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Hindi। समाज एवं साहित्य में अंतर्संबंध बनाना होगा

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साहित्य को समाज सापेक्ष होना जरूरी है। केवल कल्पना की उड़ान वाला साहित्य आनंददायक हो सकता है, लेकिन वह समय का दस्तावेज नहीं बनता है। यदि साहित्य अपने समय एवंं समाज को दिशा नहीं दे, तो वह मुर्दा साहित्य है। जिसमें हमारा समय एवं साहित्य बोलता है, जिंदा साहित्य है।

यह बात हिंदी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर (बिहार) के प्रोफेसर डॉ.‌ प्रेम प्रभाकर‌ ने कही।

वे रविवार को यू-ट्यूब चैनल बीएन‌एमयू संवाद पर साहित्य और समाज विषय फर व्याख्यान दे रहे थे।

साहित्य की अवधारणा बहुत व्यापक है। हमारे साहित्य में लोग एवं परलक दोनों की चिंता है। साहित्य केवल कुछ माध्यमों की बात नहीं है, बल्कि यह मूल्य की बात है। साहित्य को हम आज के संदर्भ में भी देखें और उसके विस्तारित रूप को समझें।

उन्होंने कहा कि समाज और साहित्य के बीच जीवंतता होनी चाहिए। अन्यथा साहित्य एक तरफ से मनोविनोद हो जाएगा। वह समाज का जीवंत दर्पण और उसे आगे ले जाने वाला दस्तावेज नहीं बनेगा।

उन्होंने कहा कि सामान्यत: आज का साहित्य समाज से दूर हो गया है। समाज साहित्य के लिखे से आगे बढ़ गया है। साहित्यकार समाज को पकड़ नहीं पा रहे हैं।वह आम जनता की धड़कनों को नहीं सुन पा रहा है।

उन्होंने कहा कि आज हम समाज से कम सीखते हैं और अपने मन को समाज पर लाद देते हैं। आज का समाज पहले के समाज से ज्यादा गतिशील है। उस गतिशीलता को हमें पकड़ना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि साहित्य को समाज के साथ दृढ़ता, संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ जुड़ना होगा। समाज एवं साहित्य में अंतर्संबंध बनाना होगा। यह इतना व्यापक होगा कि इसमें संपूर्ण ब्रह्मांड आ जाएगा।

उन्होंने कहा कि साहित्य का काम बड़ा जोखिम का है और बहुत बड़ा काम है। इसमें पूर्ण रूप से संवेदनशील और व्यापक दृष्टि वाले को ही आना चाहिए।

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