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BNMU। Poem। कविता। खेत मेरा है

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खेत मेरा है , मेहनत मेरी है ,
पसीना मेरा बहा , मेहनत मैंने किया.
बारिश में भींगते हुए , लू में तपते हुए.
जाड़े में ठिठुरते हुए , बाढ़ में फंसते हुए,
जीवन मैंने जिया, मेहनत मैंने किया .
बीज के लिए , खाद के लिए, जुताई के लिए ,
बुआई के लिए , हमने साझा काम किया.
हर क्षण हमने गीत गाया, कुदाल चलाते हुए, धान रोंपते हुए ,
फसल काटते हुए, फसल ओसाते हुए .
खुश हैं हम , सिरजने के सुख से.
लेकिन हमारी हर खुशी को हमसे छीनी जा रही है.
हमारे आधार को हमसे दरकाया जा रहा है.
अब हम किसके भरोसे रहेंगे ?
ना तो खेत मेरी है ,
ना खाद मेरा है,
ना पानी मेरा रहा,
ना तो समाज मेरा रहा .
आहिस्ता-आहिस्ता, हर हमारी चीज तुम्हारी हुई,
पहले हमारी मेहनत गई, फिर हमारी एकता गई, अब हमारी खेत भी तुम्हारी हुई.

डॉ बंदना भारती
असिस्टेंट प्रोफेसर
पूर्णियाँ विश्वविद्यालय पूर्णियाँ

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