छात्रशक्ति से राष्ट्रशक्ति तक : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की 78 वर्षों की राष्ट्रनिर्माण यात्रा।
श्री पिन्टु यादव
पूर्व कार्यकर्ता, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), मधेपुरा, बिहार।
भारत के इतिहास में जब-जब युवा शक्ति जागृत हुई है, तब-तब राष्ट्र ने नई दिशा और नई ऊर्जा प्राप्त की है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर लोकतंत्र की रक्षा, सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा सुधार और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण तक विद्यार्थियों ने सदैव अग्रणी भूमिका निभाई है। इसी ऐतिहासिक परंपरा को संगठित रूप देने के उद्देश्य से 9 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की स्थापना हुई। आज 78 वर्षों की अपनी गौरवशाली यात्रा पूरी कर चुका यह संगठन केवल विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन ही नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी छात्र आंदोलन, नेतृत्व निर्माण की प्रयोगशाला और सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बन चुका है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मूल मंत्र “ज्ञान, शील और एकता” केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र दृष्टि है। ज्ञान व्यक्ति को सक्षम बनाता है, शील उसे चरित्रवान बनाता है और एकता उसे राष्ट्रनिर्माण का सहभागी बनाती है। परिषद का विश्वास है कि “छात्र कल का नहीं, आज का नागरिक है” और “छात्रशक्ति ही राष्ट्रशक्ति है।” यही विचार परिषद को अन्य छात्र संगठनों से अलग पहचान प्रदान करता है।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बताया था। उन्हीं के विचारों से प्रेरित होकर परिषद ने शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि चरित्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय चेतना और नेतृत्व विकास का साधन बनाया। यही कारण है कि आज परिषद के लाखों पूर्व कार्यकर्ता प्रशासन, शिक्षा, न्यायपालिका, सेना, विज्ञान, उद्योग, पत्रकारिता, सामाजिक सेवा, राजनीति और उद्यमिता सहित अनेक क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व निभा रहे हैं।
पिछले लगभग आठ दशकों में परिषद ने केवल छात्रहित की आवाज़ नहीं उठाई, बल्कि राष्ट्रीय जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर भी रचनात्मक नेतृत्व किया। शिक्षा के व्यवसायीकरण का विरोध, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागरण, आपदा राहत कार्य, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान अभियान, महिला सुरक्षा, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता जैसे विषय परिषद की कार्यशैली के केंद्र में रहे हैं। बिहार में बड़े पैमाने पर आयोजित रक्तदान अभियान तथा आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी विद्यार्थियों के लिए संचालित स्वामी विवेकानंद निःशुल्क शिक्षा शिविर सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
राष्ट्रीय एकात्मता को मजबूत करने की दिशा में परिषद का Students’ Experience in Inter-State Living (SEIL) कार्यक्रम भारतीय छात्र आंदोलन की सबसे प्रेरणादायक पहलों में से एक है। 1966 से चल रही इस योजना के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत और देश के अन्य राज्यों के विद्यार्थियों के बीच सांस्कृतिक, सामाजिक और भावनात्मक संवाद स्थापित हुआ। “मेरा भारत, मेरा घर” की भावना को व्यवहार में उतारने वाला यह कार्यक्रम आज भी राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम बना हुआ है।
समय के साथ चुनौतियाँ बदलती रही हैं। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, कौशल विकास, स्टार्टअप संस्कृति, मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता जैसे अनेक नए विषय हमारे सामने हैं। ऐसे समय में छात्र संगठनों की भूमिका केवल आंदोलन तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण के नए आयामों पर भी समान रूप से कार्य करना होगा। इस संदर्भ में परिषद की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि उसने समयानुकूल स्वयं को निरंतर विकसित किया है।
मेरे लिए यह अत्यंत गर्व और सौभाग्य का विषय है कि मुझे लगभग एक दशक तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बिहार का कार्यकर्ता एवं सदस्य रहने का अवसर मिला। यह मेरे जीवन का ऐसा अध्याय है जिसने मेरी सोच, कार्यशैली और व्यक्तित्व को नई दिशा दी। परिषद ने मुझे केवल संगठन में कार्य करना नहीं सिखाया, बल्कि राष्ट्र प्रथम की भावना, अनुशासन, सेवा, नेतृत्व, टीम भावना, समय प्रबंधन, योजना बनाकर कार्य करना तथा कठिन परिस्थितियों में भी समाधान खोजने का आत्मविश्वास प्रदान किया।
वर्ष 2016-17 में जब मैं परिषद से जुड़ा, तब शायद मुझे भी यह अनुमान नहीं था कि यह संगठन मेरे जीवन का आधार बन जाएगा। परिषद ने मुझे सिखाया कि व्यक्ति से बड़ा विचार होता है, पद से बड़ा दायित्व होता है और राष्ट्र सर्वोपरि होता है। आज यदि मैं समाज जीवन में सक्रिय हूँ, युवाओं के बीच कार्य कर रहा हूँ और राष्ट्रहित के विषयों पर सकारात्मक सोच रखता हूँ, तो उसमें विद्यार्थी परिषद के संस्कारों का सबसे बड़ा योगदान है। परिषद ने मेरे भीतर यह विश्वास जगाया कि युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान का भी निर्माता है।
आज विकसित भारत के अमृतकाल में देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि यह युवा शक्ति शिक्षा, संस्कार, सेवा, नवाचार, उद्यमिता और राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर आगे बढ़े, तो विकसित भारत का लक्ष्य निश्चित रूप से प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए आवश्यक है कि विद्यार्थी केवल परीक्षा और रोजगार तक सीमित न रहें, बल्कि समाज, संस्कृति, संविधान, पर्यावरण, तकनीक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति भी समान रूप से जागरूक बनें। यही विद्यार्थी परिषद की मूल भावना भी है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की 78 वर्षों की यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों का कार्य नहीं होता; इसमें विद्यार्थियों, युवाओं और समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक की समान भागीदारी आवश्यक है। चरित्रवान विद्यार्थी ही सशक्त समाज और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। इसलिए आज आवश्यकता केवल अच्छे विद्यार्थियों की नहीं, बल्कि अच्छे नागरिकों की भी है।
स्थापना दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य का संकल्प है। आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी “ज्ञान, शील और एकता” के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने, शिक्षा को चरित्र निर्माण का माध्यम बनाने, सेवा को जीवन का उद्देश्य मानने तथा “राष्ट्र प्रथम” की भावना के साथ विकसित, आत्मनिर्भर, समरस और विश्वगुरु भारत के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान देने का संकल्प लें।
यही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना का उद्देश्य था, यही उसकी 78 वर्षों की साधना है और यही आने वाले भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।
भारत माता की जय!
वन्दे मातरम्!












