अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर परिचर्चा आयोजित
बीसीए विभाग, ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में शनिवार को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्य वक्ता प्रो. सिद्धेश्वर काश्यप ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का की नींव बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) के भाषा आंदोलन से जुड़ी हुई है। वर्ष 1952 में 21 फरवरी को बांग्ला भाषा को आधिकारिक मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे छात्रों परिषद पुलिस ने गोली चला दी, जिससे कई छात्रों की मृत्यु हो गई।
इस बलिदान की स्मृति में बांग्लादेश में 21 फरवरी को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया।

उन्होंने बताया कि यूनेस्को ने सन् 1999 में 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मान्यता दी। अगले वर्ष 2000 में पहली बार इसे वैश्विक स्तर पर मनाया गया
उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर 40 प्रतिशत आबादी को उस भाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता, जिसे वे बोलते या समझते हैं। फिर भी, बहुभाषी शिक्षा में प्रगति हो रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा के महत्व को स्वीकार किया गया है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए समन्वयक डॉ. सुधांशु शेखर ने बताया कि माँ, मातृभूमि एवं मातृभाषा का का स्थान सर्वोपरि है। अतः हमें अपनी सभी मातृभाषाओं का संरक्षण एवं संवर्धन करना चाहिए। हमें राजनीति स्वराज के साथ-साथ हमें सांस्कृतिक एवं भाषायी स्वराज के लिए भी प्रयास करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि यूनेस्को के अनुसार, दुनिया में कुल 8 हजार 3 सौ 24 भाषाएं हैं। इनमें से कई भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं और कई भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे में भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अतिथियों का स्वागत मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन बीसीए विभागाध्यक्ष के. के. भारती ने किया।

इस अवसर पर शोधार्थी डॉ. सौरभ कुमार चौहान, कार्यालय सहायक रणवीर कुमार, प्रयोगशाला सहायक राजदीप कुमार, बीसीए के सावन कुमार, अशोक कुमार आदि उपस्थित थे।














