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श्रद्धांजलि सभा एवं कविता पाठ का आयोजन

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*श्रद्धांजलि सभा एवं कविता पाठ का आयोजन*

राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस), बीएनएमयू, मधेपुरा के तत्वावधान में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी (25 दिसम्बर, 1924–16 अगस्त, 2018) के 102वें जन्मोत्सव पर गुरूवार को ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में श्रद्धांजलि सभा एवं कविता पाठ का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्य प्रो. कैलाश प्रसाद यादव ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री का पद तीन बार संभाला। वे पहले 13 दिन के लिए 16 मई 1996 से 1 जून 1996 तक। फिर लगातार 19 मार्च 1998 से 12 अक्टूबर 1999 और फिर 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमन्त्री रहे।

उन्होंने बताया कि अटल ने प्रधानमंत्री के रूप में देश को मजबूत बनाने में अहम योगदान दिया। उन्होंने जय जवान, जय किसान एवं जय विज्ञान का नारा देकर विकसित भारत की आधारशिला रखी।

मुख्य अतिथि प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ललन प्रसाद अद्री ने कहा कि अटल एक हिन्दी कवि, पत्रकार एवं एक राजनेता थे। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में एक थे, और 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने लम्बे समय तक राष्‍ट्रधर्म, पांचजन्य (पत्र) और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया।

समन्वयक डॉ. सुधांशु शेखर ने कहा कि अटल व्यक्ति से बड़ा संगठन और संगठन से बड़ा राष्ट्र के सिद्धांत पर चलते थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया था।

*कविता पाठ का आयोजन*

इस अवसर पर वरिष्ठ एवं युवा कवियों द्वारा कविता पाठ के माध्यम से अटल को श्रद्धांजलि दी गई। सर्वप्रथम शोधार्थी नन्हीं
कुमारी ने अटल जी की कविता ‘आओ फिर से दिया जलाएं’ का पाठ किया। पार्वती विज्ञान महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. आलोक ने अपनी कविता के माध्यम से आधुनिक जीवन पर करार व्यंग्य किया। यथा, “जानकारियों के जखिरों षर बैठे हैं हमपर पडोसियों से अंजान हैं।”

प्रो. सिद्धेश्वर काश्यप ने राष्ट्रीयता से ओतप्रोत कविता सुनाई। उन्होंने आह्वान किया, “हिंदुस्तां की सजदा में इंकलाबी-सा जलना है। मां की खिदमत में केवल बढते हुए, सम्हलना है।” डॉ. मणिभूषण वर्मा ने अपनी कविता के माध्यम से श्रम के महत्व को उजागर किया।

प्रो. विनय कुमार चौधरी ने कहा, “हम तो बिगडे को इंसान बनाते हैं। पत्थर को गढ़ के भगवान बनाते हैं।” अंत में सुधांशु शेखर ने अटल की कविता उंचाई का पाठ किया। इसमें कहा गया है, “मेरे प्रभु मुझे उतनी ऊंचाई न देना। गैरों को गले न लगा सकूं, इतनी रूखाई मत देना।”

इस अवसर पर परीक्षा नियंत्रक डॉ. शंकर कुमार मिश्र, परिसंपदा पदाधिकारी शंभू नारायण यादव, शोधार्थी डॉ. सौरभ कुमार चौहान, प्रधान सहायक नारायण ठाकुर, सुनील कुमार, बबलू महतो, भारत प्रसाद यादव, रोहित कुमार, दीपक कुमार, चंदन कुमार आदि उपस्थित थे।

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