
Poem। कविता/चाहत/पूजा शकुंतला शुक्ला, कंपनी सचिव, भारतीय कंपनी सचिव संस्थान, रांची, झारखंंड
चाहत —– फूलों को छू कर तितलियों सा होना चाहती हूँ। बहुत देर तक ठहर लिया, अब मैं नदी होना चाहती हूँ। हँसना, खिलखिलाना और

चाहत —– फूलों को छू कर तितलियों सा होना चाहती हूँ। बहुत देर तक ठहर लिया, अब मैं नदी होना चाहती हूँ। हँसना, खिलखिलाना और

सांझ ——- ख्वाहिशों की ढ़लान जहाँ जमीं को चूम जिंदगी का बीज बोते हैं तुम मुझ से वहीं मिलना दोनों देर तक बैठेंगे बूढ़े बरगद

माँ —– तुम कहती थीं तुम्हें लता नहीं सुदृढ़ वृक्ष बनना है, जो अपना अस्तित्व खुद गढ़े, आकाशबेल तो आम लड़कियाँ बनती हैं। तुम्हे सख्त

दिनांक 03 सितंबर 2020 को ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में हो रही वेबीनार सीरीज के अंतर्गत सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष रसायनशास्त्र विभाग महारानी कल्याणी महाविद्यालय

विश्व आदिवासी दिवस वर्ष 1982 में आदिवासियों के उत्थान हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक बहुत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आदिवासी समाज के उत्थान हेतु

साहित्य को समाज सापेक्ष होना जरूरी है। केवल कल्पना की उड़ान वाला साहित्य आनंददायक हो सकता है, लेकिन वह समय का दस्तावेज नहीं बनता है।

दूध के गाछ अलसुबह कुछ प्रतीक शब्द बन दिल के दरवाजे पर हौले-हौले देने लगे दस्तक मैंने झट-से खोल दिए पल्ले वे दाखिल हुए मेरे

कविता/ गुम गया लोकतंंत्र ———————– मुल्क की सियासत मानो एक गुम रास्ता जिस पर चल रहे सियासतदां आड़े-तीरछे, उड़ते-गोते खाते जैसे वे एक शिकारी हों

इतिहास के पन्नों में नयागाँव, परबत्ता ==================== बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जी का इस क्षेत्र से गहरा सम्बन्ध रहा है।

महामारी ——— प्रेम प्रभाकर ‘दुहाई! कोरोना माय की।’ ‘रच्छा करो, कोरोना माय! भूल-चूक, लेनी-देनी, …तुरुटी को छिमा करो! आपका जो भी कौल-करार है, सब पूरा
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