मेरे रचनात्मक संसार से कुछ समाचार
प्रिय मित्रों,
आज अपने रचनात्मक संसार की कुछ बातें आपसे साझा करने का मन हुआ। पुराने मित्र मेरी लेखन-यात्रा से कुछ परिचित हैं, लेकिन हाल के वर्षों में फेसबुक पर जुड़े नए मित्रों के लिए शायद यह परिचय भी उपयोगी हो।
मेरी लेखन-यात्रा का आरंभ बहुत पहले, 1959 में लिखे गए नाटक ‘औरंगजेब’ से हुआ था। आगे चलकर 1970 में मेरी दूसरी पुस्तक ‘अरेंजमेंट’ प्रकाशित हुई—वह भी एक नाटक था।
जीवन और व्यवसाय की अनेक व्यस्तताओं के बीच लेखन कभी धीमा पड़ा, कभी भीतर ही भीतर चलता रहा। फिर 2006 से 2010 के बीच मेरी कई पुस्तकें सामने आईं—कथा-संग्रह ‘चेहरे’ और ‘रूट बिजी’, उपन्यास ‘अगिनदेहा’ और ‘कुँवर नटुआ दयाल’, तथा आलोचना-कृति ‘अंगिका लोक साहित्य’।
इसके बाद भी लेखन चलता रहा। कुछ पांडुलिपियाँ पूरी हुईं, कुछ अधूरी रहीं और कुछ विषय वर्षों तक भीतर आकार लेते रहे। इन्हीं पुरानी-अप्रकाशित पांडुलिपियों और हाल के वर्षों में लिखी गई नई पुस्तकों को मैंने मई-जून 2026 से दो प्रकाशनों—श्वेतवर्णा और ब्लू रोज पब्लिकेशन—को भेजना आरंभ किया।
अगस्त 2026 से इन पुस्तकों का प्रकाशित होकर आना शुरू हुआ।
श्वेतवर्णा से इस क्रम में पहली पुस्तक आई—‘बाढ़’। यह मेरे अपने शहर भागलपुर की उस बड़ी आबादी की त्रासदी से उपजा कथा-संग्रह है, जिसके जीवन में बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बार-बार लौटने वाली एक कठिन नियति है।
इसके बाद अगस्त में ही प्रकाशित हुई ‘मैं कहानी हूँ’। यह मेरे लिए विशेष पुस्तक है, क्योंकि इसमें कहानी पर कोई लेखक बाहर से बात नहीं करता; ‘कहानी’ स्वयं एक जीवंत पात्र बनकर अपनी जीवन-गाथा, अपने विकास, अपने शिल्प और अपने अंत:संसार की कथा सुनाती है।
अगस्त के अंतिम सप्ताह में श्वेतवर्णा से ही तीसरी पुस्तक आई—‘प्रश्नों के पार’। आलोचना के क्षेत्र में यह मेरे लिए एक नए प्रयोग की तरह है। डॉ. अमरेन्द्र के समस्त उपलब्ध साक्षात्कारों के अनुशीलन के माध्यम से उनके व्यक्तित्व, चिंतन और वैचारिक संसार को समझने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।
इसी प्रकाशन से अब चार और पुस्तकें आने की प्रक्रिया में हैं—
‘शंकर-जयकिशन : संगीत का महासंगम’ — हिंदी सिनेमा की इस विलक्षण संगीतकार जोड़ी के रचनात्मक संसार पर मेरा अध्ययन।
‘तुमसा नहीं देखा : ओ.पी. नैयर’ — उस संगीतकार की विशिष्ट सांगीतिक पहचान को समझने का प्रयास, जिसकी धुनों की अपनी अलग चाल, रंग और व्यक्तित्व था।
‘जब मैं बच्चा था’ — मेरे बचपन के संस्मरण। इसमें 1952 से 1959 के आसपास का वह संसार लौटता है, जिसे मैंने एक बच्चे की आँखों से देखा था—दादी, पिता, परिवार, भागलपुर और उस समय के छोटे-बड़े प्रसंग।
‘नई भारतीय आलोचना : सिद्धांत और प्रस्ताव’ — आलोचना के संबंध में वर्षों से मन में उठते प्रश्नों और विकसित होती अवधारणाओं को एक व्यवस्थित प्रस्ताव के रूप में रखने का मेरा प्रयास।
इसके अतिरिक्त ब्लू रोज पब्लिकेशन से भी इसी माह दो पुस्तकों के सूचीबद्ध होने की प्रतीक्षा है—‘कहानी लेखन कला’ और ‘सम्पादन कला’। पहली पुस्तक कहानी लिखने की रचनात्मक प्रक्रिया पर केंद्रित है, जबकि दूसरी संपादन को केवल भाषा-सुधार नहीं, बल्कि रचना को उसके अधिक समर्थ रूप तक पहुँचाने की कला के रूप में देखने का प्रयास करती है।
इस समय मेरी कुछ पुरानी और अधूरी पांडुलिपियाँ भी मुझे लगातार पुकार रही हैं।
इनमें एक है चर्चित कथाकार शिवकुमार शिव की रचना-प्रक्रिया पर केंद्रित मेरी पुस्तक ‘उपन्यास का उत्सव’।
दो अधूरी पांडुलिपियाँ भी विशेष रूप से मेरे सामने हैं। पहली, शंकर-जयकिशन पर एक औपन्यासिक रचना, जिसमें उनके संगीत-संसार को तथ्यात्मक अध्ययन से अलग कथा के माध्यम से जीवंत करने की इच्छा है।
दूसरी है—‘डिजिटल कथा लेखन की सम्पूर्ण व्यावहारिक कला’। बदलते डिजिटल समय में कथा कहाँ और कैसे लिखी, पढ़ी और प्रस्तुत की जा रही है—और नए माध्यमों में लेखक अपनी रचनात्मकता को किस प्रकार विकसित कर सकता है—इन्हीं प्रश्नों पर यह पुस्तक आकार ले रही है।
जब पीछे मुड़कर 1959 से 2026 तक की इस यात्रा को देखता हूँ, तो यह मुझे किसी सीधी रेखा की तरह नहीं दिखाई देती। इसमें लंबे विराम हैं, जीवन की दूसरी जिम्मेदारियाँ हैं, कुछ प्रकाशित पुस्तकें हैं, कुछ वर्षों से बंद पड़ी पांडुलिपियाँ हैं और कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जो अभी अपना अंतिम रूप खोज रही हैं।
इसलिए इन दिनों एक के बाद एक पुस्तकों का प्रकाशित होना मेरे लिए उपलब्धियों की सूची भर नहीं है। कहीं अधिक यह वर्षों से लिखे, सँजोए और प्रतीक्षा करते शब्दों का धीरे-धीरे अपने पाठकों तक पहुँचना है।
जो लिखा जा चुका है, उसे पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास जारी है; जो अधूरा है, वह पूरा होने की प्रतीक्षा में है; और जो अभी केवल मन में है, शायद किसी दिन वह भी शब्दों में उतर आए।
इस लंबी यात्रा में जिन मित्रों, पाठकों, साहित्यकारों और शुभचिंतकों ने मेरी रचनाओं को पढ़ा, उन पर अपनी बात कही, असहमति जताई, सुझाव दिए अथवा केवल स्नेहपूर्वक साथ बने रहे—उन सभी के प्रति मेरी कृतज्ञता है।
यात्रा अभी जारी है।
— रंजन
05.09.2026














