Search
Close this search box.

पुण्यतिथि पर याद आते साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी प्रसाद मंडल : डॉ. राठौर

👇खबर सुनने के लिए प्ले बटन दबाएं

पुण्यतिथि पर याद आते साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी प्रसाद मंडल : डॉ. राठौर

साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी प्रसाद मंडल का जीवन यद्यपि अंत समय तक संघर्षों में बिता लेकिन साहित्य सृजन में उनकी कलम का जवाब नहीं था ।01 अगस्त 1921 को जिला मुख्यालय के चर्चित बालम गढ़िया में जन्मे परमेश्वरी प्रसाद मंडल ने 1945 में टी एन बी कॉलेज भागलपुर से बी. ए. किया वहीं साहित्य विद्यापीठ से साहित्य वाचस्पति रहे।साहित्य सृजन के साथ राजनीतिक सक्रियता भी नेतृत्वकारी एवं प्रभावकारी रही।जिला कांग्रेस कमिटी,सहरसा का प्रथम अध्यक्ष होना एवं जय प्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन में ढाई माह तक जेल में रहे।प्रशासकीय रूप से भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया शुरुआती समय में टी पी कॉलेज पुस्तकालय अध्यक्ष एवं वेद व्यास कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य की भूमिका इसके स्थपित प्रमाण हैं।अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उन्होंने विभिन्न बिंदुओं पर साहित्य सृजन को दिया।उनकी रचनाएं अक्सर योजनगंधा, प्रदीप,जीवन ज्योति, पारख प्रकाश,संवाद आदि में छपती रही।उनकी अधिकांश कालजई रचनाएं अर्थ अभाव में प्रकाशित नहीं हो सकी।सादगी,सरलता ,सौम्यता,ईमानदारी का के पर्याय रहे परमेश्वरी प्रसाद मंडल ताउम्र अभावों के बीच संघर्ष की जिंदगी जीते रहे।

*रुद्रवेणुका उनकी साहित्यिक रचनाओं को समेटने का प्रयास*

परमेश्वरी प्रसाद मंडल ने अलग अलग बिंदुओं पर खुलकर अपनी कलम का प्रयोग किया लेकिन उसे संग्रह के रूप में प्रकाशित करने का उनका सपना उनके जीवन का अधूरा स्वप्न रहा।साल 1996 में उनकी तबियत लगातार बिगड़ती गई इलाज जारी रही फिर धीरे धीरे सुधार हुआ।इसी दौरान उनके चाहने वालों को उनके बेहतर स्वास्थ्य की चिंता लगी रही फलस्वरूप डॉक्टर आलोक कुमार, प्रो शचींद्र महतो,डॉक्टर मधेपुरी,हरिशंकर शलभ,शिवनेश्वरी प्रसाद यादव,डॉक्टर रामचंद्र प्रसाद यादव सहित अन्य कई शुभ चिंतकों ने आर्थिक सहयोग की ठानी,,,,बैठक हुई निर्णय हुए और शुरू हुआ संग्रह ।उनके चाहने वालों ने खुलकर सहयोग किया।अच्छी खासी राशि संग्रहित हुई तबतक सेहत में सुधार भी हुई।तब साहित्य प्रेमियों ने तय किया कि इस राशि का प्रयोग उनकी अनमोल रचनाओं के प्रकाशन में किया जाए जो खुद परमेश्वरी प्रसाद मंडल की भी स्वप्न लालसा थी। फिर क्या था कार्य प्रारंभ हुआ ।डॉक्टर आलोक कुमार की नेतृत्वकारी पहल,डॉक्टर मधेपुरी जी की प्रकाशन प्रक्रिया में सहभागिता, आर्या दास,दशरथ प्रसाद कुलिश सहित अनगिनत लोगों ने जरूरी सहयोग दिया वहीं मणिभूषण वर्मा ने प्रेस में कार्य संपादन का दायित्व बखूबी निभाई और इस तरह से अप्रैल 1997 में उस *रूद्रवेणुका* का प्रकाशन हुआ जिसे परमेश्वरी बाबू की चाहत थी।लेकिन समय की विडंबना देखिए अपने सबसे बड़े स्वप्न को साकार होने का सौभाग्य प्राप्त होते नहीं देख पाए और प्रकाशन से महज दो माह पहले ही 21 फरवरी 1997 को आखिरी सांस ली।उनके चाहने वालों को इसकी कसक रही कि उनके जीवनकाल में रुद्रवेणुका प्रकाशित नहीं हो सकी लेकिन सबों को खुशी भी थी कि उनकी बिखरी अनमोल रचनाओं को उस नाम के संग्रह रूप में प्रकाशित किया गया जो खुद उन्हीं द्वारा अंकित हुआ था *रुद्रवेणुका*।प्रकाशन के सूत्राधार डॉक्टर आलोक कुमार लिखते हैं कि कभी परमेश्वरी प्रसाद मंडल ने ही रुद्रवेणुका का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा था कि “पौरुष का गीत मधुर आवाज में “।डॉक्टर आलोक यह भी लिखते हैं कि उनकी रचनाएं मनुष्य के अंदर की विपुल ऊर्जा व क्षमता को जागृत करती है वहीं सामाजिक विषमता,अनाचार,दुराचार पर प्रहार करती है।वो रुद्रवेणुका को परमेश्वरी बाबू के जीवन दर्शन का सार तत्व करार देते हैं।रुद्रवेणुका की प्रस्तावना लिखने वाले प्रगतिशील लेखक संघ के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव खगेंद्र ठाकुर ने लिखा कि वर्ण व्यवस्था,ब्राह्मणवाद,जातिवाद के संबंध में उनकी समझ अद्भुत थी।उनकी रचनाएं बताती हैं कि मानों कविता लेखन की पद्धति पर उनका अधिकार था और यह शायद इसलिए क्योंकि यह उनके लिए साध्य नहीं साधन थी, पेशा नहीं बल्कि माध्यम थी।

*उनकी समाधि स्थल एवं उनके नाम पर निर्मित पुस्तकालय को किसी तारणहार की तलाश*

साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी बाबू की उनके गांव में अवस्थित समाधि स्थल का निर्माण बड़े गर्व के साथ हुई लेकिन समय के साथ उचित देखभाल के अभाव में अब जहां वो जीर्णशीर्ण अवस्था में आ गया वहीं समीप उनके नाम पर तत्कालीन एमएलसी विजय कुमार वर्मा के कोष से निर्मित पुस्तकालय भवन को भी कोई देखने वाला नहीं है।उनके सम्मान में जहां समाधि स्थल को पूर्ण रूप देने की जरूरत है वहीं पुस्तकालय को व्यवस्थित कर उपयोगी बनाने की भी।

*अनगिनत विषयों पर परमेश्वरी बाबू की कलम आबाद रही*

अपनी खास अंदाज के धनी साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी प्रसाद मंडल ने अलग अलग बिंदुओं पर कविता लिखी जिसके बोल सहज और सुलभ नजर आते हैं।उनकी काव्य सफर में कृष्णार्पण ,मधेपुरा के राजमार्ग पर,मधेपुरा की पावन माटी,बदल,सत्यकाम जाबाल,अभिलाष देव अकाल है,मान ले कर्पूरी की बात,जीवन ज्योति जगे,जीवन चक्र,लौट नहीं आऊंगा, यों जीना है, यों मरना है।नया वर्ष,किसका होता है बलिदान,आरक्षण अधिकार हमारा, किस किस को दूं दोष आदि। इस क्षेत्र के प्रथम साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी प्रसाद मंडल को उनकी पुण्यतिथि पर कृतज्ञ समाज का नमन…

*डॉ. हर्ष वर्धन सिंह राठौर*
प्रधान संपादक,युवा सृजन
सचिव,आजाद पुस्तकालय, कतराहा,मधेपुरा।

READ MORE