बतकही
जीपीएफ : कपड़ा-लत्ता बदला है, शरीर वही है
29 जून को दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत जी से मिला। भागलपुर से निकलते समय ही यह तय कर लिया था कि उनसे मिलना है और गांधी शांति प्रतिष्ठान (जीपीएफ) की वर्तमान स्थिति को अपनी आंखों से भी देखना है। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया, व्यक्तिगत मुलाकातों और दूरभाष के माध्यम से जीपीएफ को लेकर अनेक प्रकार की बातें सुनने को मिल रही थीं। स्वाभाविक रूप से मन में अनेक प्रश्न थे। मन इसलिए भी खिन्न था कि कभी सर्व सेवा संघ भी इसी प्रकार के विवादों से गुजरा था और उसका परिणाम हम सबके सामने है।
दोपहर में मैं अपनी पत्नी के साथ जीपीएफ पहुंचा। भवन में प्रवेश करते ही लगा कि मरम्मत और नवीनीकरण का कार्य चल रहा है। पूछने पर प्रशांत जी के कक्ष का रास्ता बता दिया गया। मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि मिलने की प्रक्रिया में कोई औपचारिकता या अनावश्यक रोक-टोक नहीं थी। जैसे पहले लोग सीधे जाकर मिलते थे, वैसे ही मैं भी उनके कक्ष में पहुंच गया।
उनके कार्यालय में वातानुकूलित व्यवस्था थी। अध्यक्ष और सचिव का कार्यालय ही नहीं, पूरा कार्यालय एसी था। इस बात को लेकर भी बहुत चर्चा सुनने को मिलती रही है। मुझे व्यक्तिगत रूप से इसमें कोई आपत्ति नहीं दिखी। समय बदलता है और संस्थाओं को भी समय के अनुसार अपनी कार्य-स्थितियों में आवश्यक परिवर्तन करने पड़ते हैं।
प्रशांत जी ने बड़े आत्मीय भाव से मेरा और मेरी पत्नी का स्वागत किया। बातचीत शुरू हुई तो मैंने अपने मन की सारी शंकाएं उनके सामने रख दीं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को आज परिवर्तन पर आपत्ति है, वही पहले भवन के रखरखाव और सुधार की आवश्यकता की बात करते थे। अब जब कार्यकारिणी की स्वीकृति से वही काम किया जा रहा है, तो उसका विरोध क्यों? उन्होंने बताया कि कमरों को व्यवस्थित किया गया है, बाथरूमों का आधुनिकीकरण किया गया है और लिफ्ट लगाने की प्रक्रिया भी चल रही है।
उनकी बातें सुनते हुए मुझे अपना अनुभव याद आया। अब मेरी अपनी शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं रही कि आसानी से कई सीढ़ियां चढ़ सकूं या लंबे समय तक जमीन पर बैठ सकूं। यात्राओं में सुविधा के लिए मैं अपने साथ कमोड स्टूल लेकर चलता हूं। इसलिए मुझे लगता है कि समय के अनुसार कुछ सुविधाएं जोड़ना गांधी विचार के विरुद्ध नहीं है। सादगी का अर्थ असुविधा को महिमामंडित करना नहीं होना चाहिए।
मैंने पूरे परिसर का भी अवलोकन किया। मुझे लगा कि विवाद भवन के आधुनिकीकरण से अधिक इस बात को लेकर है कि इसके लिए धन कहां से आया और किस प्रकार की व्यवस्था की गई। इस विषय पर भी प्रशांत जी ने स्पष्ट कहा कि जिसे कोई शंका हो, वह सामने आकर बात करे।
एक वरिष्ठ पत्रकार जीपीएफ गाए थे, वहां उनको बैठने की सुविधा नहीं मिली, जाहिर है कि नहीं मिली होगी क्योंकि अभी वहां मरम्मती का कार्य चल रहा है । तो उन्होंने अपनी व्यथा को फेसबुक पर लिखा । प्रशांत जी ने उनको पत्र लिखा कर असुविधा के लिए खेद जाहिर किया और आगे लिखा आप खबर कर आएं बैठ कर बात करते है । ये पत्र Arvind Varun के फेसबुक पर है । संवाद ही समाधान का रास्ता है।
यह भी सही है कि मरम्मत का कार्य अभी जारी है, इसलिए बैठने की समुचित व्यवस्था फिलहाल नहीं है। कुछ देर हम लोग वहीं कार्यालय में बैठे कर, चर्चा की और उसके बाद मैंने परिसर के अन्य हिस्सों को भी देखा।
मैं न तो कोई बड़ा गांधी विचारक हूं और न ही स्वयं को गांधीवादी मानता हूं। लेकिन इतना अवश्य समझता हूं कि अखबारों, सोशल मीडिया और परोक्ष आरोपों से किसी भी संस्था का भला नहीं होता। इससे केवल अविश्वास बढ़ता है। जब दोनों पक्षों में गांधी विचार से जुड़े वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लोग हैं, तो समाधान का सबसे स्वाभाविक मार्ग आमने-सामने बैठकर संवाद करना है।
गांधीजी ने अपने कट्टर विरोधियों से भी संवाद का रास्ता कभी नहीं छोड़ा। यदि आप लोग गांधीवादी हैं, तो आप को भी उसी परंपरा का पालन करना चाहिए। मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए।
मेरी इस यात्रा का निष्कर्ष केवल इतना है कि जीपीएफ का कपड़ा-लत्ता बदल गया है, लेकिन उसका शरीर वही है। अब आवश्यकता इस बात की है कि शरीर स्वस्थ रहे, आत्मा जीवित रहे और परिवार बिखरने के बजाय संवाद के माध्यम से और अधिक मजबूत बने।
-समाजसेवी डॉ. मनोज मिता जी के फेसबुक वॉल से साभार।












