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Gautam बुद्ध पूर्णिमा पर। प्रेमकुमार मणि 

बुद्ध पूर्णिमा पर

 

प्रेमकुमार मणि में

 

वैशाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध का जन्मदिन मनाया जाता है. श्रुति है यह उनके बुद्ध होने और मृत्यु की भी तारीख है. बड़े लोगों को कालांतर में कुछ किंवदन्तियों और आख्यानों से बांध दिया जाता है. बुद्ध के साथ भी ऐसा हुआ. इसलिए हमें तटस्थ हो कर विचार करना चाहिए. लंबे समय तक राज्याश्रय के फलस्वरूप महायानियों ने ललितविस्तर में बुद्ध को लगभग अवतारी बना ही दिया है. लेकिन यह तय है कि बुद्ध इतिहास पुरुष हैँ,अवतारी नहीं हैँ.

 

जन्मदिन पर जन्मकथा की थोड़ी चर्चा अप्रासंगिक नहीं है. नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी में उनका जन्म हुआ. पिता शुद्धोदन शाक्यों के एक छोटे गणराज्य के मुखिया थे. पालि ग्रंथों के अनुसार उनके परिवार के पास कोई एक हजार हल की खेती थी. इस से प्रतीत होता है उनके अधीन कोई पाँच बड़े गाँव रहे होंगे. इस तरह वह एक मझोले जमींदार जैसी आर्थिक समृद्धि वाले परिवार से थे. जातक निदानकथा के अनुसार शुद्धोदन के घर रोपनी के आरम्भ होने के रोज एक किसान त्योहार मनाया जाता था. इसे वप्प-मंगल कहा जाता था. इस से जानकारी मिलती है कि बुद्ध का परिवार एक समृद्ध किसान परिवार था, न कि राज परिवार,जैसा बाद में प्रचारित हुआ. कपिलवस्तु में चुनाव के द्वारा चक्रानुक्रम से राजा चुने जाते थे. संभवत: ऐसे राजाओं को ही चक्रवर्ती राजा कहा जाता था. सम्भव है बुद्ध के जन्म के समय उनके पिता चुने गए राजा हो गए हों.

 

बुद्ध की माँ माया देवी थीं. पालि-ग्रंथ ‘अपदान’ के अनुसार वह देवदह गाँव के किसान अंजन सक्क और सुलक्खना की बेटी थीं. गर्भ के पूरे दिन होने पर जब वह जचगी केलिए अपने मायके जा रही थी, तब लुम्बिनी वन में उन्होने एक शिशु को जन्म दिया. यही बुद्ध हुए.

 

बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था. उनकी माँ उनके जन्म के कुछ रोज बाद मर गयीं. उनका लालन-पालन उनकी मासी गौतमी ने किया. इसलिए बुद्ध को गौतम भी कहा जाने लगा.

सिद्धार्थ अंतर्मुखी स्वभाव के थे. अपने में ड़ूबे कुछ सोचते रहते. खेतीबारी में भी उनका मन नहीं लगता था. यसोधरा से उनका विवाह हुआ,जो पुत्र राहुल के जन्म के बाद परीपाटी के अनुसार राहुल माता देवी कही जाने लगीं. कुछ ही समय बाद सिद्धार्थ का मन घर- ग्रिहस्ती से ऊब गया और एक रोज उन्होने चुपके से घर छोड़ दिया. इसे महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है.

 

अपने समय के अनेक प्रबुद्ध लोगों से मिलते वह आज के राजगीर पहुँचे, जो तब गिरीव्रज था. उस जमाने में वहाँ विचारकों का बड़ा जमावड़ा होता था. यहाँ कुछ समय बिताने के बाद वह गया के पास उरेला या उरुवेला चले गए,जहां उन्हें कुछ ऐसा ज्ञान हासिल हुआ,जिस से वह संतुष्ट हुए. यह उरेला ही आज बोधगया है. उन्हें अनुभव हुआ इस समझ के आधार पर मानव जीवन को सुखी बनाया जा सकता है.

 

बुद्ध ने चार सच्चाइयों को रेखाकित किया. इन्हें चार आर्य सत्य कहा जाता है. ये हैं –

दुख्खम यानी दुख है,

 

समुदाय यानी दुख के कारण हैँ,

 

निरोध यानी उसका निवारण है,

 

निरोधगामिनी प्रतिपद यानी दुख समुदाय के निरोध हेतु प्रतिपद (उपाय ) हैँ.

 

उन्होने एक दार्शनिक की तरह जीवन और जगत की व्याख्या भी की. उनका कहना था एक के खात्मे से दूसरे का जन्म होता है. यही प्रतीत्यसमुत्पाद है. अस्मिन सति इदम् भवति. यह होने से वह होता है. यह सापेक्ष कार्यकारणतावाद है. नष्ट होने और बनने की प्रक्रिया निरंतर एक सातत्य में चलती रहती है. यही सृष्टि-चक्र है. बुद्ध किसी सृष्टिकर्ता यानी ईश्वर में यकीन नहीं करते. अपने समय में उन्होने एक वैज्ञानिक समझ विकसित की. उन्होने कहा किसी बात पर इसलिए यकीन मत करो कि यह महान व्यक्ति द्वारा कही गई है या महान ग्रंथ में लिखी गई है . इसकी जगह स्वयम् सोचो कि क्या यह सचमुच ठीक है और ऐसा होने पर ही स्वीकार करो.

 

बुद्ध आज से ढ़ाई हजार साल पहले हुए. उन्होने अपने समय के विचारों और सनातनी धर्म की समझपूर्ण आलोचना की, और एक सद्धर्म की स्थापना भी की. इसके फैलाव केलिए एक संघ स्थापित किया.

 

जैसा कि होता है उनके बाद उनके संघ में भी विकृतियां आईं. संघ दो गुटों-हीनयान और महायान में बंट गया. मौर्य राजा असोक ने राजकीय संरक्षण दे कर बौद्ध भिक्खुओं के एक हिस्से को सुविधाभोगी बना दिया. राज्याश्रय से नाना प्रकार की विकृतियां उभरीं. इन सब का नतीजा हुआ संघ पतन की ओर जाने लगा.

 

लेकिन बाद में दूसरे कई शासकों, जिन में राजा धर्मपाल कुछ अधिक प्रमुख हैँ, ने अनेक बौद्ध शिक्षण संस्थानों को खड़ा कर इसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया. विक्रमशिला और नालन्दा के महाविहार, जो आधुनिक विश्वविद्यालय स्तर के थे, इसी काल में बने. तब का भारत एक बड़े ज्ञान-केन्द्र के रूप में जाना जाता था. पूरे एशिया में भारत के विद्या-वैभव की धाक थी. लेकिन तुर्क हमलावरों ने सब तहस-नहस कर दिया.

 

आधुनिक जमाने में लोकतांत्रिक राजनीति और विज्ञान के बढ़ते प्रभाव ने एक बार फिर बुद्ध को चर्चा में ला दिया है. वैज्ञानिक चेतना का जैसे-जैसे विकास हुआ, बुद्ध प्रासंगिक होते गए. प्रतीत्यसमुत्पाद की अवधारणा विज्ञान के आधुनिक खोजों के इतना करीब है कि आश्चर्य होता है.

 

बुद्ध अनेक रूपों में दुनिया भर के आधुनिक बुद्धिजीवियों को प्रभावित करते रहे हैं. आधुनिक जमाने के भारत में भीमराव आंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू जैसे राजनेता तथा ज़िद्दू कृष्णमूर्ती और रजनीश जैसे दार्शनिक बुद्धिजीवी उनसे अनुप्राणित थे. जैसे-जैसे वैज्ञानिक सोच का विकास हो रहा है बुद्ध प्रासंगिक बनते जा रहे हैं.

 

आखिर में शंकराचार्य के दादा गुरु ( शंकर के गुरु गोविन्दपाद के गुरु ) गौड़पाद की निम्नोक्त बुद्ध-वन्दना, जिसे उन्होने मांडुक्यकारिका में दी है, के साथ मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा.

 

ज्ञानेनाकाश कल्पेन्र्धान यो गगनोपमान्

ग्येयाभिन्नेन सम्बुद्धम् वन्दौतम् द्विपदाम्वर:.

 

(ज्ञान से अभिन्न दो पैर वालों में श्रेष्ठ पुरुष बुद्ध की वन्दना करता हूँ.)

बुद्ध पूर्णिमा पर

प्रेमकुमार मणि

वैशाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध का जन्मदिन मनाया जाता है. श्रुति है यह उनके बुद्ध होने और मृत्यु की भी तारीख है. बड़े लोगों को कालांतर में कुछ किंवदन्तियों और आख्यानों से बांध दिया जाता है. बुद्ध के साथ भी ऐसा हुआ. इसलिए हमें तटस्थ हो कर विचार करना चाहिए. लंबे समय तक राज्याश्रय के फलस्वरूप महायानियों ने ललितविस्तर में बुद्ध को लगभग अवतारी बना ही दिया है. लेकिन यह तय है कि बुद्ध इतिहास पुरुष हैँ,अवतारी नहीं हैँ.

जन्मदिन पर जन्मकथा की थोड़ी चर्चा अप्रासंगिक नहीं है. नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी में उनका जन्म हुआ. पिता शुद्धोदन शाक्यों के एक छोटे गणराज्य के मुखिया थे. पालि ग्रंथों के अनुसार उनके परिवार के पास कोई एक हजार हल की खेती थी. इस से प्रतीत होता है उनके अधीन कोई पाँच बड़े गाँव रहे होंगे. इस तरह वह एक मझोले जमींदार जैसी आर्थिक समृद्धि वाले परिवार से थे. जातक निदानकथा के अनुसार शुद्धोदन के घर रोपनी के आरम्भ होने के रोज एक किसान त्योहार मनाया जाता था. इसे वप्प-मंगल कहा जाता था. इस से जानकारी मिलती है कि बुद्ध का परिवार एक समृद्ध किसान परिवार था, न कि राज परिवार,जैसा बाद में प्रचारित हुआ. कपिलवस्तु में चुनाव के द्वारा चक्रानुक्रम से राजा चुने जाते थे. संभवत: ऐसे राजाओं को ही चक्रवर्ती राजा कहा जाता था. सम्भव है बुद्ध के जन्म के समय उनके पिता चुने गए राजा हो गए हों.

बुद्ध की माँ माया देवी थीं. पालि-ग्रंथ ‘अपदान’ के अनुसार वह देवदह गाँव के किसान अंजन सक्क और सुलक्खना की बेटी थीं. गर्भ के पूरे दिन होने पर जब वह जचगी केलिए अपने मायके जा रही थी, तब लुम्बिनी वन में उन्होने एक शिशु को जन्म दिया. यही बुद्ध हुए.

बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था. उनकी माँ उनके जन्म के कुछ रोज बाद मर गयीं. उनका लालन-पालन उनकी मासी गौतमी ने किया. इसलिए बुद्ध को गौतम भी कहा जाने लगा.
सिद्धार्थ अंतर्मुखी स्वभाव के थे. अपने में ड़ूबे कुछ सोचते रहते. खेतीबारी में भी उनका मन नहीं लगता था. यसोधरा से उनका विवाह हुआ,जो पुत्र राहुल के जन्म के बाद परीपाटी के अनुसार राहुल माता देवी कही जाने लगीं. कुछ ही समय बाद सिद्धार्थ का मन घर- ग्रिहस्ती से ऊब गया और एक रोज उन्होने चुपके से घर छोड़ दिया. इसे महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है.

अपने समय के अनेक प्रबुद्ध लोगों से मिलते वह आज के राजगीर पहुँचे, जो तब गिरीव्रज था. उस जमाने में वहाँ विचारकों का बड़ा जमावड़ा होता था. यहाँ कुछ समय बिताने के बाद वह गया के पास उरेला या उरुवेला चले गए,जहां उन्हें कुछ ऐसा ज्ञान हासिल हुआ,जिस से वह संतुष्ट हुए. यह उरेला ही आज बोधगया है. उन्हें अनुभव हुआ इस समझ के आधार पर मानव जीवन को सुखी बनाया जा सकता है.

बुद्ध ने चार सच्चाइयों को रेखाकित किया. इन्हें चार आर्य सत्य कहा जाता है. ये हैं –
दुख्खम यानी दुख है,

समुदाय यानी दुख के कारण हैँ,

निरोध यानी उसका निवारण है,

निरोधगामिनी प्रतिपद यानी दुख समुदाय के निरोध हेतु प्रतिपद (उपाय ) हैँ.

उन्होने एक दार्शनिक की तरह जीवन और जगत की व्याख्या भी की. उनका कहना था एक के खात्मे से दूसरे का जन्म होता है. यही प्रतीत्यसमुत्पाद है. अस्मिन सति इदम् भवति. यह होने से वह होता है. यह सापेक्ष कार्यकारणतावाद है. नष्ट होने और बनने की प्रक्रिया निरंतर एक सातत्य में चलती रहती है. यही सृष्टि-चक्र है. बुद्ध किसी सृष्टिकर्ता यानी ईश्वर में यकीन नहीं करते. अपने समय में उन्होने एक वैज्ञानिक समझ विकसित की. उन्होने कहा किसी बात पर इसलिए यकीन मत करो कि यह महान व्यक्ति द्वारा कही गई है या महान ग्रंथ में लिखी गई है . इसकी जगह स्वयम् सोचो कि क्या यह सचमुच ठीक है और ऐसा होने पर ही स्वीकार करो.

बुद्ध आज से ढ़ाई हजार साल पहले हुए. उन्होने अपने समय के विचारों और सनातनी धर्म की समझपूर्ण आलोचना की, और एक सद्धर्म की स्थापना भी की. इसके फैलाव केलिए एक संघ स्थापित किया.

जैसा कि होता है उनके बाद उनके संघ में भी विकृतियां आईं. संघ दो गुटों-हीनयान और महायान में बंट गया. मौर्य राजा असोक ने राजकीय संरक्षण दे कर बौद्ध भिक्खुओं के एक हिस्से को सुविधाभोगी बना दिया. राज्याश्रय से नाना प्रकार की विकृतियां उभरीं. इन सब का नतीजा हुआ संघ पतन की ओर जाने लगा.

लेकिन बाद में दूसरे कई शासकों, जिन में राजा धर्मपाल कुछ अधिक प्रमुख हैँ, ने अनेक बौद्ध शिक्षण संस्थानों को खड़ा कर इसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया. विक्रमशिला और नालन्दा के महाविहार, जो आधुनिक विश्वविद्यालय स्तर के थे, इसी काल में बने. तब का भारत एक बड़े ज्ञान-केन्द्र के रूप में जाना जाता था. पूरे एशिया में भारत के विद्या-वैभव की धाक थी. लेकिन तुर्क हमलावरों ने सब तहस-नहस कर दिया.

आधुनिक जमाने में लोकतांत्रिक राजनीति और विज्ञान के बढ़ते प्रभाव ने एक बार फिर बुद्ध को चर्चा में ला दिया है. वैज्ञानिक चेतना का जैसे-जैसे विकास हुआ, बुद्ध प्रासंगिक होते गए. प्रतीत्यसमुत्पाद की अवधारणा विज्ञान के आधुनिक खोजों के इतना करीब है कि आश्चर्य होता है.

बुद्ध अनेक रूपों में दुनिया भर के आधुनिक बुद्धिजीवियों को प्रभावित करते रहे हैं. आधुनिक जमाने के भारत में भीमराव आंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू जैसे राजनेता तथा ज़िद्दू कृष्णमूर्ती और रजनीश जैसे दार्शनिक बुद्धिजीवी उनसे अनुप्राणित थे. जैसे-जैसे वैज्ञानिक सोच का विकास हो रहा है बुद्ध प्रासंगिक बनते जा रहे हैं.

आखिर में शंकराचार्य के दादा गुरु ( शंकर के गुरु गोविन्दपाद के गुरु ) गौड़पाद की निम्नोक्त बुद्ध-वन्दना, जिसे उन्होने मांडुक्यकारिका में दी है, के साथ मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा.

ज्ञानेनाकाश कल्पेन्र्धान यो गगनोपमान्
ग्येयाभिन्नेन सम्बुद्धम् वन्दौतम् द्विपदाम्वर:.

(ज्ञान से अभिन्न दो पैर वालों में श्रेष्ठ पुरुष बुद्ध की वन्दना करता हूँ.)