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कथेतर गद्य की एक पठनीय पुस्तक 

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कथेतर गद्य की एक पठनीय पुस्तक 

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प्रो श्री भगवान सिंह स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग,तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं।इनकी शिक्षा-दीक्षा पटना विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई है। डाॅ नामवर सिंह के निर्देशन में शोध कार्य किया। वे कई साहित्यिकों के सम्पर्क में आए।कई सहपाठियों का साहचर्य मिला जो आगे चलकर बड़े राजनेता,प्रशासनिक अधिकारी और अकादमिशियन बने।’स्मृतियों में जीवन- राग’ में इन प्रसंगों का दिलचस्प वर्णन है।नामवर सिंह,दिग्विजय सिंह,रवीन्द्र कालिया,कृष्णदत पालीवाल,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,सदानंद गुप्त,अनुपम मिश्र और देवी प्रसाद त्रिपाठी का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण किया गया है।पटना की समिधा-मित्र मंडली का विवरण तो लाजवाब है।’और अंत में स्मृति शेष माॅ ‘ ने तो मन को मथ दिया,अपनी मां बार-बार याद आई।

भगवान जी बड़े जीवटवाले हैं।पटना विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एम ए करने के बाद पुनपुन काॅलेज में अस्थाई व्याख्याता नियुक्त हुए। स्थाई नियुक्ति की अंतर्वीक्षा में नहीं पहुंच सकने के कारण अस्थाई नौकरी भी चली गई। तब तक शादी हो चुकी थी।एक बेटा भी आ चुका था।उस विकट दौर में जे एन यू जाकर हिन्दी से एम ए करने का साहसिक निर्णय लिया।फिर पत्नी को दो वर्षों के बाद वहीं एम ए में नामांकन करवाया।मैरिड हाॅस्टल मिलने के पूर्व की महीनों तक अपने साथ पेरियार हाॅस्टल में रखा।तब जे एन यू में इस तरह के सहवास का खूब प्रचलन था।काफी विलंब से नौकरी लगी,पर वे टूटे नहीं।कई पारिवारिक परेशानियाँ आईं जिनका मुकाबला किया।तब जे एन यू के परिवेश में वामपंथियों का बोलबाला था।पर वे महात्मा गाँधी और तुलसीदास पर डटे रहे।इस वैचारिक दृढता का विकास उनके लेखन में बखूबी हुआ।

भगवान जी सीवान के निखती कलां गांव के मूल निवासी हैं।नौकरी भागलपुर में लगी।यह वरदान सिद्ध हुआ। पारिवारिक झंझटों से दूर अध्यापन और लेखन में सन्नद्ध रहे।पुस्तक में कृतज्ञता-भाव प्रबल है।भला हो प्रो अनिल कुमार झा का जिनके सौजन्य से पुस्तक पढने को मिली।

-प्रो. चंद्रभानु प्रसाद सिंह, अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार।

 

(फेसबुक वॉल से साभार)

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