गणित से दर्शन की ओर…
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गणित एवं दर्शनशास्त्र का संबंध काफी गहरा है। कई गणितज्ञों ने दर्शन की एक प्रमुख शाखा तर्कशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन यहाँ मैं गणित के गूढ़ सूत्रों अथवा तर्कशास्त्र की जटिल गुत्थियों या दर्शन के अलौकिक रहस्यों का वर्णन करने नहीं जा रहा हूँ। इसके इतर मैं तो बस अपने जीवन में गणित की शिक्षा और इसी बहाने गणित से दर्शनशास्त्र की अपनी यात्रा को दर्ज करना चाहता हूँ।
अनौपचारिक शिक्षा : सबसे पहले अनौपचारिक शिक्षा की चर्चा जरूरी है, जो हमें अपने घर-परिवार में मिलती है। गणित की अनौपचारिक शिक्षा मुझे विशेष रूप से नानीजी श्रीमती सिया देवी, माताजी श्रीमती रंजन सिंह, मौसीजी श्रीमती अनीता सिंह एवं दीदीजी श्रीमती किरण सिंह जी से मिली। खासकर नानीजी का मेरे ऊपर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है, जो लगभग निरक्षर थीं और जिनका गणितीय ज्ञान कुछ अजीब-सा था। इसकी कुछ बानगी है कि मेरे द्वारा तीन-चार बड़ी-बड़ी रोटियां खाने के बावजूद वो सबको बताती थीं कि “छौडा ठीक से एक्को रोटी नै खैलकै!” वे हमेशा फल, मिठाइयां, चॉक्लेट, लरूआ या यहां तक की सत्संग का प्रसाद भी मुझे अन्य लोगों से ज्यादा देती थीं। नानीजी के ऐसे ही प्रेमपूर्ण व्यवहारों, जिनमें कोई गणित नहीं होता था ने मेरे अंतर्मन में ‘दर्शन’ के बीज अंकित कर दिया।

प्राथमिक शिक्षा : मेरी प्राथमिक शिक्षा मेरे नानी घर से सटे दूरन सिंह मध्य विद्यालय, माधवपुर (खगड़िया) में हुई। यहाँ के कई शिक्षकों की पढ़ाई एवं प्यार-दुलार मुझे आज भी याद है। इनमें शिक्षिका देवीजी, श्री फौजदार पंडित, श्री अनंत कुमार मिश्र, श्री हरेन्द्र कुमार आदि प्रमुख हैं। शुरुआती दौर में देवीजी ने मुझे जोड़, घटाव आदि सीखाया। आगे की कक्षाओं में शिक्षक श्री अनंत कुमार मिश्र जी ने मुझे बीज गणित एवं रेखा गणित की बारिकियों से परीचित कराया। इनके साथ ही मेरे दो प्राइवेट शिक्षकों श्री अवधेश कुमार जी एवं श्री विनोद कुमार जी उर्फ बिंदा जी के पढ़ाने का तरीका लाजवाब था। दोनों शिक्षक कठिन-से- कठिन सवालो को चंद मिनटों में हल कर देते थे।
उच्च विद्यालय की शिक्षा : आगे मेरी पढ़ाई श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय, नयागांव (खगड़िया) में हुई, जहां गणित के एक-से-बढकर एक विद्वान शिक्षक थे, यथा-श्री वकील प्रसाद सिंह, श्री जनार्दन कुंवर एवं श्री सुरेश प्रसाद कुंवर आदि। मैं विद्यालय जाने से पहले अपने दोस्तों के साथ सुरेश बाबू के घर जाकर गणित एवं भौतिकी का ट्यूशन भी पढ़ता था। उनके द्वारा पढ़ाने के क्रम में ही मुझे पूरा पाठ याद हो जाता था, भले ही वह कठिन- से-कठिन थ्योरम ही क्यों न हो। मेरे एक अन्य निजी शिक्षक पंकज कुमार, जो मुझे अकेले में उच्च गणित (‘एडवांस मैथमेटिक्स’) पढ़ाते थे, उनकी बात तो कुछ और ही थी। मैं उनके पास विद्यालय से आने के बाद शाम में पढ़ने जाता था, बिना किसी किताब के सिर्फ एक कॉपी लेकर। पहुंचते ही पहले हम दोनों मिलकर मकई का भूंजा और हरी मिर्च (वे बताते थे कि इससे दिमाग तेज होता है) खाते थे। फिर वे मेरी कॉपी में मेरे द्वारा अंकित कोई सवाल, जो मैं हल नहीं कर पाता था, उसे मुझे बता देते थे। फिर जो चैप्टर पढ़ाना होता था, उसका ‘थ्योरी’ (‘लिट्रेचर’) मुझे समझाते हुए कॉपी में लिख देते थे। बस पढ़ाई समाप्त। मैं घर जाकर उसके सभी सवालों को हल करता था। यदि कोई सवाल हल नहीं हुआ या कोई ‘कन्फ्यूजन’ हुआ, तो उसे कॉपी में लिख लेता था।
जीती बाजी हार… : कुल मिलाकर प्रथम कक्षा से दसवीं कक्षा तक मेरी गणित की पढ़ाई ठीक-ठाक रही। मैं अपने विद्यालय में भी हमेशा प्रथम या द्वितीय आता रहा। कक्षा में शिक्षक कोई प्रश्न पुछने के पहले ही मुझे और मेरे एक-दो मित्रों को कह देते थे कि पहले तुम लोग नहीं बताना। मैं हमेशा एक कक्षा आगे तक के सवालों को भी आसानी से हल कर देता था और सवालों को हल करने की मेरी गति भी काफी तीव्र थी। मेरे मामाजी श्री अग्निदेव सिंह जी प्रायः मेरी गणित की किताब को लेकर कहीं से भी मुझसे सवाल पुछते थे और मैं उनके सवाल पूर्ण होते-होते उसका उत्तर दे देता था। इससे खुश होकर वे शतरंज निकालकर मेरे साथ खेलने बैठ जाते थे, जिसमें प्रायः उनको दुखी होना (हारना) पड़ता था। लेकिन मेरी सबसे बड़ी कमी यह थी कि मैं हमेशा अतिआत्मविश्वास से लवरेज रहता था और कभी भी पूर्वाभ्यास नहीं करता था। इसके कारण कई बार मैं परीक्षा के दौरान गणित के साधारण सवालों में उलझ जाता था और शतरंज में बड़े-बड़े दिग्गजों को हराने के बाद ऐन-मौके पर किसी साधारण खिलाड़ी के हाथों जीती बाजी हार बैठता था।
मैट्रिक में द्वितीय श्रेणी : मैट्रिक परीक्षा में भी मेरा अति- आत्मविश्वास मेरे लिए घातक सिद्ध हुआ और पूर्वाभ्यास नहीं करने के कारण मैं परीक्षा कक्ष में कई बार सामान्य चीजें भी भूलता रहा। हद तो यह हुई कि सामान्य गणित के कुछ सवाल जो मैं परीक्षा कक्ष में नहीं बना पाया था, उसे मैंने अपने कमरे पर आने के बाद मामाजी के सामने पलक झपकते हल कर दिया। इससे मामाजी काफी दुखी हो गए, तो मैंने उनसे कहा, “कि होतै”? लेकिन जब परीक्षा परिणाम आया, तो मुझे पता चल गया कि क्या हुआ! मैं चार अंक कम होने की वजह से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण नहीं हो सका। मेरे विभिन्न विषयों के अंकों में भी कोई तारतम्य नहीं था। खास बात यह भी रहा कि मुझे सामान्य गणित में मात्र 55/100 अंक से ही संतोष करना पड़ा। यह बात दीगर है कि बस उच्च गणित 75/100 एवं भौतिकी में 45/50 ने किसी तरह मेरी इज्जत बचा ली। इस कारण 416/700 (लगभग 59.4 प्रतिशत) अंकों के साथ अपने यहां में द्वितीय स्थान प्राप्त करने में सफल रहा।
इंटरमीडिएट में द्वितीय श्रेणी : मैट्रिक में द्वितीय श्रेणी आने से मेरे बचपन से लेकर तब तक की पूरी प्रतिभा प्रश्नांकित हो गई और मैं स्वयं भी गहरे निराशा के दौर में चला गया। इसके बाद मैंने किसी तरह इंटरमीडिएट विज्ञान (गणित) की डिग्री (द्वितीय श्रेणी) तो ले ली। लेकिन इस बार मैट्रिक से भी एक प्रतिशत कम (लगभग 58.4 प्रतिशत) अंक आने से मुझे काफी निराशा हुई।
दर्शनशास्त्र की ओर कदम : मैट्रिक एवं इंटरमीडिएट दोनों में द्वितीय श्रेणी आने के परिणामस्वरूप मैंने गणित को पूरी तरह अलविदा कह दिया। इधर इंटरमीडिएट में पढ़ाई के दौरान ही मेरी बहुचर्चित दार्शनिक ओशो रजनीश के साहित्य में गहरी रुचि हो गई थी। ऐसे में स्वाभाविक रूप से मैंने स्नातक में गणित एवं भौतिकी से आगे बढ़कर (या पलायन कर) दर्शनशास्त्र की ओर कदम बढ़ाया।
जीवन का सुनहरा सूत्र : आगे दर्शनशास्त्र विषय के साथ मैंने प्रथम श्रेणी से स्नातक एवं स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। लेकिन आगे का रास्ता भी काफी उबड़- खाबड़ यह और कहीं भी गणितीय समीकरण ठीक-ठाक नहीं बैठा। फिर भी दर्शनशास्त्र विषय के कारण मुझे उच्च शिक्षा में आने का सुनहरा अवसर मिला और इससे भी अधिक मिला है- जीवन का सुनहरा सूत्र। यह सूत्र बहुत ही सहज-सरल है- “सफलता में इतराना नहीं और असफलता से घबड़ाना नहीं।”
बहुत-बहुत धन्यवाद।
-सुधांशु शेखर













