आज प्रोफ़ेसर राधावल्लभ त्रिपाठी का जन्मदिन है। पिछले एक दशक से मैं उन्हें सुनता रहा हूँ। पढ़ता रहा हूँ। जिस तैयारी के साथ वे अपने विषय पर बोलते हैं, वह स्तुत्य है।
अभी कुछ दिन पहले मैं एक सेमिनार में बनारस गया था तो उन्होंने 16 मुद्रित पृष्ठों का एक लेख श्रोताओं के बीच वितरित करने के लिए दिया था। उनकी हमेशा आशा रहती है कि वे जो बोल रहे हैं, उसे कोई प्रश्नांकित करे, सवाल पूछे लेकिन इसके लिए जिस स्तर की तैयारी चाहिए, वह आज के ज़माने में अविश्वसनीय सी लगती है। कोई बात न जानने पर वे बालसुलभ तरीके से कह भी देते हैं कि मुझे नहीं आता।
इधर के वर्षों में उन्होंने संस्कृत भाषा को लेकर काफी ठोस और विचारोत्तेजक निष्कर्ष दिए हैं। वे यह कहते हैं ‘संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है- यह विचार ऐतिहासिक रूप से खरा नहीं उतरता। न ही कोई एक भाषा किसी दूसरी भाषा को जन्म नहीं दे सकती है’। ‘भाषाओं का एक संसार होता है, जहाँ वे जन्म लेती हैं और दूसरी अन्य भाषाओं से लेनदेन करती हैं।’
1960 के दशक से ही वे लगातार सृजनरत हैं और संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज़ी में विपुल लेखन किया है। एक दौर में उन्होंने कहानियाँ भी लिखी थीं और अभी भी कविताएं लिखते हैं लेकिन उनकी आलोचक और अनुसंधानकर्त्ता की छवि इतनी मुकम्मल और शक्तिशाली है कि इसके आगे उनका यह रूप कहीं छुप जाता है।
कोविड के बाद उन्होंने यूट्यूब का जिस तरह से वैदुष्यपूर्ण इस्तेमाल किया है, वह तो नौजवानों को भी बगलें झाँकने पर मजबूर करता है। वे 30 मिनट से लेकर 1 घण्टे तक इन वीडियोज़ में बिना इधर उधर भटके हुए अपनी बात रखते जाते हैं। उसे सुनना उनकी कक्षाओं में बैठने का आनंद पाना है।
वे भोपाल, शिमला और दिल्ली में जहाँ भी रहे, उसे जगर-मगर करते रहे। उन्हें लंबी आयु मिले, वे स्वस्थ रहें और सृजनरत रहें। 💐
इतिहासक #Rama_Shankar_Singh के फेसबुक वॉल से साभार।












