प्राचीन भारतीय इतिहास निर्माण में मृदभांड का महत्व
भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग द्वारा “प्राचीन भारतीय इतिहास निर्माण में मृदभांड का महत्व” विषय पर एक विभागीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार सिंह, डॉ. मो. शरफराज आलम, डॉ. शानु आनंद, डॉ. प्रीति सिंह, डॉ. मुकेश कुमार तथा डॉ. अर्चना कुमारी ने विषय के विभिन्न आयामों पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए।
अपने संबोधन में प्रो. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि मृदभांड प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं। पुरातात्त्विक उत्खननों में प्राप्त विभिन्न प्रकार के मृदभांडों के आधार पर इतिहासकार किसी काल विशेष की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं। उन्होंने बताया कि सिंधु सभ्यता से लेकर उत्तर वैदिक काल तथा महाजनपद काल तक मृदभांडों की शैली, निर्माण तकनीक और उपयोग में निरंतर परिवर्तन देखने को मिलता है, जो उस समय की सभ्यता एवं जीवन शैली को समझने में सहायक सिद्ध होता है।

डॉ. मो. शरफराज आलम ने अपने वक्तव्य में कहा कि मृदभांड केवल दैनिक उपयोग की वस्तुएँ नहीं थे, बल्कि वे उस समय के व्यापार, कला, तकनीक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के महत्वपूर्ण संकेतक भी थे। उन्होंने बताया कि चित्रित धूसर मृदभांड (Painted Grey Ware), उत्तरी काली पालिशयुक्त मृदभांड (NBPW) तथा लाल मृदभांड जैसी परंपराएँ भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडों की पहचान मानी जाती हैं।
डॉ. शानु आनंद ने कहा कि मृदभांडों के अध्ययन से प्राचीन समाज की जीवन शैली, भोजन व्यवस्था तथा सामाजिक संरचना के महत्वपूर्ण पक्षों को समझा जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से पुरातात्त्विक साक्ष्यों के वैज्ञानिक अध्ययन पर विशेष ध्यान देने का आग्रह किया।
डॉ. प्रीति सिंह ने कहा कि भारतीय इतिहास लेखन में पुरातात्त्विक स्रोतों का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। मृदभांडों के माध्यम से विभिन्न सभ्यताओं के सांस्कृतिक विकास और क्षेत्रीय विशेषताओं की पहचान संभव होती है।
डॉ. मुकेश कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में मृदभांडों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनके आकार, रंग, निर्माण शैली एवं अलंकरण के आधार पर विभिन्न कालखंडों का निर्धारण किया जाता है।
डॉ. अर्चना कुमारी ने कहा कि मृदभांड प्राचीन भारतीय कला एवं तकनीकी विकास के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनके अध्ययन से तत्कालीन समाज की आर्थिक गतिविधियों, व्यापारिक संबंधों तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

संगोष्ठी में अन्य विभागों के शिक्षकों की भी महत्वपूर्ण सहभागिता रही। डॉ. शंभु राय(HOD संस्कृत), डॉ. नितीश कुमार आर्य(असिस्टेंट प्रोफेसर,अर्थशास्त्र विभाग), डॉ. ऋषभ कुमार(दर्शनशास्त्र), डॉ. अरविंद कुमार और डॉ. निशा कुमारी (एंथ्रोपोलॉजी)तथा प्रो. अरुण झा (स्टैटिक्स विभाग)ने भी कार्यक्रम में भाग लिया तथा विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को शोध कार्य से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव दिए। वक्ताओं ने शोध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्रोतों के सम्यक विश्लेषण तथा अंतःविषय अध्ययन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।
कार्यक्रम में शोध छात्रा सुरुचि एवं रंजीत ने भी अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। उनकी प्रस्तुतियों में मृदभांडों के माध्यम से प्राचीन भारतीय समाज, संस्कृति तथा धार्मिक परंपराओं के पुनर्निर्माण पर विशेष चर्चा की गई, जिसे उपस्थित शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने सराहा।
संगोष्ठी में उपस्थित विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि पुरातात्त्विक स्रोतों के वैज्ञानिक अध्ययन से इतिहास लेखन को अधिक प्रमाणिक एवं तथ्यपरक बनाया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में विभाग की ओर से सभी अतिथियों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया गया तथा भविष्य में भी इस प्रकार की शैक्षणिक गतिविधियों के आयोजन पर बल दिया गया।














