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स्वायत्तता के सवालों के बीच कुलपतियों की तानाशाही और विश्वविद्यालयों का भविष्य!

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स्वायत्तता के सवालों के बीच कुलपतियों की तानाशाही और विश्वविद्यालयों का भविष्य!
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गत दिनों बीएनएमयू, मधेपुरा में मनमाने तरीके से स्नातक स्तरीय अंगीभूत महाविद्यालयों के शिक्षकों को शोध-निदेशक बनने से वंचित करने का फरमान (पत्र) जारी कर दिया गया है। हमने इस फरमान को वापस लेने की मांग की थी और ऐसा नहीं होने की स्थिति में हम माननीय पटना उच्च न्यायालय, पटना की शरण में जाने की तैयारी कर रहे थे।

खैर, विश्वविद्यिलय ने संदर्भित पत्र तो नहीं लिया गया, आज पत्र से संबंधित एक अपेक्षित संशोधन जारी कर दिया गया है। इसलिए हम कोर्ट जाने का विचार त्याग रहे हैं।

लेकिन इस मामले ने हमें एक बार फिर विश्वविद्यालय व्यवस्था पर गंभीरतापूर्वक विचार करने को मजबूर कर दिया है। हमारे लिए यह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति, कुलसचिव, वित्त पदाधिकारी एवं परीक्षा नियंत्रक द्वारा भ्रष्टाचार आम बात हो ही गई है। दुर्योग से एकमात्र इस मामले में बीएनएमयू, मधेपुरा भी स्वर्ण पदक के साथ प्रथम स्थान का दावेदार है। यहां यह बात विशेष रूप से दुखदायी है कि चार दशक से अधिक समय तक विभिन्न महाविद्यालयों एवं स्नातकोत्तर विभागों में शिक्षक के रूप में कार्य करने वाले कुलपति एवं कुलसचिव शिक्षकों को प्रताड़ित एवं परेशान करने के नए-नए अवसर ढ़ूंढते रहते हैं। ये दोनों अपने कनीय शिक्षकों के प्रति घृणा एवं विद्वेष से भरे हुए हैं और मानवीय संवेदना के न्यूनतम स्तर को भी पार कर चुके हैं।

संप्रति विश्वविद्यालयों के स्वायत्तता की आड़ में कुलपति एवं कुलसचिव का भ्रष्टाचार तथा उनकी तानाशाही एवं मनमानी जारी है। आम शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के लिए स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं रह गया है। हम यह सिद्दत से महसूस कर रहे हैं कि इन परिस्थितियों ने ही बिहार सरकार को प्रस्तावित विश्वविद्यालय अधिनियम-2026 लाने का बहाना दे दिया है।‌

हम सभी इस अधिनियम के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन यदि हमारे नेतृत्व वर्ग ने इस अधिनियम की परिस्थितियों पर ध्यान नहीं दिया, तो हमें विद्यार्थियों एवं अभिभावकों की तो दूर आम शिक्षकों एवं कर्मचारियों का भी अपेक्षित समर्थन एवं सहयोग नहीं मिल सकेगा। फिर हमारे आंदोलन के कमजोर होते ही सरकार विश्वविद्यालयों को अपने नियंत्रण में लेने में सफल हो जाएगी। आगे आने वाले दिनों में कुलपति एवं कुलसचिव जैसे पदों को तथाकथित शिक्षकों की बजाय भारतीय प्रशासनिक सेवा या भारतीय पुलिस सेवा अथवा बिहार लोक सेवा आयोग (शिक्षा संवर्ग) के पदाधिकारियों के लिए आरक्षित कर दिया जाए, तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं!

अतः सभी शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को विश्वविद्यालयों और उसकी स्वायत्तता को बचाने के लिए अपने-अपने स्तर से दोहरे प्रयास करने की जरूरत है। हमें विश्वविद्यालयों को सरकार की कुदृष्टि से भी बचाना होगा और कुलपति एवं कुलसचिव के भ्रष्टाचार एवं तानाशाही को भी चुनौती देनी होगी। हम सब इसके लिए किस हद तक तैयार होंगे, उसी पर उच्च शिक्षा का भविष्य निर्भर करेगा!

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