सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय : डॉ. प्रतिभा कपाही
तकनीक और मानव जीवन: सुविधा, निर्भरता और संतुलन की चुनौती
सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग से युवाओं पर पड़ता है नकारात्मक प्रभाव
आरएम कॉलेज सहरसा की प्रतिभा कपाही ने समस्तीपुर में आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत की पत्र
सहरसा। बीआरबी कॉलेज समस्तीपुर में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में आरएम कॉलेज सहरसा की प्राध्यापिका डॉ. प्रतिभा कपाही ने आलेख प्रस्तुत की। टेक्नोलॉजी एंड ह्यूमन लाइफ: पर्सपेक्टिव्स एंड इंप्लीकेशंस विषय पर आयोजित इंटरनेशनल सेमिनार में आर एम कॉलेज सहरसा में साइकोलॉजी की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रतिभा कपाही ने सोशल मीडिया उपयोग और युवा: फोमो डिजिटल लत एवं व्यवहारगतपरिवर्तनों की भूमिका पर अपना आलेख प्रस्तुत की।
उन्होंने कहा कि आज का समय तकनीकी क्रांति का समय है। मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने मानव जीवन को जितना सरल और तेज बनाया है, उतना ही जटिल भी। एक ओर जहां तकनीक ने हमें वैश्विक स्तर पर जोड़ दिया है, वहीं दूसरी ओर यह हमारे सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने के तरीकों को गहराई से प्रभावित कर रही है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या तकनीक धीरे-धीरे हम पर हावी होती जा रही है। फोमो एक ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति को लगातार यह डर बना रहता है कि वह दूसरों की खुशियों, अवसरों या अनुभवों से वंचित न रह जाए। सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां और खुशहाल पल देखकर व्यक्ति स्वयं की तुलना करने लगता है, जिससे असंतोष, चिंता और मानसिक दबाव बढ़ता है। यही भावना लोगों को बार-बार मोबाइल चेक करने और लगातार ऑनलाइन बने रहने के लिए प्रेरित करती है।
डॉ. कपाही ने यह भी बताया कि यही प्रवृत्ति धीरे-धीरे डिजिटल लत का रूप ले लेती है, जिसमें व्यक्ति अपने डिजिटल उपकरणों के उपयोग को नियंत्रित नहीं कर पाता। इसके परिणामस्वरूप एकाग्रता में कमी, भावनात्मक अस्थिरता, दैनिक दिनचर्या में अव्यवस्था और सामाजिक संबंधों में गिरावट जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग युवाओं के मानसिक और व्यवहारगत स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि आज लोग छोटे-छोटे निर्णयों के लिए भी तकनीक पर निर्भर हो रहे हैं। इससे कार्य तो आसान हो जाता है, लेकिन स्वतंत्र सोच और समस्या-समाधान क्षमता कमजोर होने का खतरा भी बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि हालांकि, तकनीक के सकारात्मक पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह शिक्षा को सुलभ बनाती है, जानकारी तक त्वरित पहुंच देती है और कार्यक्षमता को बढ़ाती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इसका उपयोग असंतुलित हो जाता है। इस स्थिति से बचने के लिए डॉ. कपाही ने डिजिटल उपवास का सुझाव दिया। उनका मानना है कि यदि सप्ताह में कम से कम एक दिन तकनीक से दूरी बनाई जाए, तो यह डिजिटल डिटॉक्स के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
उन्होंने यह भी जोर दिया कि आज के समय में हमें रील लाइफ से निकलकर रियल लाइफ में संबंधों को मजबूत करने की आवश्यकता है। डॉ. कपाही ने कहा कि तकनीक एक शक्तिशाली साधन है, लेकिन इसका सही उपयोग ही इसे लाभकारी बना सकता है। समय की मांग है कि हम तकनीक के साथ संतुलन बनाकर चलें ताकि हम उसके स्वामी बने रहें, उसके दास नहीं














