यापक नारी-व्यथा के रूप में देखने की बात कहते हैं।
इसलिए मेरे लिए ‘गांधारी’ का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि गांधारी ने आँखों पर पट्टी क्यों बाँधी, बल्कि यह है कि जिस समाज ने उसकी आँखों पर पट्टी देखी, क्या उसने कभी उस पट्टी के पीछे की स्त्री को देखने का प्रयास किया?
डॉ. प्रेमचन्द पाण्डेय जी की यह कृति उसी अदृश्य स्त्री को दृश्य बनाने का प्रयास है। यहाँ गांधारी केवल सौ पुत्रों को खो चुकी शोकाकुल माँ नहीं है; वह बेटी है, बहन है, पत्नी है, माँ है, राजमाता है, प्रश्नाकुल स्त्री है, प्रतिरोध करती चेतना है और अंततः जीवन की नश्वरता को स्वीकार करती एक मनुष्य है।
आँखों पर पट्टी बाँध लेने के बाद भी जिसकी चेतना देखती रही—पाण्डेय जी की ‘गांधारी’ की वास्तविक शक्ति मेरे लिए वहीं है।
इस सार्थक, श्रमसाध्य और विचारोत्तेजक प्रबंध-काव्य के लिए डॉ. प्रेमचन्द पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई एवं साहित्यिक साधुवाद। यह कृति गांधारी को पुनः पढ़ने के साथ-साथ हमें यह भी सोचने के लिए विवश करती है कि महाकाव्यों के विराट पुरुष-आख्यानों के बीच दबे हुए स्त्री-स्वरों को हमने वास्तव में कितना सुना है।
रंजन
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री रंजन कुमार जी, भागलपुर के फेसबुक वॉल से साभार)














