
कविता/ शेष है / डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
तुम्हें जाने की हठ है; मैं निःशब्द, मेरी श्वासों में तेरी वही सुगंध शेष है। तुमने पलों में भ्रम तोड़ डाले सब, मेरा अब भी

तुम्हें जाने की हठ है; मैं निःशब्द, मेरी श्वासों में तेरी वही सुगंध शेष है। तुमने पलों में भ्रम तोड़ डाले सब, मेरा अब भी

मेरी हथेली पर तुम अधरों से प्यार लिख दो, समस्त आकाश-गंगाओं का संसार लिख दो। कामनाएँ मुखर- अब यों सिसकती न छोड़ो, मधुरगीतों के गुंजन

कोविड-19 का देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा है। शहर और गांव दोनों इससे प्रभावित हैं। शिक्षा, समाज एवं अर्थ व्यलस्था पर इसका कुप्रभाव

क्यूँ जीवन व्यवस्था में व्यवहार में आचार में विचार में आस्थाओं मे मूल्यों में विभक्त है। अभिव्यक्ति की सोपानों में सामाजिक निर्वाहन में है सिर्फ

खुद को ढूँढने की तलाश ज़िन्दगी है। यूँ सफ़र मे जुड़ते हैं। जोड़ते हैं। रिश्तों को तराशते हैं। परखते हैं। अपनाते हैं। अपनों को परायों

हौसलों की चादर मे लिपट बेपनाह उम्मीदों से चलती ज़िन्दगी अब थक कर पूछती है कितना सफ़र और बाकि है ? मैने आसमानों पर टकटकी

संस्कार कोई घुट्टी नहीं कोई ताबीज़ नहीं कोई बन्धन नहीं कोई वचन नहीं कोई समझौता नहीं कोई मत धर्म बन्धन नहीं फिर संस्कार क्या है

अंध-श्रद्धा प्रेम मेरा, कुछ नेह बरसाते रहो। जेठ सा जीवन तपा, मधुमास तुम आते रहो। मधुमास तुम आते रहो। विकल है- मन की नदी, बहुत

भागलपुर जिलान्तर्गत बरारी गंगा तट पर एक बूढ़ा पीपल पेड़ का जीवन खतरे में है। वह हर आते-जाते को अपनी निःशब्द कहानी सुना रहा है।

घुंघरू बांध के बारिश आई, छम-छम कर एक धुन सुनाई, नाच उठा गगन, ताल से ताल
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